दर्शनशास्त्र की विश्वविद्यालयी या अकादमिक पढ़ाई में हमें पता नहीं कि 'योग वशिष्ठ' नामक ग्रन्थ का ज़िक्र आता है या नहीं किन्तु बहुत वर्ष पहले हमने जब कहीं सुना कि यह बहुत उच्च कोटि का धार्मिक ग्रन्थ है जिसमें कई महत्वपूर्ण प्रस्थापनाएं की गईं हैं तो हमने भी शौक-शौक में इसे ले लिया. योग वशिष्ठ की याद आई जिसमें कई प्रसंगों में संसार को एक जाग्रत स्वप्न के रूप में समझाया गया है। अब डॉ मधु कपूर इस किश्ती को किस तरफ ले जाएँगी, यह कहना तो अभी मुश्किल है लेकिन स्वप्न-श्रृंखला का पहला निबंध आपके लिए प्रस्तुत हैं. पत्रिका से जुड़ रहे नए पाठकों को बता दें कि यदि उन्हें दर्शनशास्त्र में रूचि है तो डॉ मधु कपूर के नाम पर क्लिक करके उनके सभी निबंध एक साथ देख सकते हैं.












