नई पीढ़ी की तो क्या कहें, बहुत से नव-वृद्धों (जिनकी आयु 60-65 के आसपास होती है) को भी नहीं मालूम होता कि गाँव की ज़िंदगी कैसी होती है या कैसी होती थी। सत्येन्द्र प्रकाश की कहानियाँ हम में से बहुत से लोगों को एक तरह से शिक्षित कर रही हैं और हमें रु-बू-रु करवा रही हैं उस ग्रामीण परिवेश से जिसके बारे में हमने कुछ विशेष जाना-समझा नहीं है। तिस पर वह हमें इन कहानियों के ज़रिए बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में ले जाते हैं जहां प्रगति की रफ़्तार बहुत धीमी रही है। उनकी पिछली कहानी लालटेन ने बहुत संवेदनशील ढंग से बिहार के गाँवों में रोशनी आने की गाथा कही थी। आज प्रस्तुत है उनकी नई कहानी जिसके ज़रिए आप बिहार में साठ के दशक में पड़े सूखे को तो जान ही लेंगे, साथ ही ग्रामीण परिवारों का अपने पशुओं के साथ क्या रिश्ता होता है, यह भी जान जाएंगे।











