सुभाष सेतिया की एक कविता आप पहले इस वेब पत्रिका में यहाँ पढ़ चुके हैं. आज की कविता उनकी पिछली कविता से बिलकुल भिन्न श्रेणी की है. जहाँ पिछली कविता सीधे-सीधे अपनी बात कहती थी, वहीँ आज की कविता सरल शब्दावली के होते हुए भी अपने में दार्शनिक तत्वों को समेटे हुए हैं. देखते हैं कि इस वेब-पत्रिका में दार्शनिक निबंधों की श्रृंखला चला रही डॉ मधु कपूर इस कविता पर क्या कोई टिप्पणी हमारे पाठकों के लिए लिख सकेंगे?












