फैटी लीवर : कारण और बचाव
हम सभी 'हार्ट' यानि दिल और उसकी बीमारियों के बारे में बचपन से ही सुनने लगते हैं. 'हार्ट-अटैक' और हार्ट की नलियों में अवरोध आने के कारण 'स्टेंट' लगाना जैसी बातें दशकों से आम चर्चा का विषय हैं. पिछले दस-पन्द्रह सालों से 'फैटी लीवर' का ज़िक्र भी अब दिल की तर्ज़ पर होने लगा है. लीवर जिसे हिंदी में यकृत या आम हिन्दुस्तानी में जिगर कहते हैं, आधुनिक जीवन शैली से प्रभावित होने वाला सबसे मुख्य अंग बन गया है. डॉ नमिता शर्मा जो हमारे लिए पहले भी स्वास्थ्य सम्बन्धी विषयों पर कुछ अच्छे लेख लिख चुकी हैं, आज हमें चेता रही हैं कि 'फैटी लीवर' की बात को हलके में ना लें. शरीर के पांच सौ से ज्यादा कामों की जिम्मेदारी लीवर पर होती है। ऐसे में आप अनुमान लगा सकते हैं कि लीवर का रोगग्रस्त होना कितना महंगा पड़ सकता है. आइए जानिये, फैटी लीवर होने के कारण और कैसे उनसे बचा जा सकता है.
फैटी लीवर
डॉ नमिता शर्मा
हम लोग बीमारियों के बारे में जब सोचते हैं तब हम अक्सर ब्लड प्रेशर, शुगर, किडनी, हार्ट, लकवा आदि के बारे में ही बात करते हैं। लेकिन लीवर की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता है। लीवर जिसे जिगर और यकृत के नाम से जाना जाता है हमारे शरीर का सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण अंग है। लेकिन फिर भी उपेक्षित। लीवर की स्थिति धीरे-धीरे बद से बदतर होती जा रही है और हम अनजान हैं। लीवर के बारे में जानकारी की बहुत ज्यादा जरूरत है। पिछले कुछ समय से "फैटी लीवर" की बहुत चर्चा हो रही है। आज से चालीस-पचास साल पहले फैटी लीवर की बीमारी अधेड़ उम्र के लोगों को शराब के ज्यादा सेवन से होती थी। आज परिस्थिति बदल गई है और कारण भी बदल गये हैं।
अब फैटी लीवर का प्रमुख कारण है- आधुनिक जीवन शैली। इस नई लाइफ स्टाइल से सबसे ज्यादा प्रभावित बच्चे और युवा हो रहे हैं। सन् 2015 से 2025, इन दस वर्षों में फैटी लीवर के रोगी तीन गुना बढ़ गये हैं। छह वर्ष के बच्चों से तीस वर्ष के युवाओं में फैटी लीवर पाया जा रहा है। इसे नान अल्कोहलिक श्रेणी में रखा गया है। एम्स (AIIMS) के 2023 के एक अध्धयन से पता चला है कि मोटापे से ग्रस्त बासठ प्रतिशत बच्चे फैटी लीवर का शिकार हैं। उससे पता चला है कि एक तीस वर्षीय युवा के लीवर की उम्र 60 वर्षीय व्यक्ति जैसी है। फैटी लीवर यानी लीवर में चर्बी या वसा का जमा होना। ये स्थिति बहुत गंभीर है। खून और पेशाब की जांच से भी इसका पता नहीं चलता है। पेट की सोनोग्राफी या स्कैन से फैटी लीवर की पहचान होती है।
लीवर हमारे शरीर का गोदाम है। इसका वजन 1.35 किलोग्राम से 1.5 किलोग्राम तक हो सकता है। शरीर के पांच सौ से ज्यादा कामों की जिम्मेदारी लीवर पर होती है। ये अपने में विटामिन A, D, E, B12, k और आयरन तथा कॉपर जमा रखता है। आपातकालीन परिस्थितियों के लिए पांच सौ मिलीग्राम रक्त लीवर में रहता है जो दुर्घटना, चोट और प्रसव के समय काम आता है। लीवर में शुगर ग्लाइकोजन के रूप में रहती है। शरीर को ज्यादा ऊर्जा की जरूरत पड़ने पर लीवर तुरंत रक्त को ग्लाइकोजन पहुंचा कर उसकी पूर्ति करता है।
ये इंसुलिन को नियंत्रण में रखकर रक्त की शुगर को सही मात्रा में बनाये रखने का काम भी करता है। ऐसा समझिए कि ये शरीर की कैमिकल फैक्टरी है। ये कोलेस्ट्राल, ट्रिजलीसराइड, लिपोप्रोटीन, बाइल बनाता है। शरीर की हर कोशिका तक रक्त संचार ठीक रहे इसके लिए खून का पतला होना जरूरी होता है। चोट लगने पर, कट जाने पर, प्रसव के समय रक्त का थक्का बन कर उसे बहने से रोकने के लिए जो क्लॉटिंग फैक्टर होते हैं वो लीवर बनाता है।
लीवर बहुत से काम करता है। अगर रक्त में इंसुलिन, एस्ट्रोजन, थायराइड कार्टिसोल ज्यादा हों तो उन्हें नष्ट कर के सामान्य मात्रा में लाता है। हमारी आंतों से सत्तर प्रतिशत रक्त लीवर में आता है। विभिन्न बैक्टीरिया, टूटे हुए रक्त कण शरीर के लिए हानिकारक हैं। लीवर का कुफैर सैल इन्हें नष्ट करके साफ करने का काम करता है।
शरीर की प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाने वाला लीवर एक तरह का कैमिकल प्लांट है। सभी तरह की दवाएं, अल्कोहल, कॉफी एंजाइम्स को मेटाबलाइज करता है। यह शरीर की वह रासायनिक प्रक्रिया है जो खाये गये भोजन और पेय पदार्थों को शारीरिक ऊर्जा में बदलता है। यह ऊर्जा हमारे दैनिक कामों को सम्पन्न करने कं काम आती है। इसे हिंदी में ‘चयापचय’ कहा जाता है। इससे पाचन क्रिया आसान हो जाती है।
लीवर एक ‘साइलेंट किलर’ है। इसके खराब होने की बात देर से पता चलती है। लीवर में सिर्फ पांच प्रतिशत फैट बढ़ने से फैटी लीवर की शुरुआत होती है। उसके खराब होने के कोई विशेष लक्षण नहीं होते। बहुत थकान महसूस होती है। हर समय सुस्ती रहती है। मजे की बात यह है कि इस फैट का कारण चर्बी या फैट नहीं है। शरीर अधिक कार्ब और शुगर रक्त में न रखकर उन्हें लीवर में भेज देता है। लीवर को भी शक्कर पसंद नहीं है। वह इस शक्कर को फैट में परिवर्तित कर जमा करता है। यही ज्यादा मात्रा फैटी लीवर कहलाता है। शरीर में सिर्फ जीभ को ही शक्कर पसंद है। पर ये बड़ी नुकसानदेह होती है। लीवर फैटी हो जाता है तब वो उसके महत्वपूर्ण कामों में बाधा डालने लगता है।
लीवर के फैटी होने के बहुत से कारण हैं। आजकल स्कूल के बच्चों में और युवाओं में फैटी लीवर बहुत ज्यादा हो रहा है। आधुनिक जीवन शैली ने लीवर पर बहुत असर डाला है। हम बहुत शारीरिक श्रम नहीं करते हैं। भाग-दौड़ की जिंदगी शारीरिक श्रम नहीं है और उससे तनाव होता है। हमारी खाने-पीने की आदतें ऊटपटांग हो गयी हैं। घर के खाने का महत्व रोज-रोज कम हो रहा है। जैसे ज्यादा जंक फूड खाना। जिस खाने का नाम ही जंक फूड पड़ गया है उससे बचना चाहिए। समय- बेसमय और बगैर जरूरत के खाना भी लीवर को फैटी बनाता है। पैकेट बंद और प्रोसेस्ड फूड बहुत हानिकारक हैं। इस सब में सबसे बुरा कोल्ड ड्रिंक है। छह सौ एम एल की बोतल में बहुत शक्कर होती है। अब तो लोग भोजन के साथ भी हल्के ठंडे पेय लेने लगे हैं। ये बहुत नुकसानदेह होता है, इससे बचें।
ज्यादातर घरों में अब सारे काम या तो नौकर करते हैं या मशीनें। वर्क फ्रॉम होम भी इसका एक बड़ा कारण है। ऑफिस में भी सारा काम बैठे-बैठे होता है। पंखा, लाइट बंद करने, चालू करने जैसे छोटे-छोटे काम भी अब अलेक्सा और रिमोट करते हैं। हाल ही में जूते का एक विज्ञापन देखा। उसमें बताया गया है कि बिना हाथ लगाये, बिना झुके जूते आसानी से कैसे पहने जा सकते हैं।
शारीरिक श्रम के अलावा अति व्यस्त जिंदगी में जुटे लोग सामान्य रूप से पूरी नींद नहीं ले पाते। कम नींद होने से घ्रयेनील हार्मोन की मात्रा बढ़ती है और हमें ज्यादा भूख लगने लगती है। ज्यादा भूख, और फिर ज्यादा खाना- इन सब कारणों से फैटी लीवर कम उम्र वालों में होना शुरू हो गया है। अनियमित खान-पान पर रोक लगाना बहुत जरूरी है।
हम पहले कह चुके हैं कि लीवर को ‘सायलेंट किलर’ का नाम दिया गया है। पर लीवर बहुत उदार प्रवृत्ति का अंग है। इसकी सबसे खास बात यह है कि ये खुद को पुनर्जीवित (regenerate) यानी फिर से जीवन दे सकता है। लीवर का यदि सत्तर प्रतिशत हिस्सा भी दूसरे को दान में दे दिया जाये तो स्वस्थ लीवर छह से आठ हफ्तों में खुद को दोबारा पूरा बना लेता है। पहले जैसा हो जाता है और सामान्य काम करने लगता है।
फैटी लीवर से बचने का उपाय आप खुद हैं। किसी भी तरह की गोली या दवा मददगार हो सकती है पर इसका पहला इलाज आप स्वयं हैं। अपनी जीवन शैली नियमित करने का प्रयत्न करें। उसमें बदलाव लायें। भोजन में दाल-सब्जी ज्यादा लें। रोटी चावल कम करें। प्रोटीन, फाइबर ज्यादा लें। कार्ब और फैट वाले पदार्थ कम उपयोग करें। घर के बने सादे, कम तेल वाले स्वस्थ और स्वच्छ भोजन की आदत डालें। जब ऐसा करेंगे तो बच्चों को भी यही ठीक लगेगा। हो सकता है ये आदतें बदलने में समय लगे। पर कोशिश तो कीजिये। कोल्डड्रिंक तत्काल प्रभाव से बंद करें। दिन में किसी भी तरह का व्यायाम नियमित करें। योग, दौड़ना, घूमना, तैरना, आउटडोर खेल ये सब शरीर के साथ-साथ लीवर को भी स्वस्थ रखते हैं। अगर आप रोज के सामान्य काम खुद करने लगेंगे तो तीस प्रतिशत फैट तो उसी से घट जाता है। हम पहले भी कह चुके हैं कि लीवर बहुत उदार है। समय रहते लीवर की नापसंद बातों को बंद कर दें। धीरे-धीरे बिगड़ा लीवर अपने आप पूरी तरह ठीक हो जाता है।
इस बीच समाज में फैटी लीवर के साथ-साथ सामान्य स्वास्थ्य की ओर जागरूकता बहुत बढ़ी है। युवा काफी प्रयासरत हैं। बच्चों का ख्याल माता-पिता को रखना है। स्कूल में कैंटीन वगैरह में स्वस्थ खाना मिले इसकी पहल होना चाहिए। हमें सतर्क रहने की जरूरत है। दादा-दादी और माता-पिता के सामने बच्चों का लीवर ट्रांसप्लांट होने लगे इस स्थिति से बचना है। बच्चों को बड़ों की बीमारी होने लगे तो यह बहुत भयानक परिस्थिति है। अपनी जीवन शैली में सुधार लायें। भागदौड़, आराम, खान-पान सब संतुलित रखें और फैटी लीवर से बचें।
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डॉ नमिता शर्मा पेशे से चिकित्सक हैं। 25 वर्ष तक कैंटोनमेंट बोर्ड, पुणे में बतौर मेडिकल ऑफिसर काम किया। अवकाश -प्राप्ति के बाद कुछ समय तक विभिन्न सामाजिक कार्यों से जुड़ी रहीं। पिछले लगभग पाँच वर्ष से रामकृष्ण मठ (पुणे) से संबद्ध एक चैरिटेबल अस्पताल में चिकित्सीय सेवाएँ दे रही हैं और स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों पर पढ़ती-लिखती और गुनती रहती हैं।