बाबा का मसनद
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बाबा का मसनद
नन्दिता मिश्र
कई महीनों बाद हम चारों भाई-बहन एक साथ दादी के पास कुछ दिन रहने आये हैं। इससे पहले बाबा याने दादाजी के नहीं रहने पर घर आये थे। हमारे पिताजी बहुत पहले स्वर्ग सिधार गये थे।
उनके ना रहने के बाद हम अम्मा के साथ दादा-दादी के पास सागर आ गये। हमारी अम्मा पिताजी के जाने के बाद बुरी तरह से टूट गयीं थीं। सदा बीमार रहती थीं। पिताजी के जाने के दो साल बाद उनका भी देहांत हो गया। दादा-दादी ने हमें पाला। हमारे लालन पालन में कोई कसर नहीं छोड़ी। पढ़ाई पूरी होने के बाद हम चारों नौकरी करने दूसरे शहरों में चले गये। जिसे जब मौका मिलता वो आ कर दादा-दादी के पास एकाद दिन रह कर चला जाता।
हमारे बाबा एक बहुत सुलझे हुए व्यक्ति थे। मन के निर्मल। हमारे यहां एक बहुत पुराना ड्राइवर है पवन। वो और महाराजिन अम्मा घर के पीछे बने आउट हाउस में रहते हैं। दादा-दादी का संसार इन्हीं लोगों के बल पर सुचारू रूप से चल रहा था। ड्राइवर का एक बेटा है देवा। बाबा ने उसे बचपन से अपने बेटे की तरह हम लोगों के साथ बड़ा किया है। अपनी पढ़ाई पूरी करके वो बाहर नौकरी करने नहीं गया। उसे सागर में ही अच्छा काम मिल गया। उसका बड़ा सहारा था।
बाबा के जाने के बाद दादी के लिये उसका वहां रहना बहुत अच्छा रहा। हम लोगों को दादी की ज्यादा फिक्र नहीं करनी पड़ती है।
दादी की उम्र 72 की हो गयी है। वो कभी ऐसी बीमार नहीं हुईं कि अस्पताल जाना पड़ा हो। पड़ौस में एक डाक्टर भैया रहते हैं, वो हमारे फैमिली डाक्टर हैं, सब देख लेते हैं। एक दिन उनका फोन आया तो मैं घबरा गयी। उन्होंने बताया दादी थोड़ी उदास रहने लगीं हैं। डिप्रेशन जैसा लग रहा है। अगर तुम आ सकती हो तो दो चार दिन को आ जाओ। मैं जाने की तैयारी कर ही रही थी कि दादी का फोन आ गया। मेरी तबीयत आजकल कुछ ठीक नहीं रहती। मैं तुम सबके साथ कुछ समय बिताना चाहती हूं। मैंने सब को फोन कर के बुला लिया है। शायद उसे ऐसा लग रहा है कि वो अब जाने वाली है। जाने से पहले बच्चों के साथ कुछ समय बिता ले। हम सब उसके के एक फोन काल पर आ गये। वो बहुत खुश हो गयीं। हम चारों को भी साथ रहने का मौका कहां मिलता है। सब अलग अलग शहरों में नौकरी कर रहे हैं।
हमें सागर आये हुए तीन दिन हो गये थे। बहुत मज़ा आ रहा था। बड़े भैया कमलकांत ने सुबह चाय के वक्त पूछा दादी ये तो बताओ हमें क्यों बुलाया है। वो बोलीं ये कैसा सवाल है। मेरा मन हुआ कि हम लोग कुछ दिन साथ रहें। अच्छा लगेगा। क्यों ठीक नहीं किया क्या। तुम सब भी आपस में कब मिलते हो। वो बात भी मेरे मन में थी। भैया ने कहा कि उन्हें दो दिन बाद जाना होगा क्योंकि वो सिर्फ 5 दिन की छुट्टी ले कर आये हैं। अम्मा ने कहा ठीक है। ऐसा करो तुम चारों भी बता दो यहां कितने दिन रुक सकोगे। चार मतलब मैं सरस, मुझसे छोटा रजनीकांत और सबसे छोटी बहन मध्यमा और बड़े भैया। सभी एक हफ्ते के लिये आये थे। फिर अम्मा ने देवा से पूछा और तूने कितने दिनों की छुट्टी ली है रे। वो बोला, आई तू जब तक चाहे तब तक। उसका लालन पालन हम भाई बहनों के साथ ही हुआ है। दादी और बाबा ने हममें और उसमें कोई अंतर नहीं किया। जैसे हम रहे वैसे वो रहा। जैसा हमने पहना ओढ़ा वैसा उसने भी। फिर भी हम भाई बहनों के मन से हमारे बीच का अंतर कभी गया नहीं। छुटकी याने मध्यमा और रजनी कान्त उसके सबसे करीब थे। वो उसकी बहुत तरफदारी करते थे। उन तीनों की दोस्ती बड़ी गहरी थी।
बाबा के जाने का जो असर देवा पर हुआ वैसा हम लोगों पर नहीं हुआ। देवा बिल्कुल चुप हो गया था। पढ़ाई के बाद का अपना समय दादी के पास बैठ कर बिताता था। उनके हाथ पांव दबाता। उन्हें रामायण पढ़ कर सुनाता। जब बाबा का देहांत हुआ तब देवा उनके पास ही था। अस्पताल में वही रहता था। उसने उनकी खूब सेवा की। हम भाई बहन खबर मिलते ही आ गये थे। बाबा चाहते थे कि उनके जाने के बाद किसी भी तरह का पूजा पाठ नहीं कराया जाये। अम्मा जो दान पुण्य करना चाहें वो करें। हमने उनकी इच्छा का सम्मान किया। दादी ने अंध महाविद्यालय में 25 हज़ार रू दान में दे दिये।
बाबा के जाने के बाद एक समस्या सामने खड़ी थी। दादी को अब अकेले रहना पड़ेगा। वो बड़ी जीवट वाली थीं। उन्होंने जता दिया कि ये कोई समस्या नहीं है। उन्होंने काम वाली बाई सुशीला से बात करली है। वो और उसका पति आउट हाउस में रहने आ जायेंगे। और फिर तुम लोग हो आते जाते बने रहना। और सबसे बड़ी बात कि देवा तो है ही। बाबा का देहांत भरी ठंड में दिसम्बर की 10 तारीख को हुआ था। तब हम लोग कुछ दिन यहां रहे। उसके बाद मैं अक्सर दादी के के पास आ जाया करती थी। मुझे खुद भी अच्छा लगता था। दूसरे शनिवार रविवार का बढ़िया उपयोग हुआ।
फिर मैं अगस्त में राखी पर आई तब दादी ने मुझसे कहा था देख सरस मैं अपने सामने मेरे पास जो कुछ भी है वो सब तुम लोगों को दे कर फुरसत पाना चाहती हूं। मैंने समझाया कि इसकी इतनी जल्दी क्यूं है। है रे। मुझे सारी चिन्ता देवा की है। ये कमलकांत उसे कुछ नहीं देगा। वो उसे फूटी आंख भी नहीं पुसाता। दादी जिद पर आ गयी थीं। तो मुझे कहना पड़ा कि तुम जब चाहो तब हम लोग आ जायेंगे। तुम 8/10 दिन पहले फोन करना ताकि हम लोग छुट्टियों का इंतजाम कर सकें। दादी के मन में बाबा की बरसी पर सबको बुलाने की बात थी। उन्होंने मुझसे शिकायत भी की कि कमल,रजनी,मध्यमा एक बार भी मेरे पास नहीं आये। बस तुम मेरी खोज खबर ले लेती हो। मेरे पास जो भी है वो सब बराबर बराबर तुम लोगों को दे दूंगी और देवा को ये घर। तेरे बाबा की भी यही इच्छा थी। घर देवा के पास रहेगा तो बिकेगा नहीं। वो इसकी देखभाल करेगा। तुम लोगों को जब अपने घर की याद सताये तब आते जाते बने रहना। मैंने कुछ कहा नहीं। दादी ने मुझसे कहा ये फैसला मैं तभी बताऊंगी जब तुम सब यहां आओगे। तुम भी किसी से मत कहना।
जैसे ही नवम्बर खत्म हुआ दादी ने हम लोगों को फोन करके बाबा की बरसी पर घर आने के लिये कहा। हमने आपस में बातचीत करके एक साथ छुट्टियां बिताने का इंतजाम कर लिया और सागर आ गये। बहुत दिनों में मिले थे, बातों की कोई कमी नहीं थी। वैसे भी हम लोग बहुत बोलते हैं। यात्रा की थकान तो थी ही सब जल्दी सोने चले गये। सुबह सो कर उठे तो महाराजिन ने सूचना दी कि चाय दादी के कमरे में होगी। मुंह हाथ धोकर सब वहीं पहुंचे।
दादी अपनी रॉकिंग चेयर पर बैठी झूला झूल रही थीं। हम लोगों के पहुंचते ही वे देवा की मदद से उठीं और दीवान पर आ कर बैठ गयीं। मैंने उनके मन मुताबिक तकिये लगा दिये। बड़े भैया ने बड़े हल्के अंदाज में कहा यार दादी अब ये बाबा आदम के ज़माने का दुनिया भर के गुठले वाला मसनद अलग कर दो। मैं अभी बजार जाऊंगा तो नया ला दूंगा। उनका वाक्य शायद पूर्ण विराम तक नहीं पहुंचा था और दादी ने भारी भरकम आवाज में पूछा और क्या क्या नया ला दोगे। नहीं दादी ये अब बहुत खराब हो गया है। अच्छा नहीं लगता। अब ये मत बताना कि तुम्हारे बाबा जब लंदन गये थे तब लाये थे। हम सब वो किस्सा सैकड़ों बार सुन चुके हैं। हम लोगों ने भैया की तरफ देखा। मैंने और रजनीकांत ने भैया को इशारा भी किया कि रहने दो। पर उन्हें नहीं देखना था सो नहीं देखा। मैंने बीच में टोका भैया अगर अम्मा उसे बदलना नहीं चाहती तो रहने दो। तुम वैसे ही दो नये मसनद घर के लिए ला दो।
इस बीच महाराजिन चाय ले आई थी। सब चाय में लग गये। ये पुराना मसनद बाबा का है। जबसे बाबा गये वो दादी के पास आ गया। हमारे घर की शान होता था किसी समय। मखमल का है और उसमें रुई नहीं थी, उसमें किसी विशेष पक्षी के पंख भरे थे। बचपन में हम सब इस फिराक में रहते थे कि चाहे थोड़ी देर को ही सही पर उस पर सिर टिकाने का मौका मिल जाये। कभी कभी शर्त भी लग जाती थी।हर एक के घर में बाबा के मसनद जैसी बहुत सी ऐसी वस्तुएं हो तीं हैं जो अब किसी काम की नहीं हैं। पर हम उन्हें फेंकते नहीं क्योंकि वो हमारे मन से जुड़ी होती हैं। हमारा उनसे भावनात्मक लगाव होता है। सेंटीमेंट्ल वैल्यू। ऐसा ही ये गोल तकिया है।
चाय निपटी। धीरे-धीरे सब वहां से खिसक लिए क्योंकि माहौल थोड़ा भारी हो गया था। बस मैं और देवा वहां थे। दादी ने कहा मैं एक पारिवारिक मिलन आयोजित करना चाहती हूं। एकाध महीने बाद। सब चाचा-बुआ और जिनसे अपना मन मिलता है और आना-जाना करते हैं, उन्हें बुलाना चाहती हूं। तुम लोग ज़रा टटोल कर देखो किसी का विरोध तो नहीं है। वो कमलकांत कुछ टेढ़ा है। बचपन से ही ऐसा रहा है। सब लोग पूरब की ओर जाना चाहेंगे तो वो पक्का पश्चिम की बात करेगा। मैंने कहा अम्मा अभी रहने दो। बाबा की बरसी कर लें। पारिवारिक मिलन का कार्यक्रम ठंड कम होने पर कर लेंगे। इतना कह कर मैं रसोई घर की ओर जाने के लिये उठी तो दादी ने कहा बिटिया पकौड़ों वाली कढ़ी या मठे के आलू बनवा लेना। कमलकांत को बहुत पसंद है। कढ़ी बने तो चावल बनवा लेना और यदि मठे के आलू बने तो उसके साथ पराठें। बढ़िया मोयन और हल्का नमक डालकर। जी अभी जा कर महाराजिन को बता देती हूं। साथ में कोई चटनी भी बनवा लेती हूं। कढ़ी चावल के साथ पापड़ भी कहे देती हूं। हमारे यहां दिन में पूरा खाना बनता है। याने रोटी,दाल,भात, एक या दो सब्जी। चटनी या रायता। रात के खाने में बचा हुआ दिन का भोजन और जरूरत के हिसाब से दलिया और मूंग की दाल और रोटी बनती हैं।
हम सबके नाम का एक एक कमरा घर में हैं। जब हम आते हैं उसी में रहते हैं। दादी हम लोगों की गैरहाजिरी में रोज़ कमरों की सफाई करवाती हैं और उन्हें व्यवस्थित रखवाती हैं। रसोई के काम से निपट कर मैं अपने कमरे में आ गयी। बड़ी वाली अलमारी खोली। पुरानी चीज़ें देखने का भी एक अलग ही मज़ा है। समय का भान ही नहीं रहता। जब खाना टेबल पर लग गया तब मेरी खोज हुई और मैं दूसरे माले पर अपने कमरे में पाई गयी। जल्दी से नहा कर टेबल पर पहुंची तब तक सब आ चुके थे। बड़ा मज़ा आता है जब सब साथ बैठ कर खाना खाते हैं।खूब सारी यादें ताज़ा हो जाती हैं।
गुरुवार के बाद तीन दिन और बचते हैं हमारे पास। हम सब लोग रविवार की दोपहर तक चले जायेंगे। दिन में आराम के वक्त दादी ने मुझसे कहा सरस कल सुबह दस बजे मुझे बैंक जाना है। तुम और देवा साथ चलना।
डिनर के बाद हम लोग दादी को को राम-राम और शुभरात्रि कह कर बरामदे में आ गये। बड़े भैया ने पूछा वो देवा कहां है। मैंने बताया दादी उससे कुछ सामान पैक करवा रही हैं, हम लोगों को देने के लिये। भैया ने मुझसे कहा सरस इस देवा का क्या करें। अरे वो बाबा दादी का बड़ा लाड़ला है। वे उसे क्या क्या दे देंगी मालूम नहीं। मैंने कहा तो क्या हुआ। उनकी और बाबा की सेवा भी तो उसी ने सबसे ज्यादा की है। और दादी के पास ऐसा क्या धरा है। कुछ ज्यादा नहीं। हां एक बात तो मैं बताना भूल ही गयी। कल हम उन्हें बैंक ले कर जायेंगे। उन्हें अपना लॉकर ऑपरेट करना है। सब के कान खड़े हो गये। सुनो मालूम करके आना उनके खातों में और लाकर में नोमिनी कौन है। मैंने सिर हिला दिया। वैसे मुझे मालूम है लॉकर में देवा और बाकी सारे खातों में सरस याने मैं। अगर ये बात अभी इन लोगों को पता चल जाये तो हंगामा हो जायेगा। कुछ देर और इसी विषय पर बातें होती रहीं और सभा विसर्जित हो गयी।
सुबह सब समय से उठ गये। चाय नाश्ता समय से निपटा। देवा ने गाड़ी निकाली। बैंक में दादी को सब जानते थे। वो उनकी सम्मानीय खाताधारक थीं। वो जैसे ही मैनेजर के केबिन में दाखिल हुईं, वो खड़े हो गये। आइये माताजी, आप क्यों यहां तक आईं,आपका काम तो घर बैठे हो जाता है। अरे भैया वो लॉकर ऑपरेट करना था इसलिये आना पड़ा। मैनेजर ने टेबल पर रखी घंटी बजाई और सेवक से कहा जाओ लॉकर वाला रजिस्टर ले कर आओ। कुछ देर बाद मैनेजर हम लोगों को लॉकररूम ले कर गये। उनके जाने के बाद मैंने अम्मा की देख रेख में लॉकर का सब सामान निकाल लिया। फिर प्रबंधक के कमरे में जा कर बैठ गये। दादी ने अपने झोले से सारी एफ. डी. निकालीं। उनका काम बड़ा व्यवस्थित था। मैनेजर भैया ये मेरी सारी एफ. डी. हैं। सबमें नोमिनेशन हैं फिर भी आप एक बार देख लो। मैनेजर ने सब जांचीं और ठीक है कह कर वापस कर दीं।
जैसे ही काम पूरा हुआ हम लोग घर वापस आ गये। वो थक गयीं थीं। उन्होंने लंच अपने कमरे में करने की इच्छा प्रगट की और आराम से बिस्तर पर बैठ कर खाना खाया। आराम करने से पहले बड़े भैया को बुलाया और कहा कमल रात को सोने से पहले सब कुछ देर साथ बैठें ऐसा मन है। भैया ने कहा हां ,हम सब आ जायेंगे। रात को दादी ने हम सबों के बीच अपना सारा जेवर बांट दिया। फिर जो एफ डी जिसके नाम की थी उसे दे दी। देवा को जेवर भी दिये और एफ डी भी। कमल भैया को ये अच्छा नहीं लगा पर कुछ कहने की हिम्मत नहीं थी। अब हम सब को शुक्रवार तक साथ रहना था। शनिवार से वापसी शुरू।
हम लोग सब बरामदे में बैठे और अपने अपने मन की भड़ास निकालने लगे। देवा दो चार मिनट में ही उठ कर चला गया। उसके जाते ही कमल भैया ने एक भद्दी सी गाली दी। मैं खड़ी हुई और चुपचाप वहां से निकल आई। बहुत बुरा लगा। बुरे से ज्यादा शर्म आई कि बड़े भैया इतने गिर सकते हैं। खैर सुबह चाय पर सब नार्मल थे। भैया भी। शनिवार से वापसी शुरू हो गयी। मेरे अलावा सब चले गये। मैंने दो तीन दिन की छुट्टी बढ़ा ली थी।
मंगलवार की सुबह देवा की पुकार से नींद खुली। दौड़ कर दादी के कमरे में पहुंची तो देखा वो जा चुकी थीं। देवा ने रोते रोते बताया आज ये रोज़ की तरह सुबह नहीं उठीं तो उसने सोचा उन्हें उठ कर क्या करना है सोने दो। वो दोबारा अंदर आया तो मन नहीं माना पास आ कर देखा उन्हें हिलाया तो समझ आया कि वो तो गयीं। मैंने फिर भी फोन करके डाक्टर को बुलाया। उन्होंने बताया वो नींद में ही चली गयीं। बोले दादी ने बिना किसी कष्ट के शांत मन से संसार छोड़ा है। सरस ऐसा अन्त भाग्यशाली लोगों को मिलता है।
उनका अंतिम संस्कार उनके मन मुताबिक हुआ। अब वहां रुकने का कोई प्रयोजन नहीं था। सबने अपना अपना सामान समेटा। घर में ताला लगा कर मैंने चाभी देवा के हाथ में दी तो भैया ने कहा मुझे दो। मुझे बताना पड़ा कि दादी ने ये घर देवा के नाम कर दिया है। सब लोग हैरान हो गये। भैया कुछ कहते उसके पहले मैंने बता दिया कि ये काम बाबा कर के गये थे। अचानक भैया ने देवा की ओर देखा तो उसने कहा भैया ये घर मेरा नहीं आप सबका है। आप जब चाहें तब आ सकते हैं।
बड़े भैया आगे बढ़े और उन्होंने अचानक देवा को गले से लगा लिया। फिर उन्होंने उससे पूछा तुम कहां जा रहे हो। उसने कहा कहीं नहीं। तो ये एक छोटे सा बैग किसका है। अलग से क्या रखा है। उसने कहा कुछ सामान है। दादी ने दिया था। भैया ने कहा दिखाओ। उसने कहा भैया आप देखोगे तो आपको बुरा लगेगा। रहने दें। पर कमल भैया कैसे मानते। देवा ने बहुत संकोच से बैग खोला। बैग में बाबा का मुड़ा-तुड़ा मसनद रखा हुआ था। उसने सिसकते हुए कहा दादी ने कहा था बेटा मैं जब इस दुनिया से चली जाऊं तब तू मेरा एक काम ज़रूर कर देना। इसे बड़े सम्मान के साथ नदी में सिरा देना। नहीं तो तेरा बड़ा भाई इसे कचरे में फेंक देगा। हम सब की आंखें फटी की फटी रह गयीं। शर्म से हम सबों की गर्दने झुक गयीं थीं।
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वर्षों आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग और केंद्र सरकार के अन्य संचार माध्यमों में कार्य-रत रहने के बाद नन्दिता मिश्र अब स्वतंत्र लेखन करती हैं।
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