साहित्य

जब मशीन करती है प्रश्न - मनोज पांडे की कविता

मनोज पांडे मूलतः विज्ञान एवं शोध में रुचि रखने वाले अध्येता हैं जैसा कि इस वेब पत्रिका पर विज्ञान एवं स्वास्थ्य विषयक उनके लेख बताते हैं और या फिर कहें कि वह एक सफल 'कम्यूनिकेटर' हैं जो मुख्यत: उनका कैरियर रहा है और आजकल जिस तरह वह सोशल मीडिया पर काम कर रहे हैं (उनकी इस विषय पर दो पुस्तकें अमेज़न पर उपलब्ध हैं जिनका लिंक नीचे उनके परिचय में दिया गया है)। लेकिन क्या इस सबके साथ उनका एक संवदेनशील कवि मन  है जो समकालीन मुद्दों पर एक तरह से द्रवित हो जाता है और फिर एक कविता लिखता है। 

भाट न हों हम, बनें न चारण - माँ सरस्वती से प्रार्थना

इस वेबपत्रिका में कुछ ही माह पहले योगेन्द्र दत्त शर्मा की कविताएँ प्रकाशित हुईं थीं जो सभी खूब पसंद की गईं थी हालाँकि उनमें से भी "चक्र घूमेगा कभी" विशेष रूप से सराही गई थी. आज वसंत पंचमी और सरस्वती पूजन के अवसर पर हमें उनकी यह कविता प्राप्त हुई है जिसमें उन्होंने माँ सरस्वती से अद्भुत प्रार्थनाएं की हैं - ऐसी प्रार्थनाएं जो आज हर प्रबुद्ध  व्यक्ति की प्रार्थना हो सकती है.  

एक दूसरे से दूर : नन्दिता मिश्र की नई कहानी

नन्दिता मिश्र भावप्रवण कहानियां लिखती हैं। उनकी कहानियों में घटनाएं गति से घटती जाती हैं जैसे उन्हें बहुत सी बातें कहनी हों और समय कुछ कम हो! कभी-कभी लगता है कि उनकी कहानी में कई और कहानियों के भी सूत्र छिपे हैं जिनका इस्तेमाल वह नई कहानियां लिखने में करेंगी। यह कहानी काफी बरस पहले लिखी रह गई थी और तभी इस कहानी में कुछ पुराना फ्लेवर भी है जो पुराने चावल की तरह इस कहानी को महका रहा है। 

बच्चे भी अजीब होते हैं - राजेन्द्र भट्ट की कहानी

राजेन्द्र भट्ट हमारी वेब-पत्रिका पर नियमित लिखते रहे हैं। उनके लेखन का फलक व्यापक है - बानगी के लिए आप उनके नाम पर क्लिक करें तो उनके सभी लेख सामने आ जायेंगे। आज की उनकी रचना को उन्होंने 'कहानी' कहा है। है भी शायद ये कहानी ही लेकिन क्या विडम्बना है कि हमारे समाज की इतनी बड़ी सच्चाई, जिस पर उन्होंने मार्मिक टिप्पणी की है, वो कहानी ही है। याद आ रही है एक मशहूर पंक्ति जो शायद किसी ग़ज़ल का हिस्सा है - 'हक़ीक़त का अगर अफ़्साना बन जाए तो क्या कीजे'।

चक्र घूमेगा कभी - योगेंद्र दत्त शर्मा के चार गीत

हो सकता है कि पहली नज़र में योगेंद्र दत्त शर्मा के इन गीतों में आप निराशा के स्वर देखें लेकिन जल्द ही आपको अहसास हो जाएगा कि इनमें निराशा नहीं बल्कि क्षोभ है, दुःख है और साथ ही दूर कहीं एक टिमटिमाती आशा की लौ भी है. तभी तो महाभारत में कौरव सभा में द्रौपदी के चीर-हरण की कथा कहने के बाद वह ललकार कहते हैं कि "चक्र घूमेगा कभी तो......" और या फिर अगले गीत   'त्रासदी' में वह गाते सुनाई देते हैं, "दूर कहीं है क्षीण रोशनी टिकी हुई जिस पर निगाह है"

डिज़रिडू - संस्कृतियों के मिलन की एक मार्मिक प्रेम कथा

आप पायेंगे कि अनीता गोयल की नई कहानी एक अद्भुत प्रेम कथा है जिसमें कम से कम तीन संस्कृतियों का आपसी मिलन है ही. जर्मन मूल का बेन ऑस्ट्रेलियाई प्रान्त तस्मानिया की राजधानी होबार्ट में जन्मा और बड़ा हुआ है. उसके बचपन से ही कुला नाम की एक एब्रोजिन महिला (मूलनिवासिनी) बेन को बड़ा करने में उसकी माँ की सहायता करती है. बेन को वह मूलनिवासियों के बीच अत्यंत लोकप्रिय वाद्ययंत्र डिज़रिडू भेंट करती है. फिर भारतीय मूल की एक लड़की बेन के जीवन में आती है. इस मार्मिक कथा को आप नीचे शुरू करें. एक बार आरम्भ करेंगे तो एक सांस में पढ़ जायेंगे. 

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