ऐसे लोग जो अपने छुटपन से ही बड़े शहरों में रहते आए हैं, उन्हें इस बात का बिल्कुल अन्दाज़ नहीं है कि बिजली पहुँचने से पहले सूरज ढलने के बाद गाँवों में रोशनी कैसे होती थी। भारत में विद्युतीकरण की कहानी अभी बिल्कुल ताज़ी ही है। सत्येंद्र प्रकाश बहुत संवेदनशील ढंग से इस आलेख में लालटेन के माध्यम से यह बात रहे हैं कि गाँव में रोशनी आने का क्या अर्थ है - बिजली की रोशनी तो दूर, उनके गाँव में लालटेन आना भी किसी क्रांति से कम ना था। छोटे टिमटिमाते दिए (जिसे उनके गाँव में ढिबरी कहा जाता था) से 1961 में पहली बार लालटेन और फिर बिजली पहुँचने तक की रोमांचकारी यात्रा को उन्हीं के शब्दों में पढिए।





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