अध्यात्म-एवं-दर्शन

Hybrid Honesty: What, When and How

Honesty is often treated as a simple choice between truth and falsehood. Yet human experience suggests that things are rarely so clear-cut. Fear, compassion, timing, circumstance and responsibility all shape the ways in which people tell or do not tell or rather struggle with the truth. In this thoughtful essay, Dr Sandeep Bhatnagar, a new addition to Raag Delhi's growing circle of contributors, explores the idea of "hybrid honesty" and examines its many forms in everyday life.

मैत्री सम्बन्ध का बहुआयामी स्वरूप - संबंधों की श्रृंखला में मैत्री पर चर्चा


आपको डॉ मधु कपूर का नवीनतम लेख उनके पिछले बहुत सारे लेखों से इस मायने में अलग लगेगा कि दर्शनशास्त्र की गंभीर भावभूमि पर खड़ा होने के बावजूद यह लेख हमारे दैनंदिन व्यवहार का हिस्सा लगता है. लेख मैत्री के बहुआयामी स्वरूप और उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर विचार करता है। उनका कहना है कि मित्रता को केवल सामाजिक सम्बन्ध नहीं, बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक और मानवीय उत्कर्ष की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। 

 

कार्य–कारण का सम्बन्ध: नियतत्व, संभाव्यता और आकस्मिकता

कार्य–कारण का सम्बन्ध केवल दर्शन का विषय नहीं, हमारे रोज़मर्रा के अनुभवों का भी हिस्सा है। डॉ. मधु कपूर इस लेख में नियतत्व, संभाव्यता और आकस्मिकता के बीच के सूक्ष्म ताने‑बाने को खोलती हैं—जहाँ मिट्टी से घड़ा बनता है, बीज से वृक्ष और विचार से कर्म। यह लेख हमें याद दिलाता है कि हर घटना के पीछे एक क्रम है, और कभी‑कभी वही क्रम अनिश्चितता में नई संभावना भी जन्म देता है.  

जीवन का अनुशासन: जीवन का हर क्षण पर्युषण हो

पर्युषण जैन परंपरा का सबसे महत्वपूर्ण आध्यात्मिक उत्सव है, जो आत्मशुद्धि और संयम का अभ्यास कराता है। इसमें उपवास, सामायिक, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान जैसे साधन किए जाते हैं ताकि मनुष्य अपने भीतर झाँक सके और कषायों (क्रोध, मान, मोह, लोभ) का क्षय कर सके। इसमें उपवास, सामायिक, प्रतिक्रमण, प्रत्याख्यान जैसे साधन किए जाते हैं ताकि मनुष्य अपने भीतर झाँक सके और कषायों (क्रोध, मान, मोह, लोभ) का क्षय कर सके।

मैं से हरि तक: तादात्म्य की यात्रा

डॉ. मधु कपूर की सम्बन्धों पर चल रही दार्शनिक श्रृंखला का यह चौथा लेख है। अपने पिछले लेख में  उन्होंने स्व और स्वामित्व के बीच सम्बन्ध  पर चर्चा की थी और कि बताया था कि स्वामित्व की सीमाएँ कहाँ तक जाती हैं. आज के लेख में वह भारतीय दर्शन में, विशेषकर वेदांत में उल्लिखित 'तादात्म्य सम्बन्ध' पर चर्चा कर रही हैं. 

सम्बन्धों पर दार्शनिक दृष्टि : स्व-स्वामित्व की परिधि में सम्बन्ध

डॉ. मधु कपूर की सम्बन्धों पर चल रही दार्शनिक श्रृंखला का यह तीसरा लेख है। पहले लेख में उन्होंने सम्बन्ध की सत्ता को यथार्थ या मानसिक कल्पना के रूप में परखा था, और दूसरे लेख में एफ. एच. ब्रैडली तथा नागार्जुन के दृष्टिकोण से सम्बन्ध की असंगति को उजागर किया था। आज के लेख में वे हमें एक नए आयाम पर ले जाती हैं—स्व और स्वामित्व के बीच सम्बन्ध। यह लेख पाठक को सोचने पर मजबूर करता है कि स्वामित्व की सीमाएँ कहाँ तक जाती हैं. 

 

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RaagDelhi: देश, समाज, संस्कृति और कला पर विचारों की संगत

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