पारुल हर्ष बंसल की दो नई कविताएँ हमारे पास आईं हैं जिनमें से एक हम आज प्रकाशित कर रहे हैं और दूसरी आगे के लिए सुरक्षित रख ली है. इस वेब पत्रिका में आपने इनकी पहले जो कविताएँ पढ़ी होंगी, उनमें ज़्यादातर में स्त्री-विमर्श ही प्रमुख विषय रहता था. आप देखेंगे कि उनकी आज की कविता एक नए तेवर में है. ऐसा लगता है कि पारुल अपनी काव्य-यात्रा में नए-नए सोपान तय कर रही हैं.











