हमें नहीं पता कि जब मनोज 'निर्झर' अपनी यह कविता शहरीकरण लिख रहे थे तो उन्हें अज्ञेय की एक छोटी सी लेकिन बहुचर्चित कविता 'सांप' की याद आई या नहीं लेकिन हमें ज़रूर आई - "साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं - नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया। तब कैसे सीखा डँसना--विष कहाँ पाया?" हालाँकि निर्झर की कविता में इतनी निराशा नहीं है! उन्हें अभी भी बीच-बीच में कुछ उम्मीद नज़र आती है. मनोज 'निर्झर 'हमारी वेब-पत्रिका से हाल ही में जुड़े हैं लेकिन जैसा कि आप नीचे दिए गए उनके परिचय में पढ़ेंगे, उनके गीत और कविताएँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं।












