मन्ना - बोलचाल के कवि
नन्दिता मिश्र*
आज (29 मार्च) को हिन्दी के प्रतिष्ठित कवि भवानी प्रसाद मिश्र का जन्मदिवस है। इस अवसर पर हमें उनकी पुत्री नन्दिता मिश्र का एक लेख प्राप्त हुआ है जिसमें उन्होंने एक पाठक के नाते अपने पिता की कविताओं की पड़ताल की है।
"अभी दो मिनट पहले
जब मैं कविता लिखने नहीं बैठा था
तब कागज, कागज़ था
मैं, मैं था
और कलम, कलम
मगर जब लिखने बैठा,
तो तीनों नहीं रहे एक हो गये
किन्हीं तीन चीज़ों का
अलग-अलग तीन अस्तियों का
एक-एक करके इतनी आसानी से,
एक हो जाना,
अपने आप में करिश्मा है
बड़ी ही आसानी से होते हैं
कविता के बल पर करिश्में
और करिश्मा बड़ा अब कविता के सिवाय
किसी चीज से नहीं होगा"
ये पंक्तियां भवानी प्रसाद मिश्र की कविता से ली गयी हैं। क्या आपको लगता है कविता करिश्मा कर सकती है? ये क्या कोई छोटी-मोटी बात है कि कवि के सामने कागज, कलम और वो खुद किसी काम के नहीं थे। पर जैसे ही कलम हाथ में आई कागज पर लिखना शुरू किया बन गयी। मैंने मन्ना (आप सबके भवानी प्रसाद मिश्र, हम सब भाई-बहनों के मन्ना ही थे) को ज्यादा पढ़ा नहीं। शायद इसलिए कि वे मेरे पिता थे। मेरे लिए कवि नहीं थे। उन्नीस-बीस वर्ष की उम्र तक ये बात समझ में आ गयी कि मन्ना कोई आम कवि नहीं हैं कुछ बड़े कवि हैं। प्रसिद्ध हैं। इस बात का अहसास एक घटना से हुआ। एक दिन कॉलेज से लौटते वक्त एक बड़ा-सा पोस्टर दिखा — लाल किले पर होने वाले वार्षिक कवि सम्मेलन का विज्ञापन। पहली बार उस पोस्टर पर पिताजी का नाम और चित्र देखा। ठिठक गयी। घर आई तो पूछा हमें ले चलेंगे कवि सम्मेलन में। उन्होंने कहा, नहीं। "क्या करोगी वहां भीड़ में जा कर। मुझे तो जाना पड़ता है। कविता लिखता हूं तो पढ़ना भी पड़ता है, सुनाना भी पड़ता है। कवि हूं न।"
मुझे इस बात का सदा हैरानी होती रही कि ऐसी सरल और सीधी-सादी कविताएं लिख कर वे बहुत बड़े कवि माने गये। दर्शकों के बीच उनकी सबसे लोकप्रिय कविताओं में से एक है — ‘जी हां हुजूर मैं गीत बेचता हूं।’
वे खुद ‘गीत-फ़रोश’ को बड़े खास अंदाज से पढ़ते थे। एक गंभीर परिस्थिति में लिखी गयी पूरी कविता में व्यंग भरपूर है — पर वो हास्य मिश्रित है। ये कविता कठिन परिस्थितियों को सहजता से लेने की है। यदि कवि कमाने के लिए लिख रहा है अपनी जरूरत पूरी करने लिख भी रहा है तो क्या हुआ। वो इस बात को भी मजे में उड़ा रहा है। गीत-फरोश कविता के बारे में ये बात सच है कि आर्थिक तंगी में बहन की शादी की जिम्मेदारी पूरी करने के लिए उन्होंने कलकत्ता में बनी फिल्म स्वयंसिद्धा के गीत लिखे। पर उन्होंने ये खुद कभी नहीं कहा। वैसे तो इस वेब-पत्रिका के पाठकों ने गीत-फ़रोश बहुत बार सुनी-पढ़ी होगी किन्तु मैं इस कविता में अपनी प्रिय पंक्तियाँ बताने का लोभ संवरण नहीं कर पा रही। इन्हें देखिये:
“हैं हुजूर मैं गीत बेचता हूं। मैं तरह-तरह के, किसिम-किसिम के गीत बेचता हूं। इस कविता में वे कहते हैं — जी, पहले कुछ दिन शर्म लगी मुझको; पर बाद-बाद में अक्ल जमी मुझको। जी, लोगों ने तो बेच दिये ईमान। जी, आप न हो सुन कर ज्यादा हैरान — मैं सोच समझ कर आखिर अपने गीत बेचता हूं, जी हां हुजूर मैं गीत बेचता हूं, जी हां हुजूर मैं गीत बेचता हूं।“
कुछ लोगों ने उन्हें आशावादी कवि माना। कुछ ने प्रयोगवादी — पिताजी ने कभी भी खुद को किसी वाद का कवि नहीं माना। कोई लेखक या कवि उस समय प्रसिद्ध होता है जब वो आलोचकों की निगाह में आ जाता है — अज्ञेयजी के दूसरे सप्तक में उन्हें जब प्रमुखता से जगह मिली तब वो आलोचकों का विषय बन गये। दूसरे सप्तक से बना रिश्ता दिल्ली आने के बाद फिर ताजा हुआ। तब अज्ञेयजी का घर आना-जाना होता था। अज्ञेयजी कविताएं सुनते भी थे और खुद सुनाते भी थे।
पिताजी मानते थे कि व्यक्तिगत दुख जब गहरा जाता है तो उसका कविता पर गहरा असर होता है। इसी तरह व्यक्तिगत सुखों का भी मन पर और फिर कविता पर असर पड़ता है।
आशावादी, प्रयोगवादी माने जाने के बाद वे गांधीवादी कवि माने जाने लगे। पिताजी ने 1945 के पहले गांधी जी के दर्शन भी नहीं किये थे लेकिन बचपन से उनके विचारों से प्रभावित रहे। शिक्षा पूरी करके निकलते-निकलते तक वे उस रंग में रंग गये। 1942 के आंदोलन में जेल गये। जेल में तीन साल से ऊपर रहे। वहां बहुत बड़े-बड़े राजनीतिज्ञों से परिचय हुआ। पर सबसे ज्यादा साथ विनोबाजी का रहा। जेल में खूब समय मिलता था। वह कहते थे कि उन दिनों जितना पढ़ा-लिखा, बहुत करके उसके बाद फिर कभी उतना पढ़ा-लिखा नहीं। वे नागपुर जेल के अपने जीवन को अपना स्वर्णयुग मानते थे।
सन, 1945 में जेल से छूटने के बाद वे वर्धा चले गये और महिला आश्रम में शिक्षक हो गये। बापू तब सेवाग्राम में थे। पिताजी उनसे सिर्फ एक बार मिले और दो-तीन बार उनका सान्निध्य प्राप्त हुआ।
उनका पहला संग्रह ‘गीत फरोश’ सन् 1956 में प्रकाशित हुआ। तब वे हैदराबाद में कल्पना पत्रिका के संपादक थे। उन्होंने अनुवाद भी काफी किये। गीत फरोश के बाद लंबे समय तक कोई संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ। दिल्ली आने के बाद प्रकाशन का सिलसिला चला। चकित है दुख, बुनी हुई रस्सी, खुशबू के शिलालेख, व्यक्तिगत, परिवर्तन जिये, अंधेरी कविताएं और कुछ संग्रह भी प्रकाशित हुए। इमरजेंसी के दौरान वो रोज तीन कविताएं लिखते थे बाद में ये कविताएं त्रिकाल संध्या नाम के संग्रह में छपीं। उनका अंतिम काव्य संग्रह ‘नीली रेखा तक’ था। उनके चले जाने के बाद ‘तूस की आग’ का प्रकाशन हुआ।
आप किसी भी रचनाकार को किसी दायरे में बांध नहीं सकते। पिताजी जमीन से बहुत जुड़े हुए थे। प्रकृति प्रेमी थे। वर्षा उन्हें बहुत प्रिय थी। उनका कविता लिखने का ढंग सादा और सरल था। बोलचाल की भाषा में लिखते थे। भाषा के प्रति सदा सर्तक रहते थे। उनकी एक छोटी-सी कविता है —
मेरा और तुम्हारा
सारा फर्क
इतने में है
कि तुम लिखते हो
मैं बोलता हूं
और कितना फर्क हो जाता है इससे
तुम ढांकते हो मैं खोलता हूं
उन्होंने अपनी पहली कविता 11 वर्ष की उम्र में लिखी और फिर 72 वर्ष की उम्र तक लिखते चले गये। वे सदा करते थे व्यक्ति को कोई विधा साध लेनी चाहिए। किसी को कुछ नहीं आता ऐसा हो ही नहीं सकता। मुझे देखो मैं बहुत साधारण हूं। कुछ विशेष आता नहीं था। पर कविता साध ली और चलता चला गया।
कलम अपनी साध,
और मन की बात बिल्कुल ठीक कह एकाध।
यह कि तेरी भर न हो तो कह,
और बहते बने तो सादे ढंग से वह।
जिस तरह हम बोलते हैं उस तरह तू लिख,
और इसके बाद भी हमसे बड़ा तू दिख।
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वर्षों आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग और केंद्र सरकार के अन्य संचार माध्यमों में कार्य-रत रहने के बाद नन्दिता मिश्र अब स्वतंत्र लेखन करती हैं।
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