नई देशनाएं - अजंता देव के नए प्रयोग
अजंता देव इस बार हमारे साथ अपने नए साहित्यिक प्रयोग शेयर कर रही हैं - 'देशना' के रूप में! जैसा कि नीचे अपनी टिप्पणी में उन्होंने भी स्पष्ट किया है कि देशना मूल रूप से बौद्ध परंपरा का शब्द है. सुधि पाठकों के लिए यह बताना दोहराव भर होगा कि बुद्ध के उपदेशों को 'धर्मदेशना' या केवल देशना कहा जाता है. यानि वह बात जो किसी को रास्ता दिखाने,समझाने या झकझोरने के लिए कही जाये. अजंता ने इस पुराने शब्द को उठाकर हिंदी साहित्य के सन्दर्भ में नया रूप दे दिया है. हमें नहीं मालूम कि उनसे पहले भी क्या देशना को लेकर ऐसे प्रयोग हुए हैं? देशना के रूप में हमारे सामने अजंता जी की जो सामग्री आई है, उसके बारे में हमें यह लग रहा है कि यह शुद्ध गद्य और शुद्ध कविता के बीच की कोई नई जगह ही है. वैसे हर पाठक रचना को पढ़ते समय अपनी ही रचना रचता है, इसलिए आप स्वयं तो यह तय करेंगे ही कि आप क्या पढ़ रहे हैं. अपनी टिप्पणी में अजंता देव ने इन रचनाओं को 'अवांगार्द रचना कहलाने की हक़दार' भी माना है. अवांगार्द फ्रेंच शब्द Avant-garde' का हिंदी रूप है जिसका अर्थ है - अग्रगामी, प्रयोगधर्मी, परम्परा से अलग हटकर आगे बढ़ने वाली कला या साहित्य! अंत में यह कि आप इन उम्दा रचनाओं को हमारी दी गई व्याख्याओं को भुलाते हुए पढ़ेंगे तो शायद बेहतर होगा.
नई देशनाएं - अजंता देव के नए प्रयोग
युग बदलता है तो उसके अनुसार उपदेश भी बदलते हैं। वह बुद्ध का युग था तो बुद्ध की देशना थी। अब यह कुटिल युग है तो देशनाएं भी ज़ाहिर हैं नयी होंगी और थोड़ी कुटिल होंगी। इन देशनाओं को लिखने वाली भी कुटिल है और उसका ख़ास निशाना हिन्दी साहित्य का परिदृश्य है। हिंदी में व्यंग्य-हास्य की लंबी परंपरा रही है पर इस समय इसकी बहुत कमी देखी जा रही है। हिन्दी जगत में या तो प्रशंसा की झड़ी लगाई जा रही है अथवा निन्दा की कीचड़ उछाली जा रही है। एक चुटीला वाक्य ढूँढे नहीं मिलता। गुरु गंभीर विमर्श के तले हास्य और इसके बीच में छिपा तीखापन दम तोड़ रहा है। नयी देशनाएं इस अर्थ में अवांगार्द रचना कहलाने की हक़दार है,क्योंकि यह अपने गठन में कविता भी नहीं है और गद्य भी नहीं। इसकी शैली तिलिस्मी है। इसमें केवल दो पात्र हैं और एक अदृश्य आवाज़ है। इसमें किसी तरह का लिहाज नहीं किया गया है और एक सूत्र वाक्य साथ रह जाता है। यही वाक्य नयी देशना होती है।
इसे इसी वर्ष किताब की शक्ल में लाया जा रहा है। इसका कोई प्रकाशक नहीं होगा,बिक्री नहीं होगी ,खरीददार भी नहीं होगा। रचनाकार इसे स्वयं भेजेगी और पाने वालों की सूची भी वही बनाएगी।
।। नयी देशनाएं ।।
1.
मैं अभिभूत थी
कि वह बदलाव की बात करता है
वह बदल देगा कविता
वह बदल देगा इतिहास
वह बदल देगा समाज
उसके तेवर ही नहीं
उसके विचार तक बदलाव की गवाही देते हैं
मैने कहा मुझे विश्वास है तुम लाकर रहोगे बदलाव
तभी
एक
आवाज़
आई
दुनिया बहुत बड़ी है और विचार अनेक,उसे कपड़े बदलने को कहो ।
2.
वह कसमसाता रहता था
अक्सर दोनों हाथ मुट्ठी में बांध कर
पुकार उठता - मैं यायावर हूं
मुझे लगता अब निकला कि तब निकला
एक ऐसी ही सुबह
मैने दिल कड़ा किया और कहा
चलो शहर की सीमा तक मै भी चलती हूं
आगे की यात्रा तुम्हें अकेले ही पूरी करनी है
तभी
एक
आवाज़
आई
यायावर भीतर यात्रा करता है,उसे कहो सामने के बगीचे में टहलने से शुरू करे ।
3.
क्या होगा पृथ्वी का
उसने कहा मुझसे
जब आबादी बढ़ गई है मनुष्य की
घट गई है पशुओं की
मैने भी चिंतित होना शुरू किया
आशा भरी नज़र से देखा उसे
यह ज़रूर कोई योजना बना चुका है
हर्षातिरेक से मेरा गला भर्रा गया
तुम क्या करोगे धरती के बोझ को कम करने के लिए
तभी
एक
आवाज़
आई
प्रकृति प्राणियों पर नहीं,प्राणी प्रकृति पर निर्भर है। उसे कहो अपना वज़न कम करे ।
4.
वह लड़ाई को उत्सुक
तलवार भांजने को तैयार हो गया था
उसके आसपास शत्रु ही ही करते नाच रहे थे
उसने निकाल लिए थे अपने अस्त्र-शस्त्र और शास्त्र
मुझे भरोसा था कि जीतना चुटकियों का काम है
आख़िर उसके शौर्य पर मुझे कोई शक न था
लम्बे अरसे से उसके शत्रु उस पर ओछे वार करते आए हैं
और वह उन्हें मित्र की बदमाशी कह कर भूलता रहा है
मैने कहा तुम जन्मजात वीर हो
शत्रु चाहे जितना भी गिर जाए तुम पराजित नहीं हो सकते
तभी
एक
आवाज़
आई
वीरता जन्मजात गुण नहीं ,सामने वीर हो तभी वीरता प्रकट होती है । उसे कहो कि वह कभी कभी पड़ोसियों से झगड़ा कर ले ।
5.
क्या वह असुंदर था ?
अगर उसे लगता था ऐसा
तो वह असुंदर ही होगा
वरना वह क्यों मेहनत करता रहता है
छवि सुधारने के लिए ?
मुझे उसकी मदद करनी चाहिए
सुनो !
तुम्हें ऐसी कविता लिखनी चाहिए
जो लोगों को लुभाए
तुम्हें अपना घर ऐसे सजाना चाहिए
जैसे तुम अतिथि की प्रतीक्षा में हो हरदम
तुम्हें बहुत महंगे फ्रेम में जड़वाना चाहिए सबसे पहले पुरस्कार का प्रमाणपत्र
तभी
एक
आवाज़
आई
छवि हमेशा दूसरे बनाते हैं , कोई अपनी छवि नहीं बना सकता। उसे कहो वह फलों की टोकरी पर चिपकी चमकीली फ़र्रियाँ हटाए। फल ख़ुद ही सुन्दर होते हैं ।
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अजंता देव - जोधपुर में प्रवासी बंगाली परिवार में ३१ अक्तूबर, १९५७ को जन्म. राजस्थान विश्वविद्यालय, जयपुर से हिन्दी साहित्य में एम.ए.
शास्त्रीय संगीत (गायन) में बचपन से प्रशिक्षित, साथ ही नृत्य, चित्रकला, नाट्य तथा अन्य कलाओं में गहरी रुचि एवं सक्रियता होने के बावजूद मूलतः कवि के रूप में पहचान।
स्कूल के दिनों से कविता लिखना शुरू किया, पाँच कविता-संग्रह 'राख का क़िला', 'एक नगरवधू की आत्मकथा' ,"घोड़े की आँखों में आँसू"'बेतरतीब' और हॉल की बत्तियां। एक उपन्यासिका "ख़ारिज लोग" प्रकाशित हुई है। बच्चों के लिए एक गल्प ' नानी की हवेली' प्रकाशित । हिंदवी, कविता कोश ,स्त्रीदर्पण, पश्यन्ती में कवि के रूप में दर्ज।
बांग्ला से नीरेन्द्रनाथ चक्रवर्ती व शक्ति चट्टोपाध्याय की कविताओं के और अंग्रेज़ी के ज़रिये ब्रेष्ट की कविताओं के हिन्दी में अनुवाद ।
राजस्थान पत्रिका और धर्मयुग में पत्रकारिता करने के बाद 1983 से भारतीय सूचना सेवा में। 2010 में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के बाद स्वतंत्र लेखन। राजस्थान साहित्य अकादमी की ओर से विशिष्ट साहित्यकार सम्मान प्राप्त। इंडिया फाउंडेशन फॉर आर्ट, बेंगलुरू की ओर से सम्मानित.