प्याज, लहसुन और अदरक - नन्दिता मिश्र की नई कहानी
कभी एक बार हमने नन्दिता मिश्र की कहानी एक दूसरे से दूर पर अपनी सम्पादकीय टिप्पणी में कहा था कि उनकी कहानियों में घटनाएं तेज़ गति से घटती जाती हैं जैसे उन्हें बहुत सी बातें कहनी हों और समय कुछ कम हो! ऐसा लगता है कि हमारी वरिष्ठ कहानीकार को हमारी यह टिप्पणी जंची नहीं कि उनकी कहानियां घटना प्रधान होती हैं। इस बार उन्होंने जो कहानी हमें भेजी है, उसमें आप कह सकते हैं कि कोई ख़ास घटना तो है ही नहीं। इसे आप पुरुष मित्रों के बीच चल रही एक गप्प-शप्प कह सकते हैं, लेकिन ऐसी रोचक गप्प-शप्प जिसके बीच से आप उठ नहीं सकते! शुद्धतावादी कह सकते हैं कि इसमें महिला का चित्रण पुरुषवादी दृष्टिकोण से है किन्तु वह बात दूर की कौड़ी होगी। कुल मिलाकर यह कि इस कहानी से नन्दिता मिश्र ने अपनी रेंज दिखाई है और चेताया है कि उन्हें किसी पहले से बने खांचे में फिट नहीं किया जा सकता।. अभी तो आप इस रोचक कहानी को पढ़िए जिसमें कोई घटना ना होते हुए भी समकालीन समाज पर एक गंभीर टिप्पणी है।
प्याज, लहसुन और अदरक
नन्दिता मिश्र
"अरे सुनती हो आज क्या बना रही हो। कुछ अच्छा बनाना। "
ये कहने की हिम्मत नहीं थी कि यूट्यूब की सब्जी से जी भर गया है। हर चीज़ में प्याज लहसुन और अदरक। साथ में अजवाइन,सोंफ और एक चम्मच हींग। ये यूट्यूब वालों ने,कभी असली हींग खाने की बात तो बहुत दूर की है, देखी ही नहीं होगी। एक चम्मच हींग - बाप रे बाप! असली हींग हो तो दो चुटकी में दो-एक किलो सब्ज़ी बन जाती है। पर इन नव पाकशास्त्रियों का क्या करें! हमारी श्रीमती जी अच्छा-ख़ासा स्वादिष्ट भोजन बना लेती हैं पर इन्हें हाल ही में आधुनिक खाना बनाने का शौक चढ़ गया है। इसके लिए हमारी पत्नी ने किटी पार्टी की सहेलियों से प्रेरणा पाकर यू ट्यूब पर रैसिपी देख कर खाना बनाना शुरू किया है. कहते हैं कि आजकल यही फैशन में है।
अब क्या करें। कुछ कहो तो सुनना पड़ता है आप वही पुरातन पंथी बातें करने लगते हो। दुनिया कहां से कहां पहुंच गयी पर आप बदलना ही नहीं चाहते। साथ ही फलाने ढिकाने न जाने कितने लोगों के बारे में सुनना पड़ता है कि वो अपनी पत्नी के साथ कितना एडजैस्ट करते हैं। हर काम में सपोर्ट करते हैं। श्रीमती जी अब ज़माने के साथ कदम से कदम मिला कर चल रही हैं और चाहती हैं हम भी वही करें। 'कुकरी क्लास' भी ज्वाइन कर चुकी हैं बल्कि अब तो सर्टिफिकेट भी मिल गया है। अब उनकी इच्छा है 'कांटीनेंटल' सीखने की। फिर बाद में बेकरी क्लास ज्वाइन कर केक पेस्ट्री भी सीखने का इरादा है। हमें अभी पता नहीं है कि केक-पेस्ट्री और 'कोंटीनेंटल' खाने की सामग्री कितना खर्च होने वाला है। हमारी पत्नी ने व्हाट्सएप्प पर आये उस मेसेज को बहुत गंभीरता से ग्रहण किया है जिसमें कहा गया था कि अगर आप बूढ़े नहीं होना चाहते तो हमेशा कुछ ना कुछ नया सीखते रहे हैं। इसीलिए वह बचपन से सीखी हुई और प्रैक्टिस करती हुई तरकारियों को भी यूट्यूब पर नये सिरे से बनाना सीख रही हैं।
वैसे सब्जी खरीदते समय वह इतना मोल भाव करती हैं कि मैं वहां से इधर उधर हो जाता हूं। एक दो सब्जी वाले तो श्रीमती जी को देखते ही हाथ जोड़ लेते हैं। बहनजी हमारे यहां के भाव आपको पटेंगे नहीं। वो फिर भी नहीं मानती। मैंने एक दिन समझाना चाहा कि मंहगाई बहुत बढ़ गयी है। इनका भी कुछ सोचो। दो पैसे कमा भी लेंगे तो दुआ देंगे। पर वो कहां मानने वाली हैं।
ये इंटरनैट और गूगल का ज्ञान जी का जंजाल बन गया है। महिलाओं के लिये बढ़िया 'टाइम-पास' है। फिर कुछ न कुछ काम का मिल भी जाता है। क्या आपने कभी इस बात की ओर ध्यान दिया है कि हमारे खान पान में मसालों की मात्रा कितनी बढ़ गयी है। देशी तो देशी - विदेशी भी खूब पैर जमा रहे हैं। हमारी बेटी को तो सिर्फ मसाले ही नहीं बर्तन भी विदेशी ढंग के पसंद हैं। कढ़ाई से मुंह सिकोड़ती है। कहती हैं पैन में ज्यादा अच्छा बनता है। पैन पहले नान स्टिक आते थे। अब उनके जमाने गये। अब कास्ट आयरन के बर्तन फैशन में हैं। लोहे के परम्परागत बर्तन मिट्टी मोल बेच दिये और अब ब्रेंडेड कास्ट आयरन खरीदते हैं। इनमें खाना बनाओ तो स्वास्थ्य के लिये बहुत फायदेमंद होता है।
पर मेरी समस्या का समाधान कैसे हो। क्या करूं कि मैडम के सिर से ये 'कुकरी' विशेषज्ञों का भूत उतरे। ऐसा नहीं है कि ये खाना मुझे पसंद नहीं है। है तो,पर रोज़ रोज़ नहीं! तिस पर पैसे की बरबादी। अब महीने भर में घर में मुश्किल से आठ दस बार ही सादा खाना बनता है। मैं यही सोच रहा था कि इस समस्या से छुटकारा कैसे मिले।
इतने में दरवाजे की घंटी टनटना गयी। देखा तो बिल्किंट ब्वाय खड़ा था। उसके हाथ से पार्सल ले कर रसोई में रख दिया। पहले मन में आया खोल कर देखूं क्या है। फिर लगा कहीं इसी बात पर श्रीमती जी का मूड खराब न हो जाये। इतने में फिर घंटी घनघनाई। फिर कुछ ऑनलाइन। एक घर खाना पहुंच सुविधा से बड़ी सी पैकिंग में कुछ आया था। क्या आपके घर भी दिन भर ऐसे ही ऑनलाइन सामान आता है। ऑनलाइन पेमेंट होता है जिसका कोई हिसाब नहीं। कभी हिसाब करके देखें 20 रु का हरा धनिया मंगवाने के 20 रु होम डिलीवरी के लेते हैं।....
बहुत विचार किया। फिर तय किया कि चुप रहो और प्याज लहसुन और अदरक के और अनेक तरह के मसालों से भरपूर भोजन करो। जो श्रीमती अंजना चतुर्वेदी खिलायें वो खायें। देखें कब तक चलता है। लेकिन भैया ये धीरज भी बड़ी कठिन चीज है। किसी का नाम हो तो बहुत अच्छा लगता है। पर खुद को धीरज रखना सिखाना बड़ी टेढ़ी खीर है। अपनी परीक्षा लेने लगे। लेकिन सब्र की भी इंतहा होती है। हैरान परेशान दिन बीतते गये।
एक शाम घर आया तो अंजना जी ने पूछा "किसी बात से परेशान हो। बताओ जी।"
मैं क्या कहता
" कह दिया नहीं कोई बात नहीं है।"
"कुछ तो है जो छुपा रहे हो। चुप चुप रहते हो।दफ्तर की कोई बात है। या घर परिवार की।"
मैंने खीझ कर कहा
" अरे नहीं भाई। कुछ नहीं है। तबीयत कुछ ढीली सी लग रही है। सोचता हूं डाक्टर मित्तल को दिखा दूं।"
"हां ये ठीक रहेगा। कल आप डाक्टर मित्तल के पास चले ही जाओ।"
सुबह आफिस के लिये निकलने लगा तो पत्नी ने फिर से डाक्टर मित्तल को दिखा कर आने की हिदायत दी।
शाम को घर में कदम रखा था कि "क्या कहा डाक्टर ने?"
"कुछ खास नहीं। मौसम बदल रहा है खाने पीने का थोड़ा ख्याल रखें।"
"अरे इतना ध्यान रखती हूं। कितना पौष्टिक खाना बनाती हूं। तुम मिलेट्स से कितना चिढ़ते थे। रागी के नाम पर मुंह बिचकाते थे। कोदो कुटकी का नाम लो तो कहते हमारे यहां जानवरों की सानी में मिलाया जाता था।"
" हां मैंने मित्तल साहब को बताया कि भोजन तो बहुत 'रिच' मिल रहा है। शायद मेरा पेट उसे सम्हाल नहीं पा रहा है।
सुनती हो कुछ तो सोचना पड़ेगा।"
अब मसालों में मिलिट्स जुड़ गये। मैंने अंजना जी को बताया डाक्टर ने खाने में फल-फूल की मात्रा बढ़ाने के लिये कहा है। दूसरे दिन से ऑनलाइन फल आने लगे। अमरूद, संतरा,आम,केला अंगूर। चलो कुछ तो बदला। पर प्याज, लहसुन और अदरक तो पीछे पड़े ही थे।
एक दिन मैंने तय कर लिया कि अब बहुत हो गया ये मामला समाप्त करना ही होगा। दिन भर उपाय सोचता रहा।घर आते ही घोषणा कर दी...
"सुन रही हो। मैंने अगले सोमवार से 15 दिन की छुट्टी की अर्जी डाल दी है। हम कहीं बाहर चलेंगे। तुम भी सोचो कहां जा सकते हैं जहां सुकून से छुट्टी बीते। तुम्हें भी रोज़ की घर गृहस्थी से आराम मिले। क्या कहती हो।"
"अरे ये तो बहुत बढ़िया रहेगा। बड़े भैया कब से अपने फार्म हाउस पर आने का निमंत्रण दे रहे हैं। आपको जमता ही नहीं। चलें वहां। अच्छा रहेगा।"
दूसरे दिन से बड़े भैया के यहां जाने की तैयारियां शुरू हो गयीं। नये सूटकेस की बड़ी पुरानी मांग पूरी करनी पड़ी। अंजना जी के कुछ नये कपड़े लत्ते और कुछ सामान उपहार देने खरीदा गया। खर्चा तो बहुत हो गया। मैंने ऐसा सोचा है कि भैया के यहां जाने के बाद वहां का माहौल देख कर उनसे बात करूंगा। श्रीमती जी बड़े भैया से थोड़ा डरती भी हैं या यूं कहिये उनका सम्मान करती हैं तो उनकी बात सुनेंगी।
फिलहाल कुछ राहत तो मिल ही जायेगी। फिर क्या होगा। क्योंकि हर समस्या का हल हमारे झुकने से होता है। बस वही होगा कि जो वो चाहेंगी। अब सोच सोच कर अपना जी हलाकान क्यों करें। भैया के यहां कुछ दिन आराम से गुजारें। और फिर वही लौट कर बुद्धू घर को आयें। अदरक लहसुन-प्याज खायें और साथ ही कोदो-कुटकी जैसे मिलेट्स भी - खुश रहें और प्रसन्न रहें।
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वर्षों आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग और केंद्र सरकार के अन्य संचार माध्यमों में कार्यरत रहने के बाद नन्दिता मिश्र अब स्वतंत्र लेखन करती हैं।