सत्येन्द्र प्रकाश ने अब तक यहाँ दर्जन भर से भी ज़्यादा ऐसे लेख लिखे हैं जिनमें ग्रामीण पृष्ठभूमि का ऐसा जीवंत चित्रण होता है कि हमें ढेर सारे पाठकों से सकारात्मक प्रतिक्रियाएँ मिलती है। इस बार उन्होंने विषय चुना है अपने शिक्षारंभ के बारे में बताने का - हमने मोटा-मोटा हिसाब लगाया तो समझ आया कि करीब-करीब छ: दशक (दो-तीन वर्ष कम होंगे) पूर्व मकर संक्रांति के दिन यह हुआ होगा। इतनी पुरानी घटना को भी उन्होंने ऐसे ब्यान किया है जैसे अभी उनकी आँखों के सामने सब हो रहा हो। नए धान का चूड़ा नए गुड़ और दही के साथ (दही-चूड़ा) और नए धान के चावल से बने मुरमुरे और तिल तथा गुड़ की लाई (लड्डू) - इन सब खानों की खुशबू आएगी आपको।











