कभी-कभी लगता है कि मोहन राणा की कविताओं में ऊपरी तौर पर तो एक ठहराव होता है लेकिन भीतरी तौर पर इनमें बहुत तेज़ बहाव जैसा होता है – कभी-कभी तो यह बहाव पाठक को जैसे एक सुनसान टापू पर छोड़ देता है. फिर जैसे उसी कविता के सहारे ही पाठक अपना वापसी का रास्ता खोजता है. ऐसे में उनकी कविताएँ एक रोमांच जैसा पैदा करती हैं और एक तरह से वो पाठक से साथ थोड़ी देर के लिए ठहर सा जाती हैं.











