एक दूसरे से दूर : नन्दिता मिश्र की नई कहानी
नन्दिता मिश्र भावप्रवण कहानियां लिखती हैं। उनकी कहानियों में घटनाएं गति से घटती जाती हैं जैसे उन्हें बहुत सी बातें कहनी हों और समय कुछ कम हो! कभी-कभी लगता है कि उनकी कहानी में कई और कहानियों के भी सूत्र छिपे हैं जिनका इस्तेमाल वह नई कहानियां लिखने में करेंगी। इस कहानी को भेजते समय उन्होंने हमें बताया कि यह कहानी काफी बरस पहले लिखी रह गई थी और अभी तक अप्रकाशित है। तभी इस कहानी में कुछ पुराना फ्लेवर भी है जो पुराने चावल की तरह इस कहानी को महका रहा है। और हाँ, आपने इस वेब-पत्रिका में प्रकाशित उनकी कुछ पूर्व-प्रकाशित कहानियां पढनी हों तो आप इन लिंक्स पर देख सकते हैं - लाइब्रेरी, बाबा का मसनद, आखिर क्यूँ, माँ, अंतर्मन का द्वन्द और या फिर उनके नाम पर क्लिक करके उनकी सभी रचनाएँ देख सकते हैं.
एक दूसरे से दूर : नन्दिता मिश्र की नई कहानी
निधि ने खिड़की से झांक कर देखा, टैक्सी आ गई थी। उसने बाहर निकलने से पहले भारी मन से एक बार फिर चिट्ठी पढ़ी जो उसने पिछली रात से ही रजत के लिए लिख कर रखी थी - "रजत मैं जा रही हूं, जब मेरा मन स्वस्थ हो जाएगा, तुम्हें खबर करूंगी। मुझे ढूंढ़ने की कोशिश मत करना। अपना ध्यान रखना-निधि"।
चिट्ठी टेबल पर रख कर, अपने गले से मंगलसूत्र, हाथ से चूड़ियां निकालकर उस पर रख दीं। और सोचा क्या ये सुहाग चिह्न अपने से अलग करने से रजत से संबंध टूट गये हैं। फिर एक झटके से बिना पीछे मुड़े घर से बाहर आ गई। दरवाजे पर ताला लगाया। मिस वर्मा के घर कॉल बैल बजाई। अजीब लोग हैं दरवाजा खोलने में कितनी देर लगाते हैं। नौकरानी ने दरवाजा खोला तो चैन की सांस ली। अच्छा हुआ मिस वर्मा घर पर नहीं थीं। अगर होतीं तो न जाने कितने सवाल करतीं। कहां जा रही हो, कब तक आओगी, कहीं शहर से बाहर जा रही हो क्या? वगैरह-वगैरह!
सीढ़ियां उतरते हुए उसके पांव कांप रहे थे। लगभग पैर घसीटते हुए वह आकर टैक्सी में बैठ गई। वह बहुत नर्वस हो रही थी। कहीं टैक्सी ड्राइवर उसकी नर्वसनेस न भांप ले, उसने आंखें मूंद लीं। टैक्सी चली तो ठंडी हवा का झोंका आया और उसे कुछ राहत मिली। सीट पर सिर टिका कर वह सोचने लगी वो जो करने जा रही है वह ठीक है न! क्या रजत को बताये बिना इस तरह घर छोड़ना ठीक है? बताने पर वो आने देते? खैर! अब तो कदम उठा ही लिया है। जो होगा वो झेलना ही पड़ेगा।
झेलना तो वैसे ही निरंतर चल रहा था। जब से शादी हुई थी सहज जीवन जिया ही कहां था उसने। पिछले दस वर्षों में न जाने कितनी बार उसने रजत को और घर को छोड़ना चाहा था। कभी मां-बाबूजी का ध्यान आ जाता तो कभी पापा-मम्मी का, जया का दुलार, तो कभी इस डर से लोग क्या कहेंगे, सोच कर उसने ये फैसला करने में इतना वक्त लगा दिया।
जैसे-जैसे टैक्सी घर से दूर होती जा रही थी निधि की घबराहट, झुंझलाहट कम होती जा रही थी। नई जिंदगी की शुरुआत कुल मिलाकर ठीक हो रही है, ऐसा लगा। एक तो रजत को अभी दो दिन और टूर पर रहना था। वे जब तक आयेंगे वह पूना पहुंच कर नौकरी ज्वाइन कर चुकी होगी। इसी बीच विचारों की श्रंखला टूटी। टैक्सी वाले ने कहा - "ताई स्टेशन आ गया। कुली चाहिए क्या?"
"नहीं, ज्यादा सामान नहीं है। खुद ही उठा लूंगी"- कहते हुए निधि ने टैक्सी का किराया चुकाया। ट्रेन प्लेटफार्म पर लगी थी। अपनी सीट ढूंढ कर बैठ गई। थोड़ी देर बाद ट्रेन चल दी। सोचने लगी पूना पहुंच कर कहां रुके। किसी परिचित के यहां। नहीं। यह ठीक नहीं होगा। रजत ढूंढ़ेगे तो उसे कम से कम! उन्हें छोड़कर आने के बाद भी मन में कहीं ये बात थी कि शायद लोक-लाज के भय से उसे ढूंढ़ेगे। सामने नजर पड़ी तो देखा एक नवविवाहित जोड़ा बैठा था पर दोनों की उम्र सामान्य नव-विवाहित जोड़ों से ज़्यादा लग रही थी। लड़की के हाथों में कोहनी तक मेंहदी लगी हुई थी। नवविवाहिता हर स्टेशन पर शरमा-शरमा कर, इतराकर धीमी आवाज में कुछ फरमाइश करती और पतिदेव बड़ी तत्परता से दौने पर दौने लाकर उसे रिझाते रहे। बैठने का सलीका क्या होता है, सार्वजनिक स्थानों पर इसका भान नहीं था। कुछ लोगों को उनका व्यवहार अटपटा लग रहा था तो कुछ उसका मजा उठा रहे थे। निधि को भी उन पर खीझ आ रही थी पर क्या करती। सोचने लगी जब दस वर्ष पहले उसका विवाह हुआ था तब ससुराल में कितना संकोच होता था उसे। हर बात में सावधानी बरतती थी वह। मम्मी और ननद जया उसका बहुत ध्यान रखते थे। फिर भी वह डरती थी। इतने वर्षों बाद आज भी अपने ही घर में कुछ करने से पहले दस बार सोचना पड़ता था।
निधि का विवाह अचानक तय हुआ था। उसकी मां पढ़ी-लिखी नहीं थीं, पर समझदार थीं। निधि और निति दोनों को पढ़ा रही थीं। उसके साथ की लड़कियों के विवाह भी हो चुके थे और बाल-बच्चे भी। मां का मानना था कि बेटियां अपने पैरों पर खड़ी होने लायक हो जायें फिर सोचेंगे शादी-ब्याह की बात। रिश्ते आते थे, लाये जाते थे पर उन्हें संभाल कर लौटा दिया जाता था। रिश्तेदार नाराज हो जाते थे ऐसे समय। मां की एक चचेरी बहन थीं चुन्नी। चुन्नी मौसी ने लेकिन हार नहीं मानी थी। एक दिन एक रिश्ता लाईं और निधि की कुंडली ले गईं मिलाने। लौटकर बताया कुंडली मिल गई है। अब बस लड़की देखने की बात है। संपन्न परिवार था लड़के वालों को मां ने टालना चाहा, पर मौसी कहां मानतीं। बोलीं- "अरे लल्ली, दहेज नहीं चाहिए उन्हें। बस लड़की पसंद आ जाये। चट मंगनी पट ब्याह। बुला लूं कल शाम उन्हें? क्योंकि एकाध दिन में वे वापस अपने शहर लखनऊ लौट जायेंगे।"
मां ने टाल दिया कि अभी इनसे बताया नहीं है। बेटी के पापा से पूछ कर बताऊंगी। मां सोच रही थीं कि दो दिन टल जायेंगे तो आराम से बात कर पायेंगी वो। अभी बताया तो बाबूजी नाराज होंगे। चुन्नी मौसी के बारे में वे ठीक नहीं सोचते। उन्हें लगता था कि मौसी अपना पैसा दिखाती हैं। मां को यही डर था।
तीसरे दिन मौसी रजत के पूरे परिवार के साथ अचानक आ धमकीं। दरवाजा मैंने ही खोला था। मां के हाथ-पांव फूल गये। मैं भी घबरा गई। पर मौसी हंसती जा रही थीं।
- "लल्ली घबरा क्यों रही है। अरे यहां बैठ। निधि को भी बुला। अरे, चाय-पानी की चिंता मत कर। टाइम कहां है इनके पास। ट्रेन का टाइम हो रहा है। वो तो मैंने रास्ते में बताया कि ये घर है उस लड़की का तो बस बहन जी पीछे पड़ गईं कि चलो लगे हाथ बेटी को देख लें। फिर न जाने लखनऊ से कब आना हो पाये, और हम आ गये।"
निधि को भी सजना-संवरना नहीं पड़ा। मौसी ने रजत की मां को पहले ही पटा लिया था। देखना-दिखाना तो बस एक रस्म थी जो स्टेशन जाते-जाते पूरी हो गई। निधि सुंदरता के भारतीय मापदण्ड पर खरी उतरती थी। रजत की मां जाते-जाते शगुन भी दे गई।
उनके जाने के बाद मां ने बाबूजी को सारी बात समझाई। बाबूजी ने उसे बुला कर कहा- ”देख बेटा, ये सब अचानक हो गया है। हमें सोचने विचारने का समय ही नहीं मिला। वैसे परिवार मुझे तो भला लगा। लड़का भी अच्छा है। फिर भी तुझे पसंद न हो तो हम बात संभाल लेंगे। अभी नहीं तो साल दो साल बाद शादी तो करनी ही है। सोच कर बताना। अपनी परिस्थिति तू जानती है। मुझे लगता है निपट जाये तेरा ब्याह जल्दी तो फिर नीति की फिक्र करेंगे।"
बस हो गई तय शादी। परीक्षा को सात-आठ माह बचे थे। तारीख परीक्षा के बाद तय करने का फैसला किया दोनों परिवारों ने। इन सात-आठ महीनों में रजत की मां हर त्योहार पर अपनी होने वाली बहू के लिए उपहार भिजवाती रहीं। दो एक बार जया आई तो साथ घूमने भी गये। अच्छी लगी जया उसे। हां, मां डरती रहीं। पर इस बीच रजत कभी नहीं आये न कोई उपहार आदि भेजे। बाबूजी मां ने इस बात को अच्छा संस्कार माना। निधि की ससुराल की संपन्नता उनके लिए गर्व की बात थी। अड़ौस-पड़ौस में कहती रहतीं मां कि वो तो हमारी बेटी की किस्मत अच्छी है इसी से ऐसा घर-वर मिला है। बाबूजी उनकी इस प्रचार-प्रसार की आदत से नाराज भी होते थे। पर मां को कहां ध्यान था इसका।
शादी हो गई। वो बन गई मिसेज रजत कुमार। ससुराल में आते ही जल्दी सबका मन मोह लिया। घर बार संभाल लिया। यहां तक कि काम वाली तारा बाई भी नई मालकिन को पाकर खुश थी। ससुराल में कुछ भी रूढ़िवादी नहीं था। बेटी और बहू दोनों में कोई फर्क नहीं करते थे पापा-मम्मी। जया भी बड़ी प्यारी दोस्त बन गई। वैसे उससे छह वर्ष छोटी थी जया। दिक्कत थी निधि के संकोची स्वभाव की। अपनी इच्छा से कुछ नहीं करती थी। निर्णय लेने में डरती थी। सब काम पूछ-पूछ कर करती थी।
शादी के बरस भर बाद रजत को दिल्ली में एक मल्टी-नेशनल कंपनी में काम मिला और वे लोग परिवार से दूर आ गये। मम्मी और जया दोनों दुखी हुईं। आने वाले दिन तीनों गले लग कर रोयीं । तब पापा हंस कर बोले, ”ससुराल से जाते हुए बहू रो रही है ये तो पहले कभी नहीं देखा और बहू के जाने पर सास और ननद ऐसे बिलख रहीं हैं जैसे मां और बहन।"
दिल्ली बड़ा शहर बड़ी नौकरी। ठाठ ही ठाठ। बंगला, नौकर, गाड़ी। क्या नहीं था। शुरू में निधि भी इस वैभव में प्रसन्नचित्त रही। लेकिन धीरे-धीरे अकेलापन उभरा और वैभव पर छा गया।
रजत अक्सर देर से आते। टूर भी काफी लगते थे। निधि किटी पार्टी वाले स्वभाव की नहीं थी। बहुत बोर होती। न जाने कितनी बार नेशनल म्यूजियम देख डाला। रजत जब घर में भी होते तो नहीं के बराबर। बोलते कम थे। छुट्टी वाला दिन यदि शहर में हैं तो पार्टी का होता - या अपने ही घर या किसी और के और या फिर कोई होटल या क्लब।
रजत अपने काम को, अपनी कम्पनी को और वहाँ अपनी तरक्की आदि को ही अहमियत देते। घर और निधि तो कहीं जा नहीं सकते और जो सुख-सुविधा पत्नी को चाहिये, वह तो दे ही रहे हैं ऐसी सोच थी पतिदेव की। सही अर्थों में 'वर्कोहलिक' और कुछ कम अर्थों में 'अल्कोहलिक' भी। निधि को शुरू में लगा धीरे-धीरे खुलेंगे। पर बरस, दो बरस, तीन बरस बीतते गये। निधि के जीवन में कोई बदलाव नहीं आया। बस, जब कभी घर से कोई आता उसे कुछ राहत मिल जाती।
एक बार निधि ने नये कुशन बनाये मिकी माउस के। जब वे पूरे हुये तो ड्रॉइंगरूम नये सिरे से सजाया। मन में आशा थी कि रजत आयेंगे तो तारीफ करेंगे। लेकिन ये क्या ? कमरे में घुसते ही जैसे कुशन पर नजर पड़ी और गंभीर हो गये। निधि भी चुपचाप चाय बनाने चली गई। चाय पीते समय बहुत डर कर पूछा- ”अच्छे नहीं लगे क्या...“
रजत एकदम भड़क गये...”अच्छे क्यों नहीं लगे। और आप ये सुन लीजिये इन्हें फौरन बदल दीजिये। यदि आप को इस घर में मिक्की माउस चाहिये तो ऐसी आस छोड़ दो। मेरे पास बच्चों को पालने-पोसने का समय नहीं है। यदि बच्चे हो जाते तो रोज शिकायत करती तुम कि देखो तुम हम लोगों को जरा भी समय नहीं देते। भूल जाओ ये सब। बच्चे चाहिए इन्हें!“
बड़बड़ाते हुए अंदर चले गये रजत। निधि सोच भी नहीं पाई कि क्या हुआ ये सब। क्यों नाराज हो गये। उस दिन पहली बार निधि वहीं सोफे पर बैठी रोते-रोते सो गई। उठकर देखा रजत अखबार पढ़ रहे थे। उन्हें चाय बना कर दी। खुद भी रोज की तरह वहीं बैठकर पी। जब रजत ऑफिस जा रहे थे तो उसने इतना पूछा- ”क्या मैं कुछ दिन पापा मम्मी को बुला लूं या खुद चली जाऊं।“
”क्यों? यहां क्या कष्ट है जनाब को? जानती हो ये धमकी नहीं चलेगी। जाना है तो जाओ एक नौकर रख लूंगा चौबीस घंटे का।"
स्तब्ध रह गई ये जवाब सुनकर निधि। चौबीस घंटे का नौकर उसका सब्सटीट्यूट। दोपहर को पोस्टमैन आया और एक खत थमा गया। बाबूजी को कुछ काम था ऑफिस का सो आ रहे हैं। और साथ में नीति भी आयेगी। मां को भी लाना चाहते हैं। सब कुछ दिन साथ रह लेंगे। यदि कोई असुविधा हो तो फोन पर बता दें। निधि सोचने लगी क्या करें। मना कर दें उन लोगों को। इस बीच निधि के दिल्ली-जीवन का अहसास भी नहीं था मायके और ससुराल में।
लेकिन ये क्या! खत टेबल पर छूट गया था और रजत ने ये मान कर पढ़ा कि उसके लिए रखा गया है। रात खाते वक्त बोले- "बाबूजी को फोन करना है। पड़ौसियों का नंबर है न - उन्हें फोन कर दो। और मेरे पी.ए. को दोपहर में उनके यहां रहने की तारीखें लिखवा देना ताकि कहीं बाहर का टूर न बने।"
जिस दिन बाबूजी को आना था निधि ने ड्राइवर से जल्दी आने को कहा था। सुबह उठी तो रजत भी साथ ही उठ गये। रजत कभी इतनी सुबह नहीं उठते हैं। उसने पूछा ”आपको ऑफिस जल्दी जाना है क्या ? कोई बात नहीं मैं टैक्सी मंगा लूंगी निजामुद्दीन जाने के लिए।"
”क्यों मैं नहीं जा सकता तुम्हारे परिवार को लेने। तुम्हें कोई जरूरत नहीं है जाने की। घर संभालो।“
स्टेशन से लौटते में खूब सारा खाने-पीने का सामान लाये। नीति से खूब हंस-हंस कर बातें कर रहे थे। खूब जोर से कॉल बैल बजाई हालांकि दरवाजा खुला था। मैं जैसे ही बाहर आई बोले - ”लो भाई आ गये! मां, बाबूजी और मेरी साली साहिबा। बाबूजी- आज तो मुझे ऑफिस जाना पड़ेगा। आप भी तैयार हो जायें तो आपको भी रास्ते में छोड़ दूंगा आपके दफ्तर। हां, कल की छुट्टी ले ली है मैंने। ठीक है न निधि! कहीं बाहर चलेंगे। शनि, रवि मिलाकर तीन दिन मिल जायेंगे।“
मैं हक्की-बक्की देख रही थी। क्या ये वही रजत हैं जो सुबह स्टेशन गये थे। रजत का ऐसा रूप देख कर चकित थी वह। दस दिन कैसे बीते पता ही नहीं चला। मां-बाबूजी निधि का यह सुख देखकर गदगद थे। वापस गये खूब खुश मन से। ढेरों आशीष देते हुये। जाते-जाते पापा डबडबाई आंखों को छिपाते से बोले- "अब जल्दी बुलाना बेटा। नाना कहने वाला चाहिये इस बूढ़े को।" निधि का चेहरा बच्चे के जिक्र से पीला पड़ गया।
उन लोगों के जाने के बाद फिर वही सूनापन, सन्नाटा। कभी सोचती थी, रजत चाहें तो सदा वैसे नहीं रह सकते। चलो इतना ही बहुत है कि मां, बाबूजी का ध्यान रखा।
रजत ने कभी भी निधि को किसी भी बात के लिए रोका-टोका नहीं। घर की एक जिम्मेदारी थी उनकी रुपये लाकर देना। कितने खर्च हुए, क्यों हुए, यदि बचे तो उनका क्या किया ? कोई मतलब नहीं इस सबसे। निधि को क्या पसंद है, क्या नापसंद ये कभी जाना ही नहीं उन्होंने। उसे भी रजत की पसंद-नापसंद की जानकारी जया और मां से मिली थी।
जिन पार्टियों में पत्नी बुलाई जाती वहां साथ ले जाते थे। बाहर उनका व्यवहार इतना अच्छा होता कि लगता कि घर कभी न जायें। कार से उतरते-उतरते या तो हाथ थाम लेते या सहारा देते। पार्टियों की जान थे रजत। हंसी, मजाक, चुटकुले, गजल, पॉप सब में माहिर थे। कितनी ही पार्टियों में निधि के साथ डूएट्स भी गाये। ‘मेड फॉर ईच अदर’, ‘परफेक्ट कपल’, ‘जुगल जोड़ी’ कहे जाते थे वे दोनों।
निधि को रजत के इस रूप से बेहद चिढ़ होने लगी थी। कभी-कभी मन करता डांस फ्लोर पर चिल्ला उठे- ”ये सब नाटक है। वे ऐसे नहीं हैं।̋ पर इतनी हिम्मत कहां थी। कैसे कहें कि उसका पति बहरूपिया है। झूठा है। नकली है। स्वार्थी है। रजत के स्पर्श मात्र से सिहर उठती थी वह। पूरा शरीर ठंडा पड़ जाता था। दिन-दिन वे दोनों एक दूसरे से दूर होते जा रहे थे।
एक दिन डिनर में मिसेज शशि ने निधि से कहा- "क्या करती रहती हो दिन भर। मैंने तुम्हें कभी भी किसी किटी पार्टी में नहीं देखा। आया करो।" निधि ने कहा- "मुझे रुचि नहीं है इस सब में"
"तो क्या रुचि है तुम्हारी। देखो भाई हमारी सलाह मानो। अब बहुत दिन हो गये हैं तुम्हें यहां आये। मिला-जुला करो। बोलो कल चलती हो टुडे आर्ट गैलरी में एम.एफ.हुसैन की पेटिंग्स देखने।"
निधि दूसरे दिन पहुंच गई कनाट प्लेस ड्राइवर को लेकर। श्रीमती शशि के साथ समय अच्छा कटा। फिर तो दोनों काफी मिलने लगीं। एक दिन उन्होंने कहा- मेरी एक मित्र आर्ट गैलरी खोल रही है चलो देखने उसका काम। वहां जाकर बहुत अच्छा लगा। अनजाने में अपने अनुभव के आधार पर निधि ने कुछ टिप्स भी दे दिये। श्रीमती झुनझुनवाला तो प्रभावित हो गईं। इतनी ज्यादा कि गैलरी प्रबंधक के पद का ऑफर भी दे डाला। उसने कहा रजत से बात करके बतायेगी।
शाम को रजत ने आकर कहा- नौकरी का इतना शौक था तो मुझसे कहा होता। मैं मना नहीं करता। ज्वाइन कर लो आर्ट गैलरी। आगे पीछे मैं अपनी कंपनी शुरू करूंगा तब श्रीमती शशि और झुनझुनवाला जैसे लोग काम आयेंगे। उसे कुछ कहने का मौका ही नहीं दिया। बिना बातचीत किये खाना खाकर सो गये।
नौकरी ने जीवन में आश्चर्यजनक परिवर्तन कर दिया था। पर घर पर वैसा ही था जीवन। तनाव भरा। या यूं कहिए कुछ था ही नहीं। कभी-कभी निधि भी बहुत थक जाती थी। रजत के स्पर्श से भी उसे वितृष्णा होने लगी थी। वह मन और तन दोनों से रजत से कोसों दूर थी। रजत का कोई काम ठीक नहीं हो पाता तो वे नाराज हो जाते। चिल्लाते, खीजते। ऐसा पहले नहीं होता था।
उधर आर्ट गैलरी में निधि सर्वेसर्वा थी। श्रीमती झुनझुनवाला कभी विशेष अवसरों पर आती थीं। सारा स्टाफ खुश था निधि से। आर्ट गैलरी भी खूब नाम कमा रही थी। एक दिन अचानक पैर फिसल जाने से वह सीढ़ियों से गिर गई। उसे अस्पताल ले जाया गया। रजत को बुला लिया उन लोगों ने। उसने नहीं कहा था बुलाने को। रजत आये तो स्टाफ वाले चले गये। बस रजत बरस पड़े।
”बीच मीटिंग में से आना पड़ा। जरा-सी फिसल गईं, अस्पताल आ गईं। मोच ही तो आई है ना पैर तो नहीं टूटा ? ठीक है डाक्टर से बात कर ली है। लौटते वक्त घर ले जाऊंगा। उसके पहले मन हो तो टैक्सी करके चली जाना। इतनी जरूरी मीटिंग थी। बीच में छोड़नी पड़ी।“
उस दिन निधि को लगा कि आठ-दस वर्षों में पहली बार रजत को अपनी इच्छा या जरूरत के बगैर उसके पास आना पड़ा। उसका कोई अस्तित्व ही नहीं है रजत के जीवन में। रात देर तक रजत लेने नहीं आये। सुबह वह खुद टैक्सी करके घर आ गई। उसने पूछा कि लेने क्यों नहीं आये तो भड़क गये।
- ”क्या और कोई काम नहीं है मुझे। मैंने कहा था न कि टैक्सी करके भी आ सकती हो। आखिर अभी आ गई न उसी तरह।“ खूब बोलते रहे अनाप-शनाप।
कहने लगे- ”श्रीमती झुनझुनवाला और शशि के साथ उठने-बैठने क्या लगी खुद को तोप समझने लगी हो तुम। तुम नौकरी करो या न करो, अब से मेरे काम और आराम में कोई कमी नहीं होनी चाहिये। चार-छह हजार की तनख्वाह मेरे लिए कुछ नहीं है। और न ही उससे घर चल सकता है। मध्यमवर्गीय परिवार की हो न समझती हो बड़ी फन्ने खां हो गई हो। आर्ट गैलरी में काम कर रही हो। मालिक नहीं हो उसकी।“
निधि के पांव में तकलीफ थी और अब मन का कष्ट- उसका कोई पारावार नहीं रहा। पहली बार बोल उठी-
”हां मालिक तो तुम हो मेरे। मेरी हैसियत क्या है इस घर में। खूब जानती हूं। कहीं चली गई तो एक चौबीस घंटे की नौकरानी या नौकर तुम्हारे सारे काम कर देगा। यही न।“
इतना कहते-कहते थर-थर कांपने लगी वह। चक्कर आया और गिर गई। रजत ने उसे उठाया और पलंग पर पटक दिया होगा गुस्से में। फिर तैयार हो कर ऑफिस चले गये। दोपहर श्रीमती झुनझुनवाला देखने आईं। उसका सूजा पांव देखकर घबरा गईं। फौरन डाक्टर के पास ले गई।। डाक्टर ने देखा। दर्द की दवा दी और सावधानी के ख्याल से पट्टी भी बांध दी। झुनझुनवाला घर छोड़ने आईं। हल्दी डालकर गरम दूध पिलाया और जब जाने को हुईं तो सिर पर हाथ रख कर बोलीं-
”रजत को फोन कर दूं। आ जाये छुट्टी लेकर“- तो निधि के सब्र का बांध एक झटके से टूट गया। तकलीफ में स्नेह भरा स्पर्श। फूट-फूट कर रोने लगी वह। वे भी जा न सकीं। पास बैठ गईं। चुप कराती रहीं। जब वह स्वस्थ हुई तो फिर आने का वादा कर चली गईं। करीब एक हफ्ता लगा उसे ठीक होकर काम पर जाने में। ये पूरे सातों दिन उसने खूब विचार विमर्श किया। किससे ? खुद से। कौन बैठा था उसकी सुनने। उसे खुद पर भी शर्म आ रही थी। वह भी कैसे उलझ रही है रजत से। ठीक होकर ऑफिस गई तो बस दिन भर लोग तबीयत पूछते रहे और रजत की तारीफ करते रहे। कितने अच्छे हैं कैसे मीटिंग छोड़कर आये ये मैडम के हसबैंड। कितने घबरा गये थे। जब मैडम को देखा तभी संभले। कितने केयरिंग हैं। असहनीय होता जा रहा था निधि के लिए। लेकिन और कोई चारा नहीं था। मुस्करा कर झेलती रही।
शाम को घर आई तो रजत घर पर थे।
”क्यों क्या हुआ। आप इतनी जल्दी?"
”मेरा घर है न ये! जल्दी नहीं आ सकता क्या? निधि में तुमसे कुछ कहना चाहता हूं। मैं चाहता हूं तुम ये नौकरी छोड़ दो। श्रीमती झुनझुनवाला हर जगह तुम्हारी तारीफ करती हैं। वे अब तुम्हें अपना पार्टनर बनाने की बात सोच रही हैं। आज आईं थीं। पूछ रही थीं- कुछ पैसा लगाओ तो पूना में गैलरी खोलना चाहती हैं। तुम्हें कहीं वहां न भेज दें। तुम उनकी पार्टनर बनना चाहती हो क्या ? जो कमाया है खुद वह लगाओ गैलरी में समझीं। यदि ऐसा चाहती हो तो। और ये भी सुन लो आजकल घर की बहुत बेकद्री हो रही है। ये चलेगा नहीं देर तक।
ये पूना में गैलरी का आइडिया कहीं तुम्हारा तो नहीं। यहां काम कर रही हो, वह किसी तरह सह रहा हूं। बार-बार पूना के दौरे हुए तो ठीक नहीं होगा और एक बात मेरे पास आर्ट जैसे बकवास के लिए पैसे नहीं हैं। मेरे खून पसीने की कमाई है। तुम्हारी तरह शौक नहीं पाल रहा हूं। कुछ बोलती क्यों नहीं। क्या इरादा है तुम्हारा। आखिर मुझे बताओ ये क्या कर रही हो श्रीमती झुनझुनवाला के साथ मिलकर। मत बताओ। मैं सब जानता हूं। ये सब बहुत दिन तक नहीं चलने वाला समझ गईं न।"
इतना कहकर रजत गुस्से में निकल गये। शायद उसी क्षण निधि ने घर छोड़ने का कठिन फैसला कर लिया था। श्रीमती झुनझुनवाला को बताया। उन्होंने कहा कुछ दिन और सोच लो। रजत को बता कर घर छोड़ो। निधि की इतनी हिम्मत न थी। अचानक रजत का टूर बना कलकत्ता का। बस निधि ने उस बीच अपना घर छोड़ा और पूना आ गई।
पूना आये करीब दो माह हो गये थे। एक दिन श्रीमती झुनझुनवाला का फोन आया कि रजत उनसे आकर बहुत झगड़े और उसका पता ले गये हैं। तीन-चार दिन बाद रजत पूना आ धमके। आर्ट गैलरी में अचानक उन्हें देख निधि घबरा गई। लेकिन रजत एक दर्शक की तरह चुपचाप घूमते रहे। शाम को जब वह गैलरी से बाहर आई तो वे भी साथ हो लिए। पूछा-
क्या घर चलने को नहीं कहोगी। वह कुछ कह नहीं पाई। रजत ने कार का दरवाजा खोला और साथ बैठ गये। ड्राइवर ने पूछा- ”मैडम कहां चलना है।“
घर और कहां।
राह भर चुप्पी छाई रही। निधि का घर उसके बंबई वाले घर से एकदम विपरीत था। हर जगह निधि की पसंद और कौशल छाया था। सादा, सुंदर लेकिन शानदार। रजत की निगाहें चारों ओर घूम रही थीं।
निधि ने कहा- मैंने कहा था न मुझे तलाशना मत।
कब तक निधि। तुम्हारे जाने के बाद मुझे समझ में आया कि तुम क्या हो। नौकर सब कर देता है पर निधि कहां है वहां। घर का खालीपन काटने को दौड़ता था। अकेले रहकर समझा अकेले रहने का दुख। तुम तो मेरे साथ रहकर भी अकेली थीं। बड़ी हिम्मत करके आया हूं। तुम्हें ले जाने नहीं सिर्फ यह जताने कि निधि तुम जब चाहो तब वापस आ जाना। मैं तुम्हारे बिना कुछ दिन बिता सकता हूं पूरा जीवन नहीं। तुम्हारी राह देखता रहूंगा रोज। इतना कहते-कहते रजत की आंखें डबडबा गईं, गला रुंध गया। निधि की आंखों से भी आंसू बहने लगे। न जाने कब दोनों एक-दूसरे की बाहों में समा गये।
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वर्षों आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग और केंद्र सरकार के अन्य संचार माध्यमों में कार्यरत रहने के बाद नन्दिता मिश्र अब स्वतंत्र लेखन करती हैं।