सम्बन्ध : नन्दिता मिश्र की नई कहानी
हमारी वेबपत्रिका की साहित्य केटेगरी को नन्दिता मिश्र ने जीवंत रखा हुआ है. रागदिल्ली में वह बहुत सी कहानियों और यदा-कदा कविताओं और लेखों से भी वह अपना योगदान दे चुकी हैं. कुछ सप्ताह पहले आपने उनकी कहानी प्याज़, लहसुन और अदरक पढ़ी होगी और इससे पहले उनकी कई अन्य कहानियां जैसे एक दूसरे से दूर, लाइब्रेरी, बाबा का मसनद, आखिर क्यूँ, माँ, अंतर्मन का द्वन्द आदि भी काफी चर्चित रहीं. आज की उनकी कहानी ‘सम्बन्ध’ भी उनकी अन्य बहुत सी कहानियों की तरह अंतर्मन की गहराइयों को छूती है और अंत तक आते आते पाठक को डबडबाई आँखों के साथ छोड़ देती है. आइए पढ़िए!
सम्बन्ध
नन्दिता मिश्र
शाम हो रही थी। घर में मैं अकेली थी। मुझे ऐसी अकेली शाम बुरी लगती है। पता नहीं अम्मा कब आएंगी।
सूझ नहीं रहा था कुछ भी, “क्या करूं। अभी तो पूरी शाम पड़ी है। इतने में किसी ने दरवाजा खटखटाया। शायद अम्मा पड़ौस से आ गईं थीं। दरवाजा खोलने उठ ही रही थी कि देखा चुन्नी ने दरवाजे की बड़ी दरार में हाथ डालकर सांकल खोल ली।” अम्मा अंदर आते हुए कह रही थीं- “हजार बार समझाया है कि टूटी झरिया उसमें अटकी रहने दिया करो। बात सुनना और मानना तो न जाने किस दिन सीखेंगे बच्चे”, अम्मा अंदर आ चुकी थीं। बाथरूम की ओर जा रही थीं।
चुन्नी आ कर पास बैठ गई। “पता है तुम्हें चंदा के भाई-भाभी आए हैं। उनके लड़के का मुण्डन था। उसी के बुलौव्वे में तो हम गए थे। देखो बताशे के बदले मिठाई बांटी है उन लोगों ने। आर्मी में हैं शायद उनके भाई इसीलिए। चंदा बता रही थी कि कल रात बड़ी देर तक यही तय होता रहा कि मुण्डन संस्कार में क्या-क्या हो और क्या नहीं। भैया-भाभी मुण्डन तो करवाना चाहते थे पर नाम का। उनका कहना था कि रस्म निभाने के खयाल से गर्दन के पास एक जगह उस्तरा फिरवा देने से रस्म पूरी हो जाएगी और फिर नाई ढंग से कटिंग कर देगा सपन की। श्रीमती शुक्ला इस नए ढंग के मुण्डन के पक्ष में नहीं थीं। आखिर भैया-भाभी की बात ही मानी गई।” मुण्डन का समय शाम से पहले का रखा गया। आस-पड़ौस वालों को मुण्डन का निमंत्रण तीन से पांच बजे के बीच का दिया गया था। रात को ‘डिनर’ में खास लोगों को बुलाया गया था।
शुक्ला परिवार को हमारे पड़ौस में आए लगभग पांच साल होने वाले होंगे। यहां आने के बाद कुछ महीने ‘मिस्ट्री’ ही रही। हमने उनके घर के पूरे सदस्यों को भी नहीं देखा था, जानना तो बड़ी दूर की बात थी।
गर्मी की छुट्टियां खत्म होने वाली थीं। सुबह जल्दी उठकर स्कूल जाना होगा। दो महीने कैसे बीत गए पता ही नहीं चला। छुट्टियों के बाद स्कूल जाना हर बार नया-सा लगता है। कपड़े प्रेस करने की तैयारी में थी कि चुन्नी एक लड़की को लेकर मेरी ओर आते दिखी।
“जीजी इसे अपने स्कूल में एडमीशन मिल जाएगा न।”
मैंने लड़की की तरफ देखा तो वह बोली, “मैं चंदा हूं- चंद्रबाला शुक्ल- आपके घर के सामने रहती हूं, शुक्लाजी की छोटी लड़की हूं।”
“किस क्लास में?”
“जीजी, मेरे ही साथ।”
“अच्छा कल सुबह चुन्नी के साथ आ जाना। स्कूल में ही पता चल सकेगा।”
“जी अच्छा। कल फिर आऊंगी” कह कह चंदा चली गई।
“क्यों री, इससे दोस्ती कैसे कर ली। और एक काम बढ़ा दिया। पता है न वो मिस बोस दुनिया भर के एहसान लादेंगी पहले, फिर मिस शुक्ला को एडमीशन देंगी।”
“अरे जीजी, तुम भी बस... वो मिस हैं न तुम्हारी - उनकी बोलती बंद कर देगी यह। रांची से आई है वहां अंग्रेजी स्कूल में थी। पिताजी रिटायर हो गए थे और बड़े भैया-भाभी के साथ रहते थे इसलिए यहां आई है वरना...।”
“अच्छा-अच्छा रहने दे गुणगान। सुबह के लिए रिक्शेवाले को याद दिला देना।”
“तुम अपना रिक्शा खुद कर लेना। मैं तो चंदा के साथ आऊंगी। उसके बड़े भैया ने कहा है गाड़ी से छोड़ देंगे। बड़े अमीर हैं। दो-दो नौकर हैं। एक आया है जो सिर्फ बड़ी भाभी की लड़कियों के लिए है।”
चंदा बताती जा रही थी। “इसकी बड़ी भाभी पटियाला की हैं- पंजाबी हैं। और ये लोग हिंदू हैं।”
“यह तो इंटरकास्ट मैरिज हुई न। भाभी की लड़कियां बहुत स्वीट हैं। बेचारी बड़ी भाभी, लड़का नहीं है न उनका एक भी। एक लड़का हो जाता तो।”
“अभी कह रही थी मुण्डन में गई थी भतीजे के, अब कह रही है एक लड़का हो जाता तो।”
“.अरे वो मुण्डन वाला भतीजा ही है। वो आर्मी वाले भैया का है। एक ही भाई थोड़े ही है चंदा के। ये जो बड़े भैया हैं न ये तो डायरेक्टर होकर आए हैं- फूड कॉरपोरेशन में। ये मंझले भाई आर्मी में हैं। यह मकान बड़े भैया को मिला है। आर्मी वाले भैया यहीं केंट में रहते हैं। उनका यही एक लड़का है। सपन नाम है उसका। वो लोग उससे अंग्रेजी में बोलते हैं। भाभी को लड़की की चाह है ऐसा चंदा बताती है। देखो तो बड़ी भाभी को लड़की चाहिए और इन्हें लड़का, है न मजेदार बात।”
“चल भाग यहां से है न Ị है न Ị सिर खा गई। जब से बके जा रही है। काम करने दे। और देख अब उनके घर मत जाना। रात होने वाली है और उनके यहां ‘डिनर’ शुरू होने वाला होगा।”
“तो क्या ? मुझे बुलाया है डिनर में। मैं तो अपना लाल शरारा पहनकर जाने वाली हूं। जरा प्रेस कर दो उसमें, प्लीज कर दो न। चंदा अम्मा से पूछकर गई है।”
“अम्मा तुमने हां क्यों कहा ? देखो अम्मा, शुक्लाजी बड़े लोग हैं, पैसे वाले हैं। हमें इससे क्या। और कल से स्कूल खुल रहे हैं। अब चुन्नी मेरे चार्ज में है। मुझसे पूछे बिना... यह आखिरी साल है उसका। ढंग से पढ़ ले शुरू से तो कुछ हो सकता है। उसका मन वैसे ही...।”
“बेटी जल्दी आ जाएगी। मैंने कह दिया है जल्दी भेजने को। चंदा खुद पूछने आई थी। मना कैसे करती उसे बता तो। चुन्नी, जल्दी आना वहां से।”
कुमारी चंद्रकला शर्मा का एडमीशन हमारे स्कूल में हो गया। चुन्नी की और उसकी दोस्ती बढ़ती गई। चंदा सचमुच होशियार लड़की निकली। एक दिन चंदा स्कूल नहीं आई। वैसे सुबह आ कर बता गई थी कि उसकी बहन आई हैं। स्कूल नहीं जाएगी वह।
चुन्नी को मेरे साथ रिक्शे पर जाना पड़ा। उसकी बातों से सिर दुखने लगा स्कूल पहुंचते-पहुंचते। कितनी खबर रहती है इसे भी। चंदा के घर की चुन्नी को काफी जानकारी हो गई है इतने दिनों में। कितने लोग हैं, कौन क्या करता है, कहां रहता है। उनमें मिसेज शुक्ला का चहेता कौन है। मिसेज शुक्ला को क्या पसंद है से लेकर उनकी नापसंदगी से लेकर सब कुछ। पूरे रास्ते मैं चंदा की मां, चंदा के भैया-भाभी, जीजी सुनती रही। दो-चार बार मैंने टोका भी धीरे से। उत्सुकता तो थी ही उस परिवार के बारे में जानने की। इसलिए उसे जोर से डांट कर रोका नहीं। चुन्नी के वर्णन से उस अंग्रेजीदां घर का जो नक्शा मेरे सामने खिंचता था उसमें मैं कहीं भी खुद को चुन्नी की तरह इन्वाल्व नहीं कर पाती थी।
चंदा तीन-चार दिन स्कूल नहीं आई। चुन्नी का स्टाक अभी भी खत्म नहीं हुआ था। रोज कुछ न कुछ नया सुनने मिलता ही था। एक दिन शाम को चंदा ने आ कर दरवाजा खटखटाया। दरवाजा मैंने ही खोला। चंदा अकेली नहीं थी।
“ये मेरी जीजी हैं, बहनजी। आपसे दोस्ती करवाने लाई हूं। चुन्नी कहां है चुन्नी कहां है ? चुन्नी...”
“— आइए, आइए। चुन्नी आपकी बड़ी तारीफ करती है।”
जीजी का नाम रमा है। यही कोई 24-25 की होंगी। एम.ए. की शिक्षा पूरी हो जाने के बाद रिसर्च कर रही थीं। उसमें कुछ अड़चन आ जाने पर घर आ गई थीं। मुझे रमा अच्छी लगी।
धीरे-धीरे मैं भी चुन्नी की तरह उनके घर आने-जाने लगी। रमा से मेरी बड़ी ठीक मित्रता हो गई थी। लेकिन वहां जाते हुए भी मैं उनके घर में खुद को मिसफिट पाती थी। चुन्नी तो वहां घर के सदस्य की तरह घूमती-फिरती थी। मेरा आना-जाना रमा के कमरे तक ही सीमित था।
एक दिन शाम को रमा ने मुझे बुलवाया। वहां जा कर पता चला शाम को लड़के वाले उसे देखने वाले आने वाले हैं। बड़ी भाभी अकेली क्या-क्या करेंगी। मंझली भाभी का फोन आ चुका था कि वे लोग नहीं आ पाएंगे। जिज्जी (जो जीजाजी के कारण बहुत ज्यादा व्यस्त रहती थीं और तीज-त्योहारों पर ही आती थीं) को भी जीजाजी के बॉस के घर डिनर पर जाना था। ऐसे मौकों पर जिज्जी का साथ जाना जीजाजी बहुत जरूरी मानते हैं। आखिर वे ठहरे आई.ए.एस.। डिनर में पत्नी साथ नहीं ỊỊỊ
मिसेज शुक्ला शाम के पूजा-पाठ और मेहमानों के स्वागत की तैयारी दोनों को बराबर समय दे रही थीं। बड़ी भाभी का खयाल था कि खाना लॉन में ‘बूफे’ के ढंग पर हो जाए तो जरा आधुनिक भी हो जाएगा और परोसने की झंझट से भी मुक्ति मिल जाएगी। मिसेज शुक्ला यानी अम्माजी का कहना था— “लड़की पहली बार परोसने के लिए ही तो जाएगी।” भाभी कह रही थीं कि, “आज कल ऐसा नहीं होता। यदि लड़का रमा से अकेले में मिलकर बातचीत करना चाहेगा तो ? अम्मा को यह बिलकुल नापसंद था। बहस जारी थी। भाभी बोलीं, “अम्मा तुम तो अभी तक जिज्जी वाला जमाना पकड़े बैठी हो।”
अम्माजी और भाभी की बहस चल रही थी कि भैया आ गए। “क्या बात है अम्मा — रमा तैयार है न। रतन आ रहा है गाड़ी ले कर। फोन आया है उनका। रमा को बाहर घुमाने ले जाएगा और...।” अम्माजी अपने बड़े बेटे का मुंह देखती रह गईं। बड़े भैया जितनी तेजी से आए थे उतनी ही तेजी से वापस चले गए।
अम्माजी ने गिरी हुई आवाज में मुझसे पूछा, “रमा तैयार हो गई है न।”
मैंने स्वीकृति में सिर हिला दिया। भाभीजी ने मेरी तरफ देख कर कहा — “तुम भी चली जाना साथ में। रमा की ही कोई साड़ी पहन लो झट से। चंदा-चुन्नी जा कर पूछ आएंगी तुम्हारी मां से उतनी देर में।”
मुझसे न ‘हां’ कहते बना न ‘ना’। मैंने रमा की दी हुई साड़ी पहन ली। रमा इतनी देर से चुपचाप खड़ी थी। उसने धीरे से भाभी से पूछा, “रवि नहीं आएंगे।” भाभी ने क्या जवाब दिया वह मैं सुन नहीं पाई। पर उनकी मुखमुद्रा से पता चल गया कि कोई बड़ा नागवार नाम है ‘रवि’। रमा से कुछ पूछ नहीं सकी। लेकिन मन में एक सहज उत्सुकता ने जगह बना ली थी। इससे पहले भी एक-दो बार दबी जबान से लोगों को यह नाम लेते सुना था। सोचा, चुन्नी को जरूर मालूम होगा। उसी से पता चलेगा।
करीब एक हफ्ते तक रमा से भेंट नहीं हो पाई। वह रतन के परिवार वालों के साथ व्यस्त रही। एक दिन आई तो रतन के बारे में बातचीत करती रही। इसी पूर्णिमा को सगाई है उसकी। बड़ी धूमधाम से होगी यह रस्म और ठंड में ब्याह। दूसरे दिन आई तो बड़ी उदास दिखी — क्यों रमा, क्या बात है ?
“कुछ नहीं। ऐसे ही अच्छा नहीं लगता है आजकल।” थोड़ी देर अनमनी-सी बैठी रही और चली गई।
तीसरे दिन रमा नहीं आई और मैं भी एक-दो दिन उसकी खोज-खबर लेने नहीं जा पाई और जिस दिन शाम को मैं उससे मिलने गई तो घर खाली पाया। अम्माजी आवाज सुन कर भगवान वाले कमरे से बाहर आईं। “आ गई तू। कितने दिन बाद आई है आज। मैं बहुत देर से तेरी याद कर रही थी। मेरा एक काम कर दे। ये चिट्ठी है और ये रहा पता। इस पर ये चिट्ठी चुपचाप दे आना। रमा से भी मत कहना।” लिफाफे पर रवि का नाम देख कर चौंक गई। उस पर लिखा था — बेटा रवि के लिए।
‘रवि’ ये कौन हैं ? अम्माजी अंदर चली गईं थीं शायद उन्होंने सुना नहीं हो। मैंने पूछने के बाद उनकी ओर देखा था। उनकी आंखें... उन्होंने सुन ली थी मेरी बात, शायद वे रो रही हैं। मैं सहम गई और घर आ गई।
दूसरे दिन स्कूल से लौटते समय विष्णु नगर गई। 18/2, ए ब्लॉक तक पहुंचने में काफी समय लगा। किसी का भी मकान ढूंढ़ना मेरे लिए वैसे ही एक कठिन काम रहता है। फिर एक रहस्यमय व्यक्ति का तो और भी कठिन लग रहा था। पहुंची तो दरवाजा खुला था — अंदर तक साफ-साफ नजर आ रहा था। पहले कमरे में कुछ मूढ़े रखे थे, एक छोटा-सा दीवान और उस पर बिखरे कुछ खिलौने। कमरा खूब साफ-सुथरा था। वैभव उसमें कहीं हो ही नहीं सकता था पर जो सुरुचि सम्पन्नता उस छोटी-सी बैठक में थी वह रमा के यहां के ड्रॉइंग रूम में मुझे कभी नजर नहीं आई। सामने की दीवार पर लगी एक ग्रुप फोटो में एक को छोड़ कर बाकी सभी शुक्ला परिवार के थे। मैंने दरवाजा खटखटाया और दूसरे कमरे से आवाज आई— “अंदर आ जाइए। कौन हैं ? मैं अभी आ रही हूं।”
“मैं... मैं क्या कहती कि कौन हूं।”
“मैं... मिसेज शुक्ला ने भेजा है, जयेन्द्रगंज से”, कहती हुई बैठक में अंदर तक पहुंच चुकी थी। वे बच्चे को सुला रही थीं। धीरे से बोलीं— “ओह, आपको अम्माजी ने भेजा है। कैसी हैं वो ? रमा कहां है आजकल।”
मैंने बातचीत करते हुए लिफाफा उनकी ओर बढ़ा दिया। उन्होंने उलट-पलट कर देखा और गद्दे के नीचे सम्भाल कर रख दिया। मेरे बहुत मना करने पर भी मानी नहीं। चाय-नाश्ता करवाया। और फिर कुछ देर बाद वहां से उठने को हुई तो वे बोलीं— “कल आ कर जवाब ले जाएंगी क्या आप ?” हां कह कर मैं आ गई। उनकी बातों से सिर्फ यही पता चला कि रवि उनके पति हैं। ‘रवि’ एक बड़ा रहस्य बना हुआ था।
शाम को रमा के घर अम्माजी से मिलने गई। काफी लोग आए उस शाम उनके घर। मंझले भैया-भाभी, जिज्जी का परिवार। पारिवारिक बैठक में सगाई की चर्चा चल रही थी। अम्माजी से अकेले में मिलना नहीं हो पाया। उनकी आंखें निरंतर मेरी ओर लगी हुई थीं। सैकड़ों प्रश्न थे उनमें। कौन मिला ? क्या हुआ ? जवाब ? पर वे उस भीड़ में कुछ भी पूछने का मौका नहीं निकाल सकीं। मैं उन्हें किसी तरह इतना ही बता सकी कि, “रवि की पत्नी और बड़ा प्यारा बच्चा, दो ही लोग मिले। जवाब कल मिलेगा।” उनकी आंखों में एक बार फिर मैंने आंसू देखे। उसी समय बड़े भैया ने आवाज दी। पल्ले से आंखें पोंछते हुए वे ड्रॉइंग रूम की बैठक में शामिल होने चली गईं। मैं घर आ गई।
रात को बहुत देर तक मैं रवि के बारे में सोचती रही। कौन हो सकता है यह इनका ? अम्माजी इतनी भावुक क्यों हो जाती हैं इस प्रसंग से आदि। सुबह उठ कर चुन्नी से पूछा, “रवि कौन है ? तो बोली चंदा का भाई है और कौन। वो अलग है इन लोगों से।”
मैंने पूछा, “क्यों ?” “तुम्हें नहीं पता। मुझे भी नहीं पता।”
स्कूल से लौटते समय फिर विष्णु नगर गई। आज दरवाजा बंद था। घंटी बजने पर उन्हीं ने दरवाजा खोला जो कल मिली थीं। मैं तो उनका नाम भी नहीं पूछ पाई थी। सोचा आज पूछ लूंगी। — “आइए। मैं बड़ी देर से आपकी राह देख रही थी। कल तो आप जल्दी आ गईं थीं।”
“हां, आज पीरियड देर तक थे मेरे।”
“आप पढ़ाती हैं।”
“हां, यहीं सरकारी स्कूल में हूं। चंदा वहीं पढ़ती है। रमा मेरी और चंदा मेरी बहन चुन्नी की सखी है।”
“कल मैंने रवि को आपकी लाई चिट्ठी दे दी थी। अभी थोड़ी देर पहले ही वे बाजार गए हैं। आते ही होंगे। आपको बहुत जल्दी तो नहीं है न।” थोड़ी देर हम दोनों चुप रहे। चुप्पी टूटी उनके बच्चे के कारण। वह मेरी तरफ देख कर हाथ-पांव मार रहा था। मैंने उसे उठा लिया और उससे बातें करने लगी। मैं उसकी हर बात समझ रही थी और वह मेरी। पता ही नहीं चला, कोई अंदर आ कर खड़ा हो गया था — “नमस्ते, आप अम्माजी की संदेश वाहक हैं।” मैंने मुंह उठा कर देखा। हूबहू रमा के रंग रूप का एक प्रभावशाली व्यक्ति सामने खड़ा था।
“इतने ध्यान से क्या देख रही हैं। मैं ही रवि हूं। बैठिए खड़ी क्यों हो गईं। जवाब लेने आई हैं आप। अम्माजी की पत्रवाहक मेरे लिए कितनी महत्वपूर्ण हो सकती हैं यह आप जानती ही होंगी। अरे भाई, तैयार है न सब कुछ। बिना भोजन के आप यहां से जा नहीं पाएंगी।”
भोजन करते हुए पता चला कि रवि विवाह से पहले और विवाह के बाद भी बहुत दिनों तक परिवार में रहे हैं। विवाह के एकाध वर्ष बाद आपसी तनाव के कारण अलग हो गए। तनाव के कारण — कुछ विशेष नहीं थे। बड़े भैया, मंझले भैया की पटरी नहीं बैठती थी रवि से। धीरे-धीरे तनाव बढ़ता गया और अम्माजी बहुत परेशान रहने लगीं। एक दिन अम्माजी से बड़े भैया ने कहा — “अम्मा, यह तुम्हारा लाड़ला बड़ा आदर्शवादी बनता है। तुमने इसे बहुत सिर चढ़ा रखा है। इसके कारण हम लोगों को सदा नीचा देखना पड़ता है। तुम इसे समझा नहीं सकतीं कि हमारे घर में इसे जैसा हम चाहेंगे उसी तरह रहना होगा।”
अम्माजी क्या समझातीं रवि को, सिवाय इसके कि तुम अब साथ नहीं रह सकोगे हम सबों के। एक दिन रवि खुद अलग हो गया। रवि के जाने से यदि किसी को झटका लगा था तो वह अम्माजी को और रमा को। रमा तब हॉस्टल में थी। छुट्टियों में घर आई तो वह समझ नहीं सकी और कोई उसे समझा भी नहीं सका। उसे घर, घर जैसा नहीं लगा। कुछ लोग रवि को भूलते गए और जिन्हें वह याद रहा वे उसके बारे में भूल चुके हैं मानो ऐसा जताते हुए चुप रहने लगे। धीरे-धीरे रवि का नाम कभी भी किसी प्रसंग में आता तो ऐसे, जैसे कोई तीन तिहात का हो। रवि शुक्ला परिवार के बीच अपनी पहचान खो चुका था। कभी-कभार सामूहिक समारोहों के अवसर पर वे लोग उसे बुलाते थे तो वह भी अम्माजी के कारण।
“खाना हो जाने के बाद रवि ने अपनी पत्नी से पूछा — क्या खबर भिजवा दूं अम्माजी को। कब जाएंगे ?”
“जब तुम कहो तब।”
“ठीक है तो मैं अम्मा को लिख देता हूं कि सगाई में आना मुझे जरूरी नहीं लग रहा है। हमारे आने से तुम्हें भी परेशानी होगी। शादी में ही आएंगे।”
“क्या आप लोग सगाई में नहीं आएंगे ? इतनी पास रह कर भी।” मेरे मुंह से अनायास निकल गया.
प्रयत्नपूर्वक रोका हुआ आवेग फूट चुका था। वे रवि को समझा रही थीं और मै भौंचक्की खड़ी थी कि यह मुझसे क्या हो गया।
कुछ देर में जब वातावरण नॉर्मल-सा हुआ तो रवि ने कहा, “असुविधा के लिए क्षमा करेंगी पर अब मैं कुछ लिख नहीं सकूंगा— आप अम्माजी से कह देना कि विवाह में तो हम लोग आएंगे ही। मेरी छोटी बहन का विवाह है। न आने जैसी कोई बात ही नहीं उठती। लेकिन...”
“छोटी बहन ?”
“हां, रमा मेरी बहन है। क्या आप नहीं जानतीं कि मैं रमा का सगा भाई हूं। उससे बड़ा। अम्माजी का सबसे छोटा और लाड़ला बेटा रवि।”
घर लौटते वक्त मुझे रोता हुआ रवि याद आता रहा। मैं सोचती रही कभी किसी को इस तरह भी अलग किया जा सकता है। सच में ‘रवि’ रमा का तीसरा भाई है और अम्माजी का छोटा और लाड़ला बेटा।
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वर्षों आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग और केंद्र सरकार के अन्य संचार माध्यमों में कार्यरत रहने के बाद नन्दिता मिश्र अब स्वतंत्र लेखन करती हैं।