ऐसा रोज़ रोज़ तो होता नहीं कि साहित्यिक पत्रिकाओं की समस्याओं पर बात करे, उनमें कार्यरत लोगों के (संपादक सहित) प्रशिक्षण की भी बात हो और कहीं-कहीं उनकी मुश्किलों को सरल ढंग से निपटाने के उपाय भी बताये जा रहे हों.जब हमें डॉ शैलेश शुक्ला से यह सूचना मिली कि वह इंदौर में आयोजित दो दिवसीय ‘साहित्यिक पत्रिका समागम’ में भाग लेने गए हुए हैं तो हमने उनके सामने अपनी मांग रखी कि हमें इस कार्यक्रम की रपट भेज दीजिएगा तो उन्होंने हमारे अनुरोध को स्वीकार करते हुए यह रपट भेजी है. उम्मीद है कि आपको भी तनावपूर्ण माहौल में यह एक स्वागतयोग्य और उपयोगी लेख लगेगा.












