रसोई का संडे भी होता है क्या
क्या ये संभव है कि कहानी में सीधे-सीधे कोई सन्देश दिया जाए और फिर भी वह रोचक कहानी बनी रहे? हम कहेंगे कि बिलकुल हो सकता है. सत्येन्द्र प्रकाश आजकल अपनी कहानियों में जो प्रयोग कर रहे हैं, उनमें से एक यह भी हुआ है जो आप नीचे वाली कहानी में देखेंगे. स्त्री-पुरुष समानता की बात की शुरुआत क्या घर की रसोई से नहीं होनी चाहिए? अपने इस सन्देश को जिस भाव-प्रवणता के साथ सत्येन्द्र प्रकाश ने रखा है, वह इस कहानी को को अनूठा बनाता है.
रसोई का संडे
सत्येन्द्र प्रकाश
विभु की नींद उस दिन जल्दी टूट गई थी। घर में सबने सोचा था कि विभु यानी वैभव सुबह १० बजे से पहले कहाँ उठने वाला है! उसकी बारहवीं की परीक्षा कल खत्म हुई थी। परीक्षा के दिनों में तो न सोने का कोई तय समय था, न ही उठने का। बीती रात पढ़ते-पढ़ते आने वाली सुबह के चार बज गए, तो फिर उसे जगाने की किसी को हड़बड़ी नहीं होती। अपनी मरज़ी से आठ बजे उठे तो ठीक, दस बज गए तो भी कोई बात नहीं। दरअसल विभु दिन में सोता नहीं था, दस मिनट की झपकी ले ली तो ले ली नहीं तो वह भी नहीं। इसलिए सब सोचते थे कि पाँच-छः घंटे की उसकी नींद पूरी हो जाए तो ही ठीक है। पर विभु पाँच-छः घंटे भी कहाँ सो पाता था। किसी दिन तीन-चार घंटे सो कर ही उठ बैठता कि बहुत पढ़ाई करनी है, तो किसी दिन पूरी-पूरी रात जगा रहता।
जिस दिन पेपर होना होता उस दिन देर से सोने के बावजूद वह सुबह जल्दी उठ जाता। आम तौर पर खुद जग जाता, नहीं तो मम्मी तो थीं ही उठाने के लिए। परीक्षाएं खत्म हुई हों तो अगले दिन देर तक सोते रहना बहुत स्वाभाविक होता है। वैसे भी वह शनिवार का दिन था, जिस दिन विभु का आखिरी पेपर खत्म हुआ था। अगला दिन संडे था। उसके पापा शैलेन्द्र मोहन को ऑफिस जाने की चिंता नहीं थी। अंजली, उसकी मम्मी, का स्कूल भी नहीं था। सब देर से उठने वाले थे। सुमु (सुमुखी), विभु की छोटी बहन का तो खैर जल्दी उठने का कोई सवाल ही नहीं था।
घरवालों के साथ विभु के घर की रसोई भी उस संडे अन्य संडे की तुलना में अधिक निश्चिंत थी। वैसे तो रसोई में किसी दिन का क्या? संडे हो या अन्य कोई भी दिन, रसोई के लिए सब एक जैसे होते हैं। पर हाँ, आम तौर पर संडे को रसोई का दिन देर से शुरू होता। ना बड़ों को ऑफिस पहुँचने की जल्दी होती है, न ही बच्चों का टिफ़िन समय से तैयार करना होता है। संडे को रसोई की सुबह भी फिर अलसाई सी ही रहती है। उस दिन शायद रसोई भी अपनी नींद पूरी कर लेना चाहती है। कदमों की आहट हो या अँधेरे में स्विच टटोलते हाथ, संडे को रसोई की सुबह खराब करने कोई जल्दी पास नहीं फटकता। उस दिन तो खुद के चैन की नींद के नाम पर घर वालों की ‘बेड-टी’ की तलब भी देर से ही लगती।
संडे सुबह की घनघोर शांति के बाद जब एक बार रसोई हरकत में आ जाती तो फिर सुबह की पूरी कसर नाश्ते और खाने की खास फरमाइशों को पूरी करने में निकल जाती। सब चाहते कि उनकी पसंद का कुछ ना कुछ अवश्य बने। इस चक्कर में रसोई की अलसाई सुबह एक अति सक्रिय दिन में तब्दील हो जाती। नाश्ते में सुमु को भटूरे खाने होते तो शैलेन्द्र को पराठे, विभु पाव भाजी खाने की जिद करता। अंजली की जीभ भी तो मचलती होगी, किसी चटपटे नाश्ते के लिए। लंच और डिनर का प्लान पिछले संडे के स्पेशल लंच और डिनर पर ही बन जाता। इस संडे बिरयानी, कोरमा, रायता हो गया तो अगले संडे बेड़मी कचौड़ियाँ, कश्मीरी पुलाव, दम आलू बनारसी या शाही पनीर और रायता हो जाए। मीठे में खीर, सेवई या फिरनी बन जाए तो फिर सोने पर सुहागा।
खान-पान का भारतीय जीवन में खासा दखल रहा है। राजा नल रचित महाभारत काल का ‘पाकदर्पण’ इस दखल की ही तो साक्षी है। भारतवर्ष की रसोइयों में इस राजसी परंपरा का निर्वहन सदियों से पूरी तत्परता से होता रहा है। फिर शैलेन्द्र के घर की रसोई को कोई शिकायत क्यों होने लगी! बल्कि उसे नाज़ था देश के उन कतिपय गिने-चुने घरों की रसोई में शुमार होने का जो लिंग-निरपेक्ष थे, पूर्णतया नहीं तो भी काफी हद तक।
शैलेन्द्र की अपनी रसोई से गाढ़ी दोस्ती थी। सामान्यतया संडे को उसकी रसोई नारी-मुक्त हो जाती। अपने पाक-कौशल से अंजली को इम्प्रेस करने की दिशा में शैलेन्द्र को यह अपनी एक सशक्त पहल लगती थी। कालांतर में जब बच्चे बड़े होने लगे तो अंजली से अधिक बच्चों को इम्प्रेस करने की फ़िराक में शैलेन्द्र लगा रहता। बच्चों की रुचि और स्वाद के अनुसार कोई डिश बना लेना शैलेन्द्र की सनक सी थी। संभवतः रसोई से अपनी दोस्ती को समय-चक्र के उबाऊपन से बचाने के लिए वह नित नए मोटिवेशन तलाशता। बच्चों की नज़र में ‘नो इट ऑल’ पापा नहीं बल्कि ‘डू इट ऑल’ पापा बनना उसकी सोच थी।
ठीक-ठीक कहा जाए तो अंजली या बच्चों की प्रशंसा की ललक तो काफी बाद की बात है। शैलेन्द्र स्वयं से अक्सर यह सवाल करता कि भूख और स्वाद तो लिंग-भेद नहीं करते तो क्षुधा-तृप्ति का सारा भार औरतों के कंधों पर कैसे आ गया। हंटर्स-गैदरर्स के समय से अब तक महिलाओं की भागीदारी घर के बाहर के क्रिया-कलापों में भी सक्रियता की रही है। फिर रसोई की जिम्मेदारी से सिर्फ औरतों को किसने बाँध दिया, कब बाँध दिया? शैलेन्द्र का मन यह गुत्थी सुलझा नहीं पाता। कई बार लगता कि बाह्य-जीवन के झंझटों और थपेड़ों से महिलाओं की सुरक्षा के बहाने घर की चारदीवारी में महिलाओं को कैद करने की यह पुरुषों की साजिश है। एक बार जिंदगी चार दीवारों के भीतर स्वेच्छा से स्व-हितार्थ सिमट गई, फिर वे घर का हर काम खुशी-खुशी करने को तत्पर हो जातीं। लेकिन एक पुरुष की सोच जब उस पर हावी होती तो उसे लगता कि पुरुषों की भूख और जीभ पर नियंत्रण के जरिए पुरुषों को अपने वश में रखने की यह औरतों की ही चाल है।
बहरहाल इस संदर्भ में शैलेन्द्र की सोच छात्र जीवन से ही आम सोच के इतर रही थी। उसे यह कतई उचित नहीं लगता की खाना पकाने की जवाबदेही सिर्फ और सिर्फ महिलाओं की ही होनी चाहिए। अस्वस्थ होने की दशा में भी खाना घर की औरतें ही पकाएंगी, अन्यथा परिवार को फाका-मस्ती की नौबत आ जाएगी, शैलेन्द्र का दिल इसे कभी स्वीकार नहीं करता। उसने अपनी माँ को देखा था। माँ के अक्सर बीमार रहने के स्थिति में भी घर के किसी पुरुष सदस्य को रसोई का काम करने में उन्हें यही लगता कि उनकी जग-हँसाई होगी। यह बात उसे बहुत ही अटपटी लगती। यह कौन सी सोच है? माँ के लिए उसका मन द्रवित हो उठता। माँ से वह यही कहता तुम मुझे बता दो कौन सी चीज कैसे बनती है, उनके बताए अनुसार वह सब कुछ बना लेगा। फिर शैलेन्द्र ऐसे अवसर की तलाश में रहने लगा कि जब खाना बनाना सीखने को मिल जाए। चावल, दाल, चोखा बनाना तो उसने आसानी से सीख लिया, उसके बाद धीरे-धीरे रोटी और साधारण सब्जी बनाने की कला भी सीख ली। अपने विद्यार्थी जीवन में दोस्तों के साथ अलग फ्लैट में, जिसमें किचेन की सुविधा थी, रहते समय तो नए-नए प्रयोग होने लगे। इस प्रयोगशाला में शैलेन्द्र ने वेज और नॉन-वेज की कई डिसेज़ बनाने में निपुणता हासिल कर ली।
वापिस विभु पर आएं तो एग्ज़ैम खत्म होने के बाद के संडे को तो रसोई को यही लगा था कि सुबह की चाय या अधिक से अधिक नाश्ते के बाद सभी का आउटिंग का प्लान होगा। दिन और रात दोनों का। क्या पता कई दिनों का प्रोग्राम बन गया हो! बच्चों का दिल घूमने का भी तो होगा। बच्चों के पढ़ाई और परीक्षाओं का सोचकर, शैलेन्द्र और अंजली भी तो कई वर्षों से घूमने नहीं निकल पाए थे। उनकी रसोई को अगर यह उम्मीद बँध गई हो कि इस बार तो लंबी शांति मिलने वाली है, तो इसमें आश्चर्य ही क्या है?
किन्तु नहीं, रसोई का यह संडे तो कुछ अलग ही था। विभु ने तड़के ही रसोई में दस्तक दे दी। उसे इतनी सुबह देखकर रसोई के भी विस्मय का ठिकाना नहीं था। मुँह-अंधेरे दबे पाँव दाखिल हुआ था वह। जैसे कोई खुराफात सोची हुई हो। बत्ती जलाने के लिए स्विच भी सहमी उंगलियों से दबाया, कहीं रसोई का संडे ना खराब हो जाए। लेकिन उससे बड़ी बात थी कि उसे मम्मी को सरप्राइज़ करना था। यह सरप्राइज़ कोई ऐसा छोटा मोटा वाला सरप्राइज़ नहीं था। अगर रसोई में हो रही चहलकदमी से अंजली उठ गईं तो सारा प्लान चौपट हो जाएगा। यद्यपि यह योजना विभु ने पापा शैलेन्द्र के साथ मिल कर ही बनाई थी, फिर भी वह चाह रहा था कि पापा भी थोड़ा अचंभित हों! सुमु हिस्सा तो थी इस योजना की, पर उसकी कोई खास भूमिका नहीं थी। वैसे भी वह अपनी नींद पूरी किए बिना कहाँ उठने वाली थी वह।
विभु की योजना थी कि सुबह के जलपान की पहले पूरी तैयारी कर ले, फिर बेड-टी के साथ पापा को उठाएगा। नाश्ते में चीज़-ऑमलेट और टोस्ट के साथ कॉफी का प्रोग्राम था उसका। दोपहर में कड़ाही पनीर, अरहर की दाल और भात बना कर अपना हुनर दिखा देगा। पिछली रात जब उसने अपने पापा से अपनी मंशा साझा की तो शैलेन्द्र तो एकदम से उछल गया। विस्मय में उसकी नजरें विभु के चेहरे पर जैसे अटक सी गईं। ‘बेसिक कुकिंग’ अब सब को आनी चाहिए, ऐसा शैलेन्द्र सोचता था। आज एकल परिवार जीवन की सच्चाई बन चुकीं हैं और कुकिंग जरूरी लाइफ स्किल।
अंजली की सोच अलग थी। खास कर सुमु को लेकर। उसे लगता उसकी पूरी जिंदगी रसोई में खप गई, यद्यपि शैलेन्द्र की कोशिश होती कि वह अंजली का हाथ बटाए। अगर हो सके तो वह बीच-बीच में किचेन की कमान खुद संभाल भी लेता। लेकिन सच्चाई तो यही थी कि ‘खाना बनाना’ जिम्मेदारी तो अंजली की ही थी। परंपरा और मान्यता तो यही कहती है। तभी तो उसे लगता कि एक बार सुमु किचेन का काम समझ गई, तो चाहे-अनचाहे किचेन में उसके खपने का सिलसिला शुरू हो जाएगा। यही परंपरा रही है हमारे यहाँ, बेटे घर के बाबू होते और बेटियों को ‘लौंड़ी’ बना दिया जाता। इस सोच में छुपा दर्द एक स्त्री ही समझ सकती है। उसकी राय बिल्कुल स्पष्ट थी, उसके बच्चे रसोई में अपनी जिंदगी नहीं झोंकेंगे। कहती तो वह बच्चे थी, लेकिन चिंता उसे सुमु की थी। भारतीय परंपरा में तो इसकी अपेक्षा लड़कियों से ही होती है। एक बार लड़की ने रसोई का मुँह कर लिया, फिर छुटकारा पाना मुश्किल हो जाता। मध्यम वर्गीय परिवारों में मेहमानों का ताँता भी तो लगा रहता था। आने जाने वाला हर कोई लपक कर फिर सुमु को ही आवाज देता, सुमु थोड़ी चाय बना ले, चाय के साथ दो-चार पकौड़ियाँ ही तल ले। ना हो तो थोडा पोहा ही बना ले, उसमें तो कोई झंझट नहीं है।
अंजली ने देखा था, उसकी बहनें बारह-तेरह की उम्र से ही रसोई में जुतती रहीं थी। हाथ बटाने के बहाने माँ ने जो एक बार रसोई का रास्ता दिखा दिया, फिर वापसी की राह जैसे उन्हें दिखी ही नहीं! आखिर माँ को अपना दायित्व भी तो निभाना था, बेटियों को रसोई के काम में पारंगत कर ही ससुराल के लिए विदा करके। नहीं तो परवरिश और खानदान के संस्कारों पर सवाल जो उठने लगते। खाना पकाने की शिक्षा और संस्कारों की दीक्षा लिए अंजली की बहनें अपने ससुराल में भी पिसती ही रहीं। पंद्रह-बीस लोगों के संयुक्त परिवार में घड़ी भर रात रहते जो वे रसोई में घुसतीं फिर आधी रात के आस-पास ही फुरसत पातीं।
अंजली स्वयं भी मायके और ससुराल के लोगों को खुश करने के चक्कर में लगभग रसोई की होकर ही रह गई थी। कोई पीने के लिए पानी का गिलास भी खुद उठ कर नहीं लेता। सभी को सुमु के संस्कारों की चिंता लगी रहती, जैसे खुद के संस्कारों में उठ कर पानी पी लेना वर्जित हो! छोटे बड़े हर काम के लिए उसे ही आवाज दी जाती। सुमु की पढ़ाई का हवाला दे अंजली खुद आगे बढ़ कर सभी की फरमाइशें पूरी करती रहती।
अंजली के आँखों के सामने उस दिन का दृश्य जैसे नाचते रहता है। सुमु के ताया-ताई यानि अंजली के जेठ-जेठानी आए हुए थे। सुमु ने स्कूल से लौट कर यूनिफ़ॉर्म बदला और आ कर ताया के पास बैठ गई। विभु पहले से उनसे बातें कर रहा था। ताऊ जी कोई रोचक किस्सा सुना रहे थे। होम वर्क शुरू करने से पहले सुमु को लगा थोड़ी देर उसे भी ताया के पास बैठना चाहिए। वरना कहीं वे ये न सोच लें कि यह बच्ची उनसे कटते रहती है। वैसे ताऊ जी का किस्सा भी कम रोचक नहीं था। सुमु की उम्र ही क्या थी उस समय-यही कोई ग्यारह साल। किस्सा सुनने का मन भी तो कर रहा था। सो आ कर बैठ गई।
किस्सा सुनाते-सुनाते ताया जी ने सुमु की ताई से कहा थोड़ी चाय ही बना लाती! पलक भी नहीं झपका की ताई जी ने सुमु को आदेश दे डाला, थोड़ा फुसलाने के अंदाज में, ‘ए सुमु, तू ही तो मेरी प्यारी बिटिया हो’, ‘अपने बड़े पापा के लिए चाय बना लाओ ना’। सुमु की उम्र देखते हुए ताया जी को खुद ही अपनी पत्नी पर खीझ हुई। लेकिन झुँझलाहट छुपाते हुए पत्नी को कहा, ‘तुम उठकर जाती तो दो-चार पकौड़ियाँ भी तल लेती’। फिर तो कोई चारा नहीं बचा। लेकिन तब भी सुमु को रसोई में साथ चलने को कहने लगीं, यह बताने के लिए कि कौन सी चीज कहाँ रखी है। सुमु भी क्या करती, ताई की बात कैसे टालती। ताई के साथ चल पड़ी, किस्सा सुनने के लोभ का संवरण करते हुए।
किचेन में पहुँच कर वे एक बाद एक सुमु को काम बताने लगी, मैं गैस जला रही हूँ तब तक तुम थोड़ा बेसन घोल लो, कढ़ाई भी बाहर निकाल लो आदि आदि। अंजली अपने कमरे से सब कुछ देख-सुन रही थी। इस पर उससे रहा नहीं गया, वह बाहर निकल कर बोली, कोई बात नहीं, आप बैठिए मैं ही बना लाती हूँ। सुमु को लेकर अंजली की फिक्र गैर-वाजिब नहीं थी।
ऐसा नहीं था कि शैलेन्द्र अंजली से असहमत हो, पर उसे एक अलग किस्म की चिंता सताती। वह सोचता कि आज पति-पत्नी और एकाध बच्चों का ही परिवार होता है। इसमें अगर पत्नी बीमार हो जाए, तो क्या घर का चूल्हा नहीं जलेगा? संयुक्त परिवार वाली निश्चिंतता तो उपलब्ध है नहीं कि एक बीमार हो तो दूसरी बहू खाना बना लेगी।
किन्तु एकल परिवार के बावजूद उसके घर में तो ऐसा कभी नहीं हुआ। उस समय भी जब वे ‘कुक’ अफोर्ड नहीं कर सकते थे। ऐसा इसीलिए संभव था क्योंकि शैलेन्द्र कुकिंग जानता था। जब कभी अंजली बीमार होती, ऐसा नहीं होता कि बच्चे टिफ़िन न ले जा कर कैन्टीन से कुछ खाएं। कैन्टीन का पनीर कुलचा, नूडल्स, या बर्गर बच्चों को ललचाते, और वे यही चाहते कि टिफ़िन की जगह उन्हें पैसे ही मिल जाए। लेकिन अंजली की असमर्थता बच्चों के कैन्टीन से खाने की वजह बने, शैलेन्द्र को उचित नहीं लगता। कभी और शौक से बच्चे भले कैन्टीन में खा लें, पर अंजली बीमार हो तब तो हरगिज नहीं। इस स्थिति में वह हर हाल में यह सुनिश्चित करता कि नाश्ते के साथ दोनों शाम का खाना तो घर में हो ही, बच्चों का टिफ़िन और उसका लंच भी घर से ही पैक हो। और एक बार नहीं, कई बार ऐसे अवसर आए भी, कारण चाहे जो भी रहा हो।
शैलेन्द्र के विचार में ‘कुकिंग’ आज के समय में एक जरूरी ‘लाइफ स्किल’ है, और यह लड़की और लड़कों दोनों को ही आनी चाहिए। आज जब बच्चे विदेशों में जॉब करने लगे हैं, तब इसकी आवश्यकता पहले भी अधिक हो गई है। विदेशों में तो ‘कुक’ मिलते नहीं, फिर कुकिंग ना आने की वजह से जिंदगी ‘हॉट डॉग, ‘फुट लौंग’, और ‘बर्गर-पिज्जा’ पर ही कटेगी। इसी वजह से वह विभु और सुमु को बार-बार इसके लिए समझाता था। सुमु तो अभी छोटी थी, पर विभु ने भी कभी अपने पापा के इस सुझाव पर उत्साहित नहीं दिखा। दिखे भी कैसे, उसके स्कूल के बच्चों में जब ऐसे मुद्दों पर बात होती, एक स्वर में सब इसे लड़कियों की ही जिम्मेदारी बताते। अपने अपने घरों का उदाहरण भी दे डालते। सबके घरों में रसोई का काम पूर्णतया मम्मियों के जिम्मे था। कई तो अपने पिता की पुरुषवादी मनोभावों का बखान भी करने लग पड़ते।
विभु सोचता, उसके पापा कहीं से कम-पुरुष तो नहीं। क्या उसके पापा दब्बू हैं और मम्मी उन पर हावी रहती हैं? ऐसे तमाम सवाल उसके दिमाग में कौंधते रहते। विभु इन बातों की चर्चा शैलेन्द्र से भी करता जब वे उसे ‘कुकिंग’ को ‘लाइफ स्किल’ के रूप सीखने की नसीहत देते। शैलेन्द्र इसे स्त्रियों को दबाकर रखने की सदियों पुरानी साजिश बताता, जिसका ताना-बाना पुरुषों ने बड़ी बारीकी से बुना था, यहाँ तक की स्त्रियाँ भी ऐसे सभी दायित्वों को निभाना अपना धर्म समझने लगीं थीं। कहीं से भी किसी बदलाव की बात हो तो उसे धर्म-निषिद्ध बताकर उनका मनोबल तोड़ने का मर्दों द्वारा सामूहिक अभियान चला दिया जाता।
विभु अपनी मम्मी की दृष्टि से जब शैलेन्द्र की कही बातों पर गौर करता तो ये बातें सहानुभूति में निकली बातें नहीं बल्कि उसके दृढ़ विश्वास को दर्शातीं। विभु को शैलेन्द्र की उस दिन की एक्साइट्मन्ट नहीं भूलती। अंजली अपनी दोस्तों के साथ जयपुर-अजमेर-पुष्कर घूमने गई थी। तब उस परिवेश की औरतें बिना किसी मर्द के कहीं घूमने जाने की सोच भी नहीं सकती थीं। अंजली ने जब इसकी चर्चा शैलेन्द्र से की, तो उसने दुगुने उत्साह के साथ उसे प्रोत्साहित किया। चार दिनों की ‘आउटिंग’ के बाद अंजली उस दिन लौट रही थी। शैलेन्द्र ने उसके स्वागत में उसका पसंदीदा ‘एग करी’, अपना खास डिश ‘मटन मोहन’ (सरसों दही अदरक में मेरीनेटेड) और ‘रोस्टेड फिश’ बनाया था। शैलेन्द्र के इस अंदाज ने अंजली को खासा ही भावुक कर दिया था। विभु और सुमु के दिल को भी यह बात छू गई थी और पापा ने उन्हें मोह लिया था।
पापा की अपने विचारों की इस दृढ़ता और उन पर अमल की प्रतिबद्धता से विभु प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता था। हाँ ऊपर से वह इसे जाहिर नहीं होने देता। फिर भी शैलेन्द्र के साथ वीकेंड्स में कभी-कभी वह किचेन में आ जाता, उनसे बातचीत करने के बहाने। बातचीत के क्रम में ध्यान भी देता कि पापा कौन सा डिश कैसे बना रहे हैं। सीखने की बात तो वह कभी नहीं स्वीकारता, लेकिन उसका दिल पिता की बातों की मेरिट को स्वीकार करता। मजाक के तौर ही सही, ऊपर से अनमना दिखते हुए, कुछ बनाने की कोशिश करने लगता। शैलेन्द्र भी यही जाहिर करता कि वह इसे विभु का कौतुक ही समझ रहा है, खाना पकाना सीखने की दिली-इच्छा नहीं। मजाक के इस खेल में विभु बहुत कुछ सीखता गया था।
बारहवीं के आखिरी पेपर के दिन, जब शैलेन्द्र उसे पिक कर वापस आ रहा था तब विभु ने उससे अपनी बात कही, ‘अगले दिन यानि संडे को जब वे भी घर पर होंगे उनके देखरेख में लंच वह बनाएगा’। यह कहते समय उसने स्वीकार किया कि उसे शैलेन्द्र की ‘लाइफ स्किल’ वाली बात में मेरिट दिखता है और कॉमपेटीटिव एग्ज़ाम्स के बाद वह उनसे और अंजली से खाना बनाना भी सीखेगा। सुन कर शैलेन्द्र को तसल्ली हुई।
तो बात शुरू हुई थी उस संडे की जब विभु सुबह-सवेरे घर की रसोई में दाखिल होता है, अपनी पूर्व-नियोजित योजना के साथ। पहला झटका तो घर की रसोई को ही लगता है। उसे लगा था वो सुबह उन गिने-चुने सुबहों में होगी जो शांत होती थी। पर उलटा वह सुबह दोहरा झटका ले कर आई थी। पहला, वह आम दिनों की सुबह से भी थोड़ी जल्दी शुरू गई थी। लेकिन बड़ा झटका तो विभु का मुँह-अंधेरे रसोई में घुसना था। फिर उसके घुसते ही खटर-पटर! रसोई तो यही सोचने लगी काश! उसका मन भी कोई जान पाया होता। आज तो थोड़ा एक्स्ट्रा चैन उसके नसीब आया होता।
पर चैन छिनने के बावजूद रसोई रोमांचित थी। आखिर यह लड़का बाप के नक्शे-कदम पर आ ही गया। उसका भी कौतूहल बढ़ गया था। आखिर यह लड़का करने वाला क्या है? विस्मय के साथ वह विभु को निहारने लगी। विभु ने ‘चीज़ ऑमलेट’ के लिए ‘चीज़’ फ्रिज से निकल लिया। फिर प्याज बारीक काटने की कोशिश में जुट गया। अभ्यास के अभाव में हाथों में विश्वास की कमी स्पष्ट थी, किन्तु संकल्प में दृढ़ता की कमी बिल्कुल भी नहीं। धीरे-धीरे ही सही, उसने चार डबल ऑमलेट भर का प्याज ‘कट’ कर लिया। हरी मिर्च और धनिया के टुकड़े भी तैयार कर लिया उसने। ‘चीज़’ भी ‘ग्रेट’ कर साइड में रख दिया। टोस्ट के लिए ‘ब्रेड-लोफ’ भी फ्रिज से बाहर निकाल लिया। जब नाश्ते की इतनी तैयारी हो गई और इसमें इसमें सात भी बज गए तो उसे लगा कि अब मम्मी-पापा के लिए ‘बेड-टी’ बना लेनी चाहिए. उसने मसाला चाय बनाई और ट्रे में बिस्किट के साथ सजाकर मम्मी-पापा के कमरे तक पहुँचा। उसने दरवाजा खटखटाया।
दरवाजा खुला और शैलेन्द्र ने विभु के हाथ में चाय की ट्रे देखी। इस दृश्य ने तो शैलेन्द्र को भी अचंभे में डाल दिया था। शैलेन्द्र और विभु की कल यही तो बात हुई थी कि दोनों साथ किचेन में घुसेंगे। लेकिन विभु तो सुबह की चाय बना कर उन्हें जगा रहा था। अंजली को तो इस पूरे मामले का कोई इल्म ही नहीं था। वह यह दृश्य देखकर भौचक्क थी। आज तो इस लड़के को अपनी सालों की नींद पूरी कर लेनी थी। पर यह क्या, वह तो मम्मी-पापा की बेड टी तैयार कर लाया था। और इसने चाय बनानी कब सीख ली? बाप के साथ जब रसोई में होता तो बस गप्पें मारा करता। बाप बेटे की गंभीर बहस सुन यही लगता कि दुनिया का हर मसला यहीं रसोईं में ही सुलझ जाएगा। फिर चाय बनानी कब सीखी इसने? ऐसे तमाम प्रश्न अंजली के दिमाग में तैरने लगे। पर जो भी था, अंजली के लिए भी यह एक सुखद आश्चर्य था। शायद विभु की जगह सुमु होती तो आश्चर्य कोई दुःस्वप्न ही लगता, और उसकी अपनी जिंदगी की रील चल पड़ती!
माँ को चाय पकड़ाते हुए विभु ने घोषणा की, आज का ब्रेक्फास्ट और लंच मैं बना रहा हूँ। पापा गाइड करेंगे। और हाँ आज किचेन नारी-मुक्त रहेगी, यानि किचेन में आपका और सुमु का प्रवेश निषिद्ध।
अब अंजली को बाप बेटे की मिली भगत का कुछ सुराग हाथ आया। पर विभु तो मम्मी पापा दोनों को यह कहते हुए कमरे से बाहर निकल गया कि वे दोनों जल्दी फ्रेश हो ब्रेक्फास्ट के लिए आ जाए। बस आधे घंटे में चीज ऑमलेट, टोस्ट और कॉफी तैयार मिलेगी। जाते जाते लपक कर सुमु को भी आवाज दे दी, स्पेशल ब्रेक्फास्ट खाना हो तो फटाफट हाथ-मुँह धोकर आ जाए।
शैलेन्द्र जल्दी ही फ्रेश होकर रसोई में आ गया। विभु अकेला ब्रेक्फास्ट कैसे बना पाएगा? उसकी मदद तो करनी ही होगी। शैलेन्द्र के किचेन में आने तक विभु का चीज़-ऑमलेट तैयार था। ब्रेड सेंकना रह रहा था। शैलेन्द्र ने कहा, ‘दो ब्रेड मैं सेंके देता हूँ’। विभु ने उन्हे आश्वस्त करते हुए कहा, ‘चिंता नहीं करें, सब हो जाएगा, आप बस खड़े रहें।‘ ‘ब्रेकफ़ास्ट कर बताएं कि बना कैसा है। हाँ लंच में चावल दाल सब्जी तो शायद मैं कर लूँ, रोटी आपको ही बनानी होगी’।
ब्रेक्फास्ट टेबल पर लग गया। शैलेन्द्र और विभु ने सभी चीजें करीने से टेबल पर सजाई थी। अंजली और सुमु भी टेबल पर आकर साथ बैठ गईं। अंजली भाव विभोर हो विभु को देख रही थी। ‘चीज़- ऑमलेट टेस्टी बनी है’, कहते हुए अंजली ने विभु की तारीफ की। हाँ टेस्टी तो है, पर बस ‘नमक अधिक है’, कह सुमु उसकी खिंचाई कर रही थी। विभु सुमु को देख हँस पड़ा, साथ में सुमु और मम्मी पापा भी।
अंजली को लगने, उसका विभु अब बड़ा ही नहीं सयाना भी हो गया है। उसे भी शैलेन्द्र की सोच की गहराई समझ में आने लगी थी। उसका दिल भी मान गया कि आज के युग में लड़के लड़की दोनों को ही ‘बेसिक कुकिंग’ तो आनी ही चाहिए। विभु ने फिर माँ को आग्रह किया कि कॉमपेटेटीव परीक्षाएं होने के बाद वे उसे कुकिंग की प्रैक्टिस करा देंगी। अंजली की आँखें भर आईं। शैलेन्द्र के चेहरे से भी संतोष की आभा टपक रही थी।
रसोई भी प्रफुल्लित थी। सोच रही थी, क्रांति घर से ही शुरू होगी, अगर हर माँ अपने बेटों को भी ‘बेसिक कुकिंग’ सिखाने की पहल करें और उनकी पारिवारिक जवाबदेहियों से परिचित कराएं। और हाँ बेटियों को भी उनके स्वाभाविक हुनर से वंचित ना रखें।
***********
सत्येन्द्र प्रकाश भारतीय सूचना सेवा के सेवा निवृत्त अधिकारी हैं। इन्होंने केन्द्रीय संचार ब्यूरो और पत्र सूचना कार्यालय (पीआईबी) के प्रधान महानिदेशक के रूप में अपनी सेवाएँ दी है। रचनात्मक लेखन के साथ साथ अध्यात्म, फ़ोटोग्राफ़ी और वन तथा वन्यजीवों में भी इनकी रुचि रही है।