आपको डॉ मधु कपूर का नवीनतम लेख उनके पिछले बहुत सारे लेखों से इस मायने में अलग लगेगा कि दर्शनशास्त्र की गंभीर भावभूमि पर खड़ा होने के बावजूद यह लेख हमारे दैनंदिन व्यवहार का हिस्सा लगता है. लेख मैत्री के बहुआयामी स्वरूप और उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर विचार करता है। उनका कहना है कि मित्रता को केवल सामाजिक सम्बन्ध नहीं, बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक और मानवीय उत्कर्ष की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए।











