चौरासी का चार : सत्येन्द्र प्रकाश की नई कहानी
सत्येन्द्र प्रकाश की कहानियां बहुत बार संस्मरणात्मक ही होती हैं। आज की कहानी १९८४ के सिक्ख-विरोधी दंगों की पृष्पठभूमि पर लिखी गई है। कहानी चूँकि संस्मरणात्मक है, इसलिए इसमें राजनीतिक वक्तव्य भी हैं और उलाहने भी जिन्होंने संस्मरण को रोचक बनाए रखा है।
चौरासी का चार
सत्येन्द्र प्रकाश
दोपहर लगभग डेढ़-दो का वक्त था। अशोक विहार, दिल्ली के ढाबे पर संजय की आँखे खाने की प्लेट पर गड़ी थीं और उसके कान ट्रांजिस्टर-सेट से चिपके हुए थे। ऐसा लग रहा था, कान ट्रांजिस्टर के अंदर समा जाएंगे। आखिर चिपके भी क्यूँ नहीं, दिलीप वेंगसरकर की पहली एक दिवसीय सेंचुरी लगते दिख रही थी। सियालकोट में पाकिस्तान के खिलाफ दूसरा एक दिवसीय मुकाबला। भारत के 200 रन बन चुके थे। संदीप पाटील अभी-अभी आउट हुआ था, 59 रन बना कर। लगभग दो ओवर का खेल अभी बाकी था।
कटोरी में लोभिया, जिसे रोंगी भी कहते हैं, की लजीज रसदार सब्जी आधा से ज्यादा पड़ी हुई थी। यहाँ की लोभिया का स्वाद आम ढाबों के लोभिया से भिन्न होता था, अन्यथा बिहारियों को लोभिया -राजमा कहाँ पसंद आता। दरअसल अशोक विहार शॉपिंग सेंटर के इस ईटरी को ढाबा कहना अनुचित होगा। ढाबों को उनकी खास पहचान देती सामने की तंदूर कहीं नजर नहीं आती। रोटियाँ भी तवे पर सिंकी हुई फुलके होतीं थीं, सुंदर सुकान्त, तंदूर वाली एक साइड से सिंकी, जली-कटी नहीं। तभी शायद स्टूडेंट्स इसे ‘इटिंग जॉइन्ट’ कहा करते थे, ढाबा नहीं। ‘इटिंग जॉइन्ट’ कुछ ‘हेप साउन्ड’ करता था, और ढाबा! शायद सड़क छाप, आमतौर सड़क के बाजू में ही तो होता है ढाबा।
श्रवण, उस ईटरी का मुलाजिम, संजय की प्लेट में तीसरी रोटी, चुपड़ी हुई, डाल रहा था। लोभिया की तरह ही मक्खन चुपड़ी रोटियाँ भी इस ‘जॉइन्ट’ को खास बनाती थीं। भारत की पारी २१० रन पर समाप्त हो गई थी, वेंगसरकर की सेन्चुरी नहीं हो पाई, वह ९४ रन पर नाबाद पैवेलियन लौटा था, निर्धारित ४० ओवर का खेल खत्म हो गया था। वेंगसरकर की सेन्चरी पूरी नहीं हो पाई थी, फिर भी ९४ पर नाबाद रहने की खुशी थी उसे। रवि शास्त्री का ८ बॉल खेल कर ६ रनों का योगदान था।
१९८३ के विश्व कप की जीत से भारत एक दिवसीय क्रिकेट के कैन्वस पर अपना दस्तखत छोड़ चुका था। देश जीत का स्वाद चख चुका था। वर्तमान भारत-पाक शृंखला के पहले मुकाबले में शिकस्त से दूसरे मैच में भारत घायल शेर की तरह उतरा था। पहले मैच में मात्र १९५ का स्कोर खड़ा कर अगर पाकिस्तान जीत सकता था, फिर २१० तो उस समय के मानदंडों के हिसाब से एक अपराजेय चुनौती थी। इस स्कोर के साथ भारत की जीत निश्चित सी दिख रही थी।
संजय अपनी तीसरी रोटी खा चुका था, चौथी का इंतजार कर रहा था। मेरी चौथी रोटी, चुपड़ी हुई, पेट को भेंट हो गई थी। मेरी कटोरी की स्वादिष्ट लोभिया की सब्जी भी खल्लास हो चुकी थी। पर संजय की कटोरी की लोभिया अभी शेष थी, उसकी चौथी रोटी के लिए। चौथी रोटी लिए श्रवण संजय की तरफ मुखातिब हुआ ही था कि मुझे देख कर संजय बोल पड़ा, ‘ बॉस, पता नहीं क्या हुआ है, भारतीय टीम को वापस बुलाया जा रहा है, मैच रद्द कर दिया गया है।‘ इतना तो स्पष्ट था कि टीम को वापस बुलाना साधारण बात नहीं है। अवश्य ही कुछ बेहद गंभीर घटा है।
वेंगसरकर, संदीप पाटील, रवि शास्त्री का युग सोशल मीडिया का युग तो था नहीं कि खबर पलक झपकते विरल हो जाए। उन दिनों सूचना का जरिया आकाशवाणी और दूरदर्शन के समाचार ही थे। आकाशवाणी के अतिरिक्त स्टूडेंट्स बीबीसी न्यूज भी सुना करते थे, विशेषकर यूपीएससी की तैयारी करने वाले। ट्रांजिस्टर तो संजय के हाथ में ही था, वह तुरंत न्यूज सुनने की कवायद में जुट गया। श्रवण ने कब चौथी रोटी उसके प्लेट में डाल दी, और संजय ने कब खा ली उसे इसका ध्यान ही नहीं रहा। उसकी तंद्रा तब भंग हुई जब श्रवण पाँचवीं रोटी पूछता उसके पास आ पहुँचा। आकाशवाणी से कुछ सुराग मिलता हुआ नहीं दिखा, तब संजय बीबीसी लगाने की जुगत में लग गया था। पाँचवीं रोटी पूछने के लिए आए श्रवण पर खीझते हुए बोल पड़ा, मैं पाँच रोटी कब खाता हूँ? देश में हुआ क्या है यह जानने के लिए मैं परेशान हूँ, आकाशवाणी कुछ बता नहीं रही है, बीबीसी लग नहीं रहा है और पाँचवीं रोटी लिए तुम सिर पर सवार हो।‘ संजय झल्लाते हुए सब एक साँस में बोल गया।
इस बीच अपना खाना समाप्त कर मैंने हाथ धो लिया था। ट्रांजिस्टर मुझे पकड़ाते हुए संजय बोला, ‘यार तुम थोड़ा ट्राई कर लो, कहीं बीबीसी तुम्हारे हाथों से लग जाए, फिर कुछ पता चले। तब तक मैं हाथ धो लेता हूँ।‘ थोड़ी बहुत कोशिश मैंने की, पर मुझसे इतनी आसानी से यह कहाँ होने वाला था। मुझे ट्रांजिस्टर वगैरह हैन्डल करने का कोई खास तजुर्बा भी नहीं था। संजय पुनः कोशिश में जुट गया, दिशा बदल बदल कर। बीबीसी सुनने वालों को इसका इल्म भी था और अभ्यास भी। ‘बिनाका गीतमाला’ के समय ‘रेडियो सिलॉन’ भी कहाँ आसानी से पकड़ता था। इतनी आसानी से सिगनल नहीं मिलता था, खास कर तब जब कुछ खास घटा हो। दूरदर्शन का एन्टीना भी तो घूमा घूमा कर सिगनल पकड़ाने की कोशिश तब होती थी। यह आम दृश्य होते थे तब, बहुत सारे लोग कोशिश करते हुए छतों पर दिख जाते थे।
वो तारीख थी ३१ अक्तूबर, १९८४ की, औरवेलियन नाइन्टीन ऐटीफोर की ३१ अक्तूबर। ऑरवेल की ‘ब्रिग ब्रदर इज वाचिंग यू’ की भविष्यवाणी तो सही साबित नहीं हुई थी, पर हमारे यहाँ कुछ अनहोनी घट गई थी। शॉपिंग कॉम्प्लेक्स के उस ‘इटिंग जॉइन्ट’ पर ही कहीं से उड़ती उड़ती खबर पहुँची थी, ’इंदिरा गाँधी पर उनके बॉडी गार्ड्स ने गोलियों की बौछार कर दी है, और उन्हें एम्स ले जाया गया है। खबर तो यह भी यह कि वे अब हमारे बीच नहीं हैं, पर अभी कुछ साफ नहीं है। वैसे कोई सरकारी घोषणा अभी नहीं हुई है।
चौरासी के उस क्षण, चार चित्र, इंदिरा गाँधी की एक दिन पूर्व भुबनेश्वर में भाषण की तस्वीर, वेंगसरकर, के चेहरे की निराशा जो अचानक दिखने लगी थी, श्रवण के हाथ में झूलती संजय की पाँचवीं रोटी और स्वयं का हतप्रभ चेहरा जो मुझे दिख नहीं रहा था दिमाग के फोटो फ्रेम में जड़ गए, बिल्कुल जड़, हमेशा के लिए। मन के कैमरे में फ्रीज हो गए, कभी ना बहने के लिए।
सुबह के अखबारों में श्रीमती गाँधी की भुवनेश्वर में हुई उनकी एक सभा की तस्वीर छपी थी। अखबारों ने उनके एक वक्तव्य को काफी प्रमुखता से छापा था। आकाशवाणी के लगभग सभी बुलेटिनों में उनकी चिर-परिचित आवाज़ में इस संवाद को बार-बार सुनाया में गया था, ‘मैं आज यहाँ हूँ, कल शायद यहाँ ना रहूँ। मुझे चिंता नहीं है मैं रहूँ या ना रहूँ, मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने अपना पूरा जीवन अपने लोगों की सेवा में बिताया है। मैं अपनी आखिरी साँस तक ऐसा करती रहूँगी और मैं जब मरूँगी तो मेरे खून का एक-एक कतरा भारत को मजबूत करने में लगेगा’। उनकी बोलती तस्वीर, इस संवाद के साथ, वीडियो बिना देखे ही, दिमाग में धँस गई।
वेंगसरकर ९४ रन की नाबाद पारी और २१० रन के अजेय स्कोर पर संतुष्ट सा पैवेलियन वापस लौटा था, पर शीघ्र स्वदेश वापसी की खबर से जैसे सेन्चुरी पूरी ना होने का दर्द एकदम से छलक आया और गहराकर उसके चेहरे पर उतर आया था। वो उदासी जो सामने से दिख नहीं रही थी, उस दुखी चेहरे का एक चित्र उकेर गई। मायूसी के भारी बोझ से बिल्कुल नीचे को लटका हुआ एक चेहरा, मानो अब सेन्चुरी ठोकने का दूसरा मौका फिर मिलने वाला नहीं है।
कुछ क्षण पहले तक श्रवण की उपस्थिति बिल्कुल वैसी ही थी जैसी किसी अन्य दिन होती। पतले कद-काठी का, नाटा सा श्रवण, कंधों से झूलता हुआ कुर्ता, घुटनों को ढँकता, करीब-करीब पिंडलियों को छूता हुआ, बाजुएं कुहनी के ऊपर तक मुड़ी हुईं। कुर्ते के नीचे, कमर और घुटनों के बीच कुछ पहना भी होता तो यह राज़ की बात थी। पूछो तो वह सिर्फ मुस्कुरा देता, कहता कुछ नहीं। उसे भी लगता था कि अगर ग्राहकों का कौतुक बना रहे तो हर्ज ही क्या! कुछ भी विलक्षण तो नहीं था उसकी आकृति में, जो अमिट हो सके। पर एक ही पल में उसकी वह आकृति हाथ में झूलती संजय की उस पाँचवीं रोटी के साथ फ्रीज़ हो गई, दशकों बाद भी मानस पटल पर सजीव, बिल्कुल जीती जागती, जैसे अभी संजय की प्लेट में वह पाँचवी रोटी डालेगा।
मैं स्वयं इंदिरा गाँधी द्वारा लिए गए ऐसे कई निरंकुश और असंवैधानिक फैसलों को भूल नहीं पाया था। मसलन एक वर्ग विशेष के युवाओं की ज़बरन नसबंदी, संविधान की प्रस्तावना में उन शब्दों का समावेश, जिनका मुखर विरोध संविधान सभा में अन्य कई सदस्यों के साथ बाबा साहब अंबेडकर तक ने किया था, और लोकसभा का कार्यकाल पाँच साल से बढ़ाकर छः साल करना, वह भी पूरे विपक्ष को जेल में बंद कर और सेंसर से पत्र-पत्रिकाओं का मुँह बंद कर। फिर भी मैं उस क्षण निष्प्राण हो जड़वत हो गया। एक पल को समय ठहर सा गया था, उस क्षण, उस पल, अशोक विहार के उस ‘इटिंग जॉइन्ट’ में। देश स्तब्ध था और देशवासी मर्माहत। मेरी स्थिति भी कोई भिन्न नहीं थी।
चौरासी में आठ से चिपके चार की मानिंद ये चार चित्र भी चौरासी से चिपक गए, कभी अलग ना होने के लिए। जब ये चार चित्र चौरासी से चिपक रहे थे तब चौरासी को शायद ही पता था कि आने वाले चार दिन उस चौरासी से उसी तरह जुडने वाले हैं, जैसे बिना इन चार के चौरासी का वजूद अधूरा रह जाता। चौरासी पर काले धब्बे छोड़ते हुए, ये चार दिन, कभी ना मिटने के लिए। और उन चार दिनों की तरह ही वे चार चेहरे भी, जो बरसों तक बार-बार सिर उठाते रहे है।
पलक झपकते ही चेतना वापस लौटी और आत्मा किसी अज्ञात आसन्न भय से काँप उठी। श्रीमती गाँधी आपातकाल की तमाम ज्यादतियों के बावजूद एक बार फिर अपनी लोकप्रियता हासिल कर सत्ता में वापस लौटी थीं। वो भी जनता को सिर्फ ‘आधी रोटी’ खिलाने के वादे के साथ। मनुष्य भूख में दार्शनिक बन जाता है, ऐसा सुना था। उन्नीस सौ सतहत्तर-अस्सी में देख रहा था। उस दरम्यान जनता भर पेट खाने लगी थी। सरकारी राशन की दुकानें बिना किसी राज्यादेश के ही बंद हो चलीं थी। कारण बाजार में गेहूँ, चीनी, घासलेट सब सस्ती मिल रहीं थी, राशन की दुकानों से भी कम कीमत पर। कोटा-परमिट राज दम तोड़ता दिख रहा था। साथ ही कोटेदारों का समाज पर प्रभाव और उनकी पकड़ भी। इनकी तरह की तमाम ‘विशेषाधिकार प्राप्त सुविधाभोगी वर्ग’ का सत्ता-सुख खतरे में पड़ गया था।
पेट भरे होने से जनता की दम तोड़ती दार्शनिकता छटपटाने लगी थी। प्रबुद्ध और दार्शनिक बनने की शर्त पेट की भूख जो है। उसे तो ‘आधी रोटी’ ही चाहिए थी, पेट की भूख बनी रहेगी, तभी तो अंदर की दार्शनिकता कर प्रस्फुटित होकर बाहर आएगी। जनता की ऐसी दार्शनिकता ‘सुविधाभोगी’ वर्ग को उनके खोए विशेषाधिकार की पुनर्प्राप्ति की उम्मीद देती है। तभी तो उनके दिल की बात जनता की जुबान चढ़ कर बोलने लगी थी, ‘आधी रोटी खाएंगे-----“। और ‘आधी रोटी’ का प्रॉमिस तो सिर्फ इंदिरा जी के काँग्रेस ने किया था।
इस दार्शनिक अवाम की लोकप्रिय नेता को कुछ हो जाए और आवाम चुप बैठ जाए, ऐसा भला हो सकता था क्या? अवाम चुप भी बैठ जाए पर उसके नाम पर खेलने वाले राज नेताओं की कमी भी तो नहीं! ये राजनेता अपना गेम खेल कर श्रेय अवाम को देने का हौसला रखने वाले होते हैं, उदारमना। ‘आधी रोटी’ वाला स्लोगन भी तो राजनेताओं से ही आया था, पर कुछ इस रूप में कि जनता चीख रही है, ‘आधी रोटी खाएंगे, इंदिरा को ले आएंगे’। काम खुद करें और उदारता से श्रेय आम जनता को दे दें, यही तो उनका बड़प्पन है। आवाम फिर सोचती फिरे कि राजनेताओं का वो कृत्य श्रेय पाने वाला है, या अवाम के चेहरे पर ना मिटने वाला कालिख!
खबरें जब उड़ती हैं तो उसकी गति सामान्य से अधिक होती है। अशोक विहार की उस ईटरी पर ही किसी आगंतुक ने श्रीमती गाँधी पर गोलियों की बौछार करने वाले बॉडी गार्ड्स के पहले एक शब्द ‘सिख’ जोड़ दिया। प्रधान मंत्री पर यह हमला उनके ‘सिख बॉडी गार्ड्स’ ने किया है। यह सुनते ही मन पीछे मुड़ गया, लगभग साढ़े चार-पाँच महीने पहले।
मैं गर्मी की छुट्टियों में जमशेदपुर में अपनी सिस्टर के वहाँ से लौट रहा था। मेरी बस जमशेदपुर से पटना के रास्ते में थी। ९-१० जून चौरासी की बात होगी। राँची से आगे यात्रियों के खाने के लिए किसी लाइन होटल पर बस रुकी थी। ड्राइवर् ने घंटे भर का समय दिया था। बस हजारीबाग़ होकर जाने वाली थी। तभी पता चला की पास के रामगढ़ कैंटोनमेंट की सिख रेजीमेन्ट ने बगावत कर दी है। ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के विरोध में सिख समुदाय में काफी रोष है। उसी का नतीजा है कि देश के लिए मर मिटने वाली सिख रेजीमेन्ट आज बगावत पर उतर आई है। मसलन बस को अब हजारीबाग़ वाला रूट छोड़ना होगा।
इस विषयांतर से पुनः लौटते हैं अशोक विहार के उस इटिंग-जॉइन्ट पर जो अब तक की स्टोरी का केंद्र था। राँची के उस लाइन होटल का संदर्भ दिमाग में कौंधते ही जिस आसन्न भय की बात में मन आई थी, वह कुछ स्पष्ट होने लगी। आँखों-आँखों में संजय से बात हो गई। हमें अशोक विहार से शीघ्र ही यूनिवर्सिटी एरिया में किसी सुरक्षित स्थान पर पहुँच जाना चाहिए। यहाँ अशोक विहार में हम दोनों का जानने वाला कोई था नहीं। अपने ग्रुप के अन्य स्टूडेंट्स भी तो नहीं थे अशोक विहार में। अगर कोई ऐसी वैसी स्थिति पैदा होती है तो बिल्कुल अकेले होंगे। क्योंकि सारे दोस्त तो उधर तिमारपुर-बी डी एस्टेट की तरफ रहते थे। तिमारपुर-बी डी एस्टेट का ध्यान आते ही बीरेंद्र और राकेश याद आ गए। अशोक विहार से पहले मैं विजय नगर में बीरेंद्र के साथ ही तो रहता था। और उसके पहले बी डी एस्टेट में, जहाँ राकेश अब भी रह रहा था।
तय हुआ हम तुरंत ही तिमारपुर के लिए निकल जाते हैं, वहाँ बीरेंद्र के साथ चर्चा के बाद निर्णय लेंगे की आगे क्या करना है। विजय नगर छोड़ने के बाद मैं संजय के साथ अशोक विहार शिफ्ट कर गया था, और बीरेंद्र तिमारपुर में दिल्ली सरकार के किसी कर्मचारी के क्वार्टर में सबलेटींग बेसिस पर रहता था, देवनीति के साथ। देवनीति के घर जाने की वजह से बीरेंद्र भी उन दिनों अकेला था। चार साढ़े चार का वक्त होगा, जब हम बीरेंद्र के कमरे में पहुँचे थे, तिमारपुर के बिल्कुल आखिरी छोर पर, बालक राम बस स्टॉप के निकट। तिमारपुर मार्केट थोड़ी दूर था वहाँ से। आकाशवाणी ने श्रीमती गाँधी की मृत्यु अभी भी घोषित नहीं की थी, लेकिन यह सच्चाई अब तक छुपी नहीं थी। जैसे बीबीसी के हवाले से हम सब को पता लग चुका था, वैसे ही देश के हर कोने में खबर आग की तरह फैल चुकी थी। किन्तु इस आम हो चली खबर को भी आधिकारिक तौर गुप्त रखना प्रशासन की मजबूरी थी, जब तक वैकल्पिक व्यवस्था नहीं हो जाती।
इंदिरा गाँधी की मृत्यु और राजीव गाँधी का अगले प्रधानमंत्री के रूप में मनोनयन और शपथ कार्यक्रम की सूचना आकाशवाणी और दूरदर्शन पर लगभग साथ ही आई। शाम में छः बजे के आस-पास। देश को नया प्रधान मंत्री मिल रहा था, पर अनिश्चितता के साथ। अनुभव-याविहीन राजनीतिक रूप से अपरिपक्व प्रधान मंत्री इस विकट समय में क्या ही कर पाएगा? ऑपरेशन ब्लू स्टार का घाव किस रुप में भरेगा, कैसे भरेगा, भरेगा भी या नहीं! जो हुआ वो होना नहीं चाहिए था। इस पल ऐसे कई प्रश्न दिमाग में चल रहे थे।
इस सबके बीच अधिक भय तो तात्कालिक प्रतिकार का था। उस क्षण तक प्रतिकार की आशंका मन को डरा रही थी। प्रतिकार हो ही, यह जरूरी नहीं था। लेकिन अगर कुछ होता है तो उसका रूप क्या होगा, इसका अंदाजा भी नहीं था। हाँ शांति भंग न हो, कोई उपद्रव की ना सोचे, इस वास्ते एहतियातन प्रशासन निषेधाज्ञा तो लागू करेगी ही, यह अवश्यंभावी था। इस सूरत-ए हाल हमारी आगे की योजना तय होनी थी। निषेधाज्ञा या कर्फ्यू जैसी कोई स्थिति बनती है, तो हम किस तरह अपना काम चलाएंगे? खाने-पीने तक के लिए बाहर नहीं निकल पाएंगे तो हमारे पास तो खाने का कोई इंतज़ाम नहीं है।
‘चलो राकेश के वहाँ ही चलते हैं’, तीनों के मुँह से करीब-करीब एक साथ निकला। राकेश बी.डी. एस्टेट की एक कोठी में रहता था। भ्रमित न हों, राकेश की अपनी कोठी नहीं थी, कोठी इन्द्र प्रकाश पाहूजा की थी, जिसका फर्स्ट फ्लोर उन्होनें स्टूडेंट्स को किराये पर दे रखा था। राकेश उसी फर्स्ट फ्लोर के एक कमरे में रहता था। तिमारपुर के सरकारी क्वार्टर्स, पूरी तौर पर एक्स्पोज़्ड थे, दरवाजे सीधी सड़कों से लगे थे, बिना किसी चारदीवारी के। बी.डी. एस्टेट की ये कोठियाँ कतिपय अधिक सुरक्षित थी। और पाहूजा साहब के स्वयं का दबदबा भी था उस एरिया में। फिर सुरक्षा की दृष्टि से यह और भी अच्छा था। और तो और राकेश वाली कोठी के सर्विस लेन में एक दुकान भी थी, जहाँ से राकेश ब्रेड, बटर, अंडे, पैकेट वाला दूध आदि लेता था। एक दो बार राकेश के साथ नाइट स्टे की अगली सुबह हम उस दुकान से ब्रेड बटर लेने गए भी थे। अपनी दुकान से सटी कोठी के सर्वेन्ट क्वार्टर में ही दुकानदार रहता था, उसी कोठी में उसकी पत्नी घर का काम करती थी।
“चश्मेबद्दूर” फिल्म के ‘सईद जाफरी’ के मल्टी-परपज़ किऑस्क, जहाँ ब्रेड ऑमलेट, बन-ऑमलेट, चाय और यहाँ तक कि इडली-डोसा के साथ-साथ पान-सिगरेट भी मिल जाता था, की प्रेरणा ‘लखनऊ ढाबा’ भी पास में ही था। अगर थोड़ी देर को भी यह खुले तो खाने-वाने को कुछ-ना कुछ मिल ही जाएगा। विषम परिस्थितियों में ‘सर्वाइवल’ की दृष्टि से राकेश के रूम से उपयुक्त हम तीनों को उस वक्त कुछ और नहीं सूझा।
राकेश अपने रूम में ही था। अपने रेडियो सेट से चिपका हुआ। सामान्य परिस्थियों में भी बीबीसी सुनना उसकी लत सी रही थी। तो आज जब आकाशवाणी से कुछ विशेष नहीं मिल रहा था, राकेश बीबीसी पूरी तन्मयता से सुन रहा था, हिन्दी सेवा ही नहीं, ‘वर्ल्ड न्यूज’ भी जो उस दिन श्रीमती गाँधी की हत्या और राजीव गाँधी का प्रधान मंत्री के रूप में चयन से अधिक ऑपरेशन ब्लू-स्टार और उसके ‘आफ्टरमाथ’ को उजागर कर रही थी। आज की घटना को ‘सिख समुदाय की सामूहिक पीड़ा के परिणाम के रूप में दर्शा रही थी, मात्र दो बॉडी गार्ड्स के कृत्य के रूप में नहीं। साथ ही अन्य समुदायों के संभावित ‘बैकलैश’ को भी। दिल्ली के कुछ वफादार काँग्रेस नेताओं के हवाले से ‘बलिदान जाया नहीं होगा’, ‘खून का बदला खून से लेंगे’ जैसे वक्तव्यों को बार बार दुहराया जा रहा था, इन विदेशी सूचना तंत्रों द्वारा।
शाम में ही नए प्रधान मंत्री ने शपथ ले ली। लगा स्थिति नियंत्रण में रहेगी। पर सिखों के खिलाफ हिंसा की घटनाएँ शुरू हो गई थी। कई जगह से ऐसी घटनाओं की रिपोर्ट आ रही थी। हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश, उड़ीसा और बिहार के कई शहरों से व्यापक हिंसक घटनाओं की सूचना आ रही थी। इन राज्यों के कई शहरों से सिख विरोधी दंगों की रिपोर्ट आने लगी थी। दिल्ली के अतिरिक्त अधिक प्रभावित क्षेत्रों में कानपुर, जबलपुर, बोकारो, राउरकेला आदि शहरों के नाम की चर्चा थी। इन घटनाओं ने राकेश के वहाँ हम चार दोस्तों के साथ रहने के निर्णय को उचित साबित कर दिया।
अगली सुबह हमने सोचा, सर्विस लेन वाली दुकान से ब्रेड, बटर, अंडे, दूध आदि ले लें, कुछ अधिक मात्रा में ही। कर्फ्यू तो लग चुका था, लेकिन हमें लगा पीछे वाली दुकान संभवतः खुली होगी, इस बैक लेन में इसे कौन टोकेगा। दुकान खुली मिल भी गई। देखते ही दुकानदार बोलने लगा , ‘बस आप जैसे ही लोगों के लिए आज यह रिस्क उठाया है मैंने। कोठी वालों के घर में तो राशन-पानी महीनों के लिए पड़ा रहता है। पर आप जैसे स्टूडेंट्स क्या करेंगे? ढाबे तो बंद हो जाएंगे। फिर यही सोचा कि ब्रेड, अंडे आदि ले लें तो कम-से-कम दो-चार दिन निकल जाएगा। चलो जल्दी करो, जो कुछ भी लेना है, ले लो, फिर पता नहीं दुकान कब खुल पाएगी। दो सिपाही चक्कर लगा चुके हैं, मैंने उन्हें समझा-बूझा कर टाल दिया, यह कह कर कि एक घंटे में बंद कर दूंगा, डेली वाले ग्राहक तब-तक अपना सामान ले लेंगे’।
हमारे लिए एक पल में यह निर्णय लेना कि कौन सी चीज किस मात्रा में ले ली जाए, आसान नहीं था। फिर भी निर्णय तो लेना ही था। नवंबर शुरू हो चुका था। मौसम में हल्की ठंड का अहसास होने लगा था। दूध तो फिर भी ज्यादा दिन नहीं टिक पाएगा, पर मक्खन बिन फ्रिज भी इस मौसम में पिघल कर नहीं बहेगा। अंडे भी शायद जल्दी खराब ना हों और ब्रेड हफ्ते भर तो चल ही जाएगा, बिना फंगस लगे। हमने फटाफट दो दर्जन अंडे, ब्रेड के चार लोफ़, १०० ग्राम वाली मक्खन की दो टिकिया, दो लीटर दूध का आदेश दे दिया। लेकिन इतने ब्रेड अंडे पर जिंदगी कितने दिनों कटेगी? यह सोचते ही लगा कि कुछ चावल, दाल, आलू, नमक, मसाला आदि भी ले लेना चाहिए। राकेश के कमरे में स्टोव था और बर्तनों के नाम पर एक छोटा कुकर, एक सौसपैन, दूध लाने वाला डोल और एकाध प्लेट। फिर खिचड़ी-चोखा, या चावल-एग करी, या फिर कभी चावल दाल चोखा तो बन ही जाएगा। चोखा, एग करी या उबली आलू की तरी वाली सब्जी की सोच कर सरसों का तेल लेना जरूरी हो गया। और स्टोव के लिए मिट्टी का तेल भी।
मिट्टी के तेल के लिए राकेश के पास दो लीटर की जरिकेन तो थी, पर सरसों तेल तो कभी इस्तेमाल करता नहीं था कि उसके लिए कोई डब्बा या बोतल रहे उसके पास। उन दिनों तेल के बोतल बाजार में आए भी नहीं थे। कोल्हू ब्रांड तेल टिन के डब्बे में आता था, लेकिन महँगा होने के कारण हर दुकान में मिलता नहीं था। पीछे की गली की दुकान सर्वेन्टस क्वार्टर में रहने वालों को ही कैटर करती थी और हम जैसे कुछ स्टूडेंट्स को, कोठियों को नहीं, तो यहाँ वह टिन वाला कोल्हू ब्रांड तेल मिलना संभव ही नहीं था। वह तेल का बड़ा टिन, १८ लीटर वाला ही रखता था। ग्राहक अपना बोतल लेकर आते थे और दुकानदार माप कर उसमें डाल देता। दुकानदार को जब हमारी उलझन का पता चला, तो उसने अपने घर से कांच की बोतल का इंतजाम कर उसमें सरसों तेल हमें दे दिया।
तकरीबन हफ्ते भर की चीजें ले कर हम कमरे में आ गए। दिल किया कि कमरे में सामान रख कर, लखनऊ ढाबा चलें। खुला मिला तो आज कुछ अच्छा खा लेंगे, पता नहीं फिर कब तक सेल्फ कुकिंग पर डिपेंड करना पड़े। लेकिन लखनऊ ढाबा कहाँ खुला मिलता, वो इस किरयाने वाली दुकान की तरह पीछे की गली में थोड़े ही था। वह तो बी डी एस्टेट को माल रोड से जोड़ने वाली मुख्य सड़क लखनऊ रोड के बीचोबीच अवस्थित था। इस रोड के नाम पर ही इस ढाबा का नाम था। आधे रास्ते से ही उसका बंद शटर दिख गया और हम वापस हो लिए।
लखनऊ ढाबा का ख्याल आते ही लगा था कि सुबह का चाय-नाश्ता बनाने से जिम्मा छूट गया। पर वह नहीं हो पाया। कमरे में वापस आकर चाय बनी और चाय की चुस्कियों के साथ माहौल की गंभीरता और अपनी रणनीति पर चर्चा शुरू हों गई। नाश्ते को लेकर कोई अधिक चिंता थी नहीं, अंडे उबल जाएंगे और ब्रेड-मक्खन के साथ बॉयल्ड एग फरफेक्ट नाश्ता हो जाएगा। जलपान के साथ चाय का दूसरा राउंड भी हो जाएगा। एग उबलने के लिए रखते हुए चर्चा आगे बढ़ी, ‘क्या लगता है माहौल जल्दी काबू में आ जाएगा।‘ उस समय तो त्वरित प्रतिक्रिया तो यही थी, ‘पता नहीं’। पर स्थिति की गंभीरता समझ में आते देर नहीं लगी।
अंडे उबाल मार रहे थे, फदफदाहट की ध्वनि के साथ। मित्रों की चर्चा में भी उफान आने लगा था। यूवा नेता के ‘क्विक डिसिजन’ की क्षमता को हाईलाइट करते हुए संजय ने कहा, ‘स्थिति जल्दी ही नियंत्रण में होगी’, मुझे नहीं लगता है घबड़ाने वाली कोई बात है। संजय जिसके लिए श्रीमती गाँधी भरोसे का पर्याय थीं और काँग्रेस धर्म का, उसके मन में उनके लिए अगाध श्रद्धा थी। उसने ने राष्ट्रपति की त्वरित और दूरदर्शी सोच को सराहा। बोला, ‘प्रॉब्लेम तब होती जब अगले पीएम के लिए निर्णय में देरी होती, पर ज्ञानी जी ने अभूतपूर्व सूझ-बूझ का परिचय दिया है। अगर राजीव गाँधी की जगह और कोई भी नाम होता, तो मतैक्य नहीं हो पाता और देश राम भरोसे हो जाता।‘ किन्तु वस्तुस्थिति संजय के विश्वास के अतिरेक से लबरेज इस विशेषज्ञ राय के विपरीत थी। देश की सड़कें मनचलों और उपद्रवियों का क्रीड़ागाह बनने लगी थीं।
सिखों पर हमले और उनकी दुकानें लूटे जाने की छिट-फूट घटनाओं की सूचना आने लगी थी। सिखों पर हमले की रिपोर्ट बराबर आ रही थी। पुलिस और प्रशासन तो पार्थिव शरीर के अंतिम दर्शन और अन्त्येष्टि की व्यवस्था में व्यस्त थे। काफी नामी-गिरामी लोग आने वाले थे, दर्शन के लिए भी और अंतिम संस्कार में सम्मिलित होने के लिए भी। उसकी व्यवस्था के साथ आगंतुकों के सुरक्षा की कड़ी चुनौती थी प्रशासन के समक्ष। खासकर श्रीमती गाँधी की हत्या के कारणों को देखते हुए। फिर सड़कों और बाजारों की शांति की किसी को क्या फिक्र! हम बाहर निकल कर वास्तव में क्या घट रहा था वह देख तो पा नहीं रहे थे। किन्तु छन-छन कर जो खबरें पहुँच रहीं थीं, कुछ रेडियो के माध्यम से, और कुछ दुस्साहसी दोस्तों से जो हिम्मत कर बाहर का हाल टटोलने निकल पड़ते, उससे स्थिति की गंभीरता का अहसास हो रहा था। एक नवम्बर की सुबह से स्थिति अति गंभीर हो गई थी।
तभी हम तीनों ने एक साथ संजय की बात काटी, ‘अरे तुम कुछ अधिक ही आशावादी हो रहे हो। खबर के मुताबिक यह आग इतनी जल्दी बुझने वाली नहीं है। ऐसे में हिंसा किसी एक घटना के प्रतिकार में शुरू तो होती है, पर शीघ्र नियंत्रित नहीं हो तो, व्यक्तिगत ईर्ष्या और द्वेष को पोषित करने के लिए होने लग पड़ती।‘ ‘और राजनेताओं को अपना खेल खेलने अवसर उपलब्ध हो जाता है’।
इस बीच हमारा नाश्ता तैयार था। बीरेंद्र ने कहा, चलो पहले नाश्ता कर लें। जो कुछ भी हो हम कर ही क्या सकते हैं? झेलना तो पड़ेगा ही।‘ हमने सोचा, हफ्ते दिन की अपनी व्यवस्था हो ही गई है और दुकानदार ने कहा ही है कि, ‘आगे भी कोई जरूरत हो, आप धीरे से नॉक कर बता देना, मैं अंदर से ही थैले में डाल कर दे दूंगा। मेरे रहते हुए आप लोग भूखे थोड़े रहोगे’। फिलहाल तो फिर चिंता की कोई बात नहीं है। दुकानदार के स्टॉक खत्म होने तक कोई परेशानी नहीं है। बाद की बाद में देखी जाएगी, पहले ब्रेकफ़ास्ट करते हैं।
ब्रेकफ़ास्ट के साथ चर्चा फिर छिड़ी। क्या बात हो रही थी, व्यक्तिगत ईर्ष्या और द्वेष ऐसी परिस्थितियों को और खराब कर देतीं हैं और सामूहिक उन्माद का रूप लेतीं हैं। मैंने कहा, ‘यही तो हुआ था जब महात्मा गाँधी की हत्या हुई थी। उस समय महाराष्ट्र के कई शहरों में ब्राह्मणों का कत्ले-आम शुरू हो गया था, सिर्फ इसलिए कि हत्यारा ब्राह्मण था।‘ मेरी बातों को आगे बढ़ते हुए बीरेंद्र बोला, ‘जो स्थिति थी उस समय थी कि कुछ स्थानीय सत्ता लोलुप नेताओं ने स्व-हित में जन-उन्माद को ब्राह्मणों के विरुद्ध भड़काया था, वैसी ही स्थिति आज भी है जब दो सिखों की गलती की सजा भीड़ देश के हर सिख को देना चाहती है’।
बहस और विवाद का दौर जब मौका मिलता शुरू हो जाता। लेकिन यूनिवर्सिटी बंद होने की वजह से पर्याप्त समय उपलब्ध था। बनाओ, खाओ, पढ़ो और लड़ो। लड़ना मतलब कोई कुश्ती नहीं, वैचारिक द्वन्द और उग्र बहस, दोस्ती पर बिना किसी दुष्प्रभाव के।
ऐसी उग्र बहस से ऐसे कठिन समय में अच्छा टाइम पास हो जाता है। सामान्य वार्तालाप तो चर्चा को ड्रैब और बोरिंग बना देती हैं। वैसे भी इन हालातों में बहस की जंग जीतने से अधिक जरूरी था सर्वाइवल की कश्मकश से पार पाना। तीन टाइम का खाना बनाना, यानी ब्रेकफ़ास्ट, लंच और डिनर। संजय चाय भी बमुश्किल ही बना पता था। राकेश और बीरेंद्र छोटी मोटी चीजें बना लेते थे। पर प्रॉपर खाना अलग बात थी। मेरी थोड़ी निपुणता रही थी इस विधा में, और इसका इल्म बीरेंद्र को था क्योंकि हम साथ रह चुके थे। तय हुआ राकेश ब्रेकफ़ास्ट बना लेगा। उसमें कुछ विशेष झंझट था नहीं। मैं और बीरेंद्र दोपहर और रात का खाना देख लेंगे। संजय ने आकाशवाणी और बीबीसी की खबरें सुनने और हमें वस्तुस्थिति से आगाह रखने की जिम्मेवारी उठाई, जैसे कमरे में रेडियो पर न्यूज आ रहा हो तब भी हम सुन-समझ नहीं पाते। वैसे क्रिकेट कॉमेन्टरी सुनना और स्कोर बताने को वह अपना परम पुनीत दायित्व समझता, पर दुर्भाग्यवश मैच रद्द हो गए थे।
सच पूछें तो यह बताना कठिन था कि संजय को किस बात का अधिक दुख था, देश की प्रधान मंत्री की हत्या का, इन कठिन परिस्थितियों में समय काटने का या फिर क्रिकेट मैच रद्द होने का। बहरहाल ब्रेकफ़ास्ट कर, दो-तीन घंटे की पढ़ाई के बाद लंच बनाने का ड्रिल शुरू हुआ। हालात जो भी हो पढ़ाई तो करनी ही थी, सब सिविल सर्विसेज़ की तैयारी के लिए ही तो दिल्ली आए थे।
पहला दिन था, शॉर्टकट में ही निपटा लिया जाए, ऐसा सोच खिचड़ी चोखा बनने लगा। ‘खिचड़ी चोखा बिना पापड़ के मजा नहीं देगा, संजय की विशेष उक्ति थी। देखता हूँ पीछे वाली दुकान खुली है तो भागकर लाता हूँ’। कदाचित पल भर को वह अपने सूरते-हाल से बेखबर हो चुका था। संजय बिहार के मिथिलाञ्चल से था, जहाँ के लोग खाने-पीने के बेहद शौकीन होते हैं। अतः खाने की सोचकर एक बार को परिस्थिति की विषमता के अहसास को खो देना कुछ अस्वाभाविक नहीं लगता। किन्तु जो बना कुछ नहीं रहा हो, और ऐसी नफ़ासत की बात करे, तो खाना बनाने वालों को चिढ़ तो मचेगी ही। पापड़ का नाम कान में पड़ते ही मैं उस पर झुँझला उठा। ‘रईसी मत झाड़ों जो मिलता है उससे संतोष करो’। तब तक उसे भी अपनी बचकानी हरकत का अहसास हो गया था, और मेरी बात सुनते ही एकदम से झेंप गया, बोला, ‘सॉरी यार’, मेरे मुँह से बस यूँ ही निकल गया, अन्यथा मैं भी समझता हूँ कि यह नफासत का समय नहीं है’। बात आगे ना बढ़े यह सोचकर, हमारे ग्रुप का शांत-चित सदस्य बीरेंद्र मुझे देखकर बोला, ‘छोड़ो भाई, आगे कुछ मत बोलो, संजय को अपनी गलती समझ में आ गई है’।
पहले दिन आपसी समझ, सीमित साधन और मानसिक शांति की कमी के वजह से छोटी-छोटी बातों पर हम एक दूसरे पर खीझ उठते। लेकिन अगले दिन तक तो ‘सर्वाइव’ करने की दृष्टि से चीजें व्यवस्थित हो गईं थी। ब्रेकफ़ास्ट के लिए खास सोचना नहीं था, ब्रेड, मक्खन और चाय का ही प्लान था, क्योंकि दोपहर में चावल के साथ एग-करी बनना था। पिछले दिन खिचड़ी चोखा में बर्तनों की दिक्कत महसूस नहीं हुई, खिचड़ी के चावल-दाल के साथ ही कुकर में चोखा के लिए आलू उबलने के लिए डाल दिया था। खिचड़ी बन कर तैयार हुई और साथ ही आलू उबल गया। चोखा में कोई ताम-झाम था नहीं। नमक, प्याज और तेल ही तो मिलाना था। हाँ खाना बारी-बारी से खाना पड़ा क्योंकि प्लेटें दो ही थीं। आने वाले दिनों में भी खाना बारी-बारी से होता रहा।
आज एग करी के साथ चावल बन रहा था। एक छोटे से कुकर और चाय वाले पैन में ही सब कुछ बनना था। आज भी कुकर ही वो पात्र था जिसमें एग करी भी बनेगा और चावल भी। हाँ एग करी में बॉयल्ड एग के साथ बॉयल्ड आलू के टुकड़े मिल जाए तो एक अलग स्वाद आ जाता है। पैन में एग उबलने के लिए स्टोव रखना ही था, साथ में आलू भी रख दिया गया। इतने में प्याज वगैरह काट लिए गए। स्टोव तो एक ही था, नहीं तो प्याज और मसाला भी कुकर में साथ ही भुनता रहता। पर यहाँ तो अंडे और आलू के उबल जाने का इंतजार करना था। फिर एक के बाद दूसरा करके हमारा अंडा करी और चावल तैयार हुआ। इन सब में समय सामान्य से अधिक लग रहा था।
समय काफी निकल चुका था, किन्तु भूख का आभास बिल्कुल भी नहीं हुआ। उस कोठी के फर्स्ट फ्लोर पर ही रहने वाला विक्रम दो दिन से अपने दोस्त के साथ के एम कॉलेज हॉस्टल में फँसा था। ३१ तारीख को ही दोपहर में वह गया था, अमितेश से कुछ नोट्स लेना था। लौट नहीं पाया, रात में अमितेश ने रोक लिया था। उसे भी हॉस्टल में टी वी न्यूज देखने का अतिरिक्त लोभ था। और फिर कर्फ्यू लग गया। दो दिन तो उसकी हिम्मत हुई नहीं कि वह वहाँ से बी डी एस्टेट वापस लौटे। वहीं पड़ा रहा। उस कॉलेज के हॉस्टल से पीछे का कमला नेहरू नगर मार्केट काफी कुछ दिख जाता था। मार्केट में क्या कुछ चल रहा है, हॉस्टल के छात्र देख सकते थे और देख भी रहे थे। विक्रम भी वहीं था, लाजिमी तौर पर उसे भी देखना ही था। वहाँ का दृश्य ही अलग था। उपद्रवी सड़कों पर थे, दुकानें तोड़ कर लूटी जा रही थीं। पुलिस दंगाइयों को रोकने की बजाय उनकी मदद कर रही थी। भारी सामान मसलन टी वी आदि उठाकर सिर पर रखने में ही नहीं, दुकानें चिह्नित करने और तोड़ने में भी। लूट के बाद दुकानों को जलाने के लिए भी दंगाइयों को उकसाया जा रहा था। यह सब देख कर विक्रम को स्पष्ट हो गया था, सिखों के अलावा अन्य को रोका नहीं जा रहा, और तब उसने अपने रूम में वापस आने की हिम्मत जुटाई। बसें तो बंद थी। विक्रम कुछ दूर पुलिस पेट्रोल वालों से लिफ्ट लेकर और कुछ दूर पैदल चल कर वापस पहुँचा था।
राकेश के रूम में हम चारों के जमावड़े की उसे भनक नहीं थी। राकेश के कमरे में एक कैजुअल लुक डालते हुए विक्रम अपने रूम में निकल जाना चाहता था, संभवतः राकेश को बताते हुए कि वह वापस आ गया। किन्तु उसकी नजर जैसे ही हम तीनों पर पड़ी वह अंदर आ गया। वापसी की अपनी एडवेंचर शेयर करनी थी और कमला नेहरू मार्केट का आँखों देखा हाल जो सुनाना था। विक्रम ने जैसे ही शुरू किया, ‘तुम लोग जानते भी हो बाहर क्या हो रहा?’ हम सबके कान खड़े हो गए। ‘हमें क्या पता होगा, हम तो इस कमरे से लेकर पीछे वाली दुकान तक बँध के रह गए है’। हमने कहा, ‘बाहर से तुम आ रहे हो, फिर तुम ही बताओ क्या हो रहा है। और हाँ ढाबा तो कोई खुला नहीं है, खाने की कोई व्यवस्था तुम्हारे रूम में होगी भी नहीं, तो यहीं हमारे साथ ही खाना खा लेना’।
‘बाहर की आँखों-देखी तो मैं सुना रहा हूँ, पर इस समय खाने में साथ नहीं दूंगा, अमितेश के हॉस्टल में ही खा लिया था। पर लेट मी बी ब्लन्ट, रात से, स्थिति सामान्य होने तक, तुम लोगों के साथ ही खाऊँगा, बनाने में मैं भी मदद कर दूंगा। इस माहौल में अकेले कुछ बनाने में दिल नहीं लगेगा’। विक्रम ने अपनी बात पूरी की। उसकी आँखों-देखी सुन कर हम तो दंग रह गए। क्या पुलिस दंगाइयों की मदद कर रही है?
यह जानकार लगने लगा, अवश्य ही इन्हें कहीं ऊपर से आदेश है, अन्यथा यह सब खुले आम करने की हिम्मत नहीं होती। अलग-अलग एरिया से खबरें आने लगी। पूर्वी दिल्ली के सुल्तानपुरी, त्रिलोकपुरी और मंगोलपुरी के साथ में पश्चिमी दिल्ली की नांगलोई, उत्तर-पश्चिमी दिल्ली के अशोक विहार का नाम भी लिया जाने लगा। ऐसी खबरें उड़ने लगी कि सांसदों को निर्देश है कि अपने-अपने क्षेत्रों में सिखों को ठीक से सबक सिखाएं। इन सांसदों में होड़ सी लगी है, कौन बाजी मारता है। फिर क्या था, त्रिलोकपुरी समेत दिल्ली के अन्य कई गुरुद्वारों में शरण लिए सिखों को जिंदा जला दिया गया या जलाने की पुरजोर कोशिश की गई। घर के बाहर दिखने वाले सिखों के गले में ट्रक का टायर डाल कर आग लगा दिया जा रहा है। अशोक विहार में दीप सिनेमा को दंगाइयों ने फूँक डाला है।
बाद में इन खबरों की पुष्टि भी हुई। चार सांसदों का चेहरा उभर कर सामने आया, वे थे सज्जन कुमार, एच के एल भगत, धरम दास शास्त्री और जगदीश टाईटलर। यही वे चार चेहरे थे चौरासी के आठ के आगे चार की तरह चिपकने वाले। इनमें से सज्जन कुमार को छोड़ तीन भले ही सबूत के अभाव में बरी हो गये हों, पर चौरासी के उन चार दिनों के साथ ये चार चेहरे भी चिपक चुके थे।
तीसरे दिन ‘शक्ति स्थल’ पर पूर्व प्रधान मंत्री का दाह संस्कार होना था। अब तक दिल्ली धधक रही थी। पुलिस अंतिम दर्शन को आए लोगों की सुरक्षा और उस एरिया यानी तीन मूर्ति जहाँ पार्थिव शरीर दर्शनार्थ रखा हुआ था, की व्यवस्था में मशरुफ़ थी। शहर जल रहा था। पुलिस रोकने में असमर्थ थी, या रोकना ही नहीं चाहती थी। अंततः अन्त्येष्टि के दिन दोपहर बाद सेना की टुकड़ियों का दिल्ली की सड़कों पर फ्लैग मार्च शुरू हुआ। दंगा की तीव्रता कुछ कम हुई पर कमोबेश अगले दिन तक चलती रही। चार दिन का तांडव खत्म हुआ पर बहुत कुछ नष्ट कर। दिल्ली-दिल्ली में २७०० से ऊपर सिखों ने जान गँवाई। जान बचाने के लिए जाने कितने सिखों ने अपने केश कटवा लिए ताकि सिख के रूप में उनकी पहचान ना हो सके।
देश के कई स्थानों से हिंसा और पलायन की खबरें भी आ रही थीं। बिहार के छोटे से शहर गोपालगंज और पास के थावे में तीन चार सिख परिवारों को इन्हीं चार दिनों में अपना घर बार छोड़कर भागना पड़ा। थावे के सरदार लाभ सिंह जी के घर बिल्कुल छोटा सा ‘मैं’, लगभग छः वर्ष का, अपनी बहनों के साथ गया था। लाभ सिंह की बेटियाँ मेरी बहनों के साथ पढ़ती थी। उनका बेटा, जो मेरी उम्र का था, पठानी सूट पहने हुए था, उसके बड़े बाल छोटे पटके से बँधे सिर पर उपरिगामी जूड़े की तरह फब रहे थे। पहली बार हमने सेवई उन्हीं के घर खाई थी तब। तब कच्ची सेवइयाँ हैंड प्रेस्ड मशीन से तैयार की जाती थीं। चाची, यानी लाभ सिंह जी की पत्नी इसे घर ही में तैयार करती थी। ये सेवइयाँ शक्ल सूरत में मोटी होतीं थी। आज जैसी मशीन से बनी बाजार में मिलने वाली पतली बारीक नहीं। पर दूध चीनी के साथ उबल कर उनमें भी स्वाद था। उनमें काजू-किशमिश भी पड़ा था जिससे जायका और बढ़ गया था। मेरे हमउम्र सरदार के पठानी सूट की तरह पठान सूट पहना मेरे सिर पर भी पटका में बँधा जूड़ा देखने का शौक मेरी बहनों को कई वर्षों तक रहा।
उस छोटी जगह में कपड़ा कारोबारी लाभ सिंह का हर व्यक्ति से पारिवारिक संबंध था। जिनके साथ दशकों का उठना बैठना, खाना-पीना था, उन्हीं लोगों ने इनकी दुकान, गोदाम, घर और सब कुछ लूट लिया। इन्हीं चार दिनों के दरम्यान। किसी तरह जान बक्शी थी लोगों ने। विभाजन के समय लाभ सिंह के साथ ही संतोख सिंह, दलीप सिंह और सतवीर-बलवीर के पिता भी गोपालगंज आए थे। शुरूआती सालों में फेरी लगाकर लेमनचुस, बिस्कुट, टॉफी बेंच कर अपना छोटा मोटा कारोबार जमाया था इन्होंने। संतोख और दलीप, दोनों भाइयों ने मिलकर साइकिल और कपड़े की दुकान शुरू की थी। बलवीर-सतवीर के पिओ ने परचून की दुकान। इनका कारोबार भी जमा और व्यवहार भी। समाज में ऐसे हिल मिल गए थे मानों ये सब पुश्तों से वहीं है। इनकी भोजपुरी पंजाबी से अधिक नेचुरल लगती थी। पर एक ही झटके में लोगों ने दोस्ती-यारी, बात-व्यवहार सब भुला दिया, जैसे इन्हें कोई जानता ही नहीं हो। इनकी दुकाने लूट ली गईं, सोते समय घर में आग लगा दी गई, किसी तरह पीछे के रास्ते जान बचा कर भागे, और भागे भी क्या, कहीं गायब ही हो गए, कभी पलट कर ना आने के लिए। चार दशकों से भी कम में यह दूसरा पलायन! विभाजन की त्रासदी अभी ताजी ही थी कि फिर से एक और त्रासदी अपने ही देश में, आजाद भारत में, आजादी के पैतीस-सैंतीस साल के अंदर।
क्षुधा और आत्म ग्लानि से संघर्ष के उन क्षणों में बरबस कई प्रसंग दिमाग में उठने लगते। जिन वीर सपूतों ने भारत माता के आबरू की रक्षा में अपने शीश कटाए, जिनके बच्चों की बलि दीवार में जिंदा चुनवा कर दी गई, उन्हीं का भारत माँ के गोद में ही कत्ले-आम हो रहा है। आज जो हो रहा है क्या यह उसी प्रबुद्ध मानसिकता वाली नेतृत्व की देन नहीं है, जिसने, नवें गुरु पादशाह का शीश तन से जुदा करने वाले और साहबजादे जोरावर सिंह जी और फतेह सिंह जी को दीवार में जिंदा चुनवाने वाले के नृशंस कृत्य के बावजूद उसके सम्मान में राजधानी की एक प्रमुख सड़क का नाम रख दिया।
छः-सात दिन उस छोटे से कमरे में हम चार मित्र एकाध शाम की उपवास और सुबहो-शाम के तर्क-वितर्क के बीच जीवन की डोर थामे दृढ़ता से डटे रहे। जीवन की डोर जितनी ही दृढ़ता से हमने पकड़ी थी, मन के अन्तर्द्वंद की तीव्रता उससे कहीं बहुत ही अधिक। किन्तु जीवन-पथ से जल्दी विचलित होना विरले हो पाता। आंतरिक द्वन्द में कर्तव्य बोध भी कम तंग नहीं करता।
अशोक विहार दिल्ली के अति प्रभावित क्षेत्रों में था। वहाँ से समान समेट कर बी डी एस्टेट की तरफ ही आ जाना चाहिए, यह लगने लगा था। सातवें दिन हम चारों अशोक विहार पहुँच गए। सामान बाँध लाना था। उधर रुके रहने की हिम्मत ना मुझमें बची थी, नहीं संजय में।
अशोक विहार बस स्टॉप दीप सिनेमा के पास था। क्या हृदयविदारक दृश्य था? सड़कों की छाती टैंकों ने रौंदी डाली थी। हर तरफ भारी-भरकम टैंक की चौड़ी पहियों की मोटी जंजीर वाली चेन सड़कों के सीने में धँसी पड़ी थी। जैसे ये निशान सालों साल ना मिटने वाली हों। राजपथ को तो इनका अनुभव रहा होगा, पर दिल्ली की बहुतायत सड़कों के लिए यह अनुभव डरावना ही था। दीप सिनेमा की व्यथा इन सड़कों से तनिक कम न थी। जिस बॉक्स ऑफिस से हमने कई बार टिकटें ली थी, उसे पहले बेरहमी से पीटा गया था। जैसे बार-बार बिना टिकट निराश लौटने वालों ने अपना गुस्सा उसकी हड्डी-पसली तोड़ कर निकालनी चाही हो। उसे नोचा-खसोटा गया था, लगे पोस्टर, टिकटों की प्राइस लिस्ट, शो टाइम की जानकारी फाड़कर दीवारों को किसी धारदार हथियार से गोदा गया हो, उन्हें चीरने की कोशिश की गई हो, और फिर जब थक गए हों तो उसे आग के हवाले कर दिया गया हो। दीवारों पर गोदने और चीरने के निशान जल कर काले होने पर भी स्पष्ट थे। एक अजीब मनःस्थिति में रूम में पहुँचें। मनःस्थिति अजीब हो भी क्यों ना, मनोरंजन के माध्यम से आत्मिक सुख पहुँचने वाले मंदिर की समग्र पीड़ा जो दिल में उतर आई थी। मनोरंजन के इस मंदिर से जुड़े कई सुखद अनुभव थे हम चारों के।
आंटी (मकान मालकिन) ने देखते ही हाल-चाल पूछा। हमें ठीक-ठाक देखकर उन्होंने राहत की साँस ली. हमने उन्हें बताया, हम सामान लेकर अभी चले जाएंगे, उधर अपनी तरफ के स्टूडेंट्स बहुत हैं, मन आश्वस्त रहेगा। आम तौर पर एक महीने का किराया लेने के बाद ही ऐसे अचानक खाली करने का प्रस्ताव मानते थे लोग। पर यह समय बिल्कुल अलग था। आंटी ने प्रतिवाद नहीं किया। पैकिंग के बाद हमने सोचा, आज एक अंतिम बार श्रवण के हाथ से फूलके और पनीर खा लें और पुराना उधार भी चुकता कर दें। पर अशोक विहार के उस शॉपिंग कॉम्प्लेक्स की शक्ल इन सात दिनों पहचान से परे थी। कई दुकाने जली हुई थीं। वह ईटरी भी जल चुकी थी। काउन्टर की अध-जली टाँगे, टेढ़े-पिचके भगोने आदि जहाँ तहाँ बिखरे पड़े थे। उस ईटरी के साथ श्रवण का अस्तित्व ऐसे जुड़ गया था कि हम भूल ही गए थे कि उसके मालिक सरदार थे। उन बिखरे भगोने और काउन्टर की अध-जली टाँगों और श्रवण की हवा में हिलती छवि के अतिरिक्त उस ईटरी का कोई अवशेष शेष नहीं था।
सामान टैक्सी में भर कर हम वापस चल पड़े। भारी मन, बिल्कुल चुप। अब तक बीते चार-पाँच दिनों के विषय में हमने सिर्फ सुना था। आज सब आँखों के सामने था। प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या। निःशब्द चले आ रहे थे। कभी सिर उठा दूसरे का मुँह देख लेते, जैसे वह कुछ कह रहा हो। पर नजरे मिलते सामने वाला पूछ बैठता, ‘कुछ बोल रहे थे क्या’, जवाब एक शब्द का होता, ‘नहीं’।
वह शाम राकेश के कमरे में निष्प्राण हो गया था। अशोक विहार की ईटरी की हालत देख सब की भूख भी निश्चेष्ट थी। दोपहर् के फाका के बाद भी शाम की जठराग्नि सुप्त थी। रेडियो पर आकाशवाणी और बीबीसी के समाचार के अतिरिक्त कोई शोर नहीं था। नाउम्मीदी में भी उम्मीद होती कोई सूचना इन तथ्यों को झुठला देती। पर काश, यह संभव होता!
दिन गुजरे, हफ्ता निकल गया। वो चार चित्र, श्रीमती गाँधी अपने, ‘एक एक कतरा खून--- ‘ वाले वक्तव्य के साथ, सेन्चुरी ना बन पाने से पवेलियन में मुँह लटका कर दुखी बैठा वेंसरकर, श्रवण के हाथों में संजय की झूलती हुई पाँचवीं रोटी और ‘मैं’, वह नहीं जो अशोक विहार के ईटरी में हतप्रभ था, बल्कि छः साल का ‘मैं’ सरदार लाभ सिंह के घर में जीवन में पहली बार सेवई की कटोरी हाथ में लिए हुए, बार-बार आँख मिचौली करने लगे।
ये चार चित्र, वे चार दिन, उससे चिपके वे चार चेहरे और एक कमरे में बंद हम चार मित्र चौरासी के आठ के आगे के चार के साथ मेरे दिमाग के एक फ्रेम में फ्रीज हो गए थे, और रेडियो पर एक महापुरुष की आवाज आ रही थी, ‘जब कोई बड़ा पेड़ गिरता है तो धरती हिलती ही है’, जैसे जो हुआ वे जायज़ था!
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सत्येन्द्र प्रकाश भारतीय सूचना सेवा के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं। इन्होंने केन्द्रीय संचार ब्यूरो और पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के प्रधान महानिदेशक के रूप में अपनी सेवाएँ दी है। रचनात्मक लेखन के साथ साथ अध्यात्म, फ़ोटोग्राफ़ी और वन तथा वन्यजीवों में भी इनकी रुचि रही है।