सम्बन्ध की असंगति पर विमर्श
डॉ मधु कपूर के दार्शनिक विषयों पर लिखे जा रहे निबन्धों में रुचि ले रहे पाठकों को ध्यान होगा कि अपने पिछले निबंध से उन्होंने संबंधों पर श्रृंखला प्रारंभ की है। अपने इस पहले निबंध को समाप्त करते समय उन्होंने लिखा था कि सम्बन्धों के सहारे मानवीय संवेदनाएं ज़िंदा रहती हैं और यदि ऐसी मानसिक प्रवृत्ति न होती तो यह संसार केवल स्वतंत्र परमाणुओं का एक बिखरा हुआ स्तूप रह जाता। आज के अपने लेख में वह ब्रिटिश दार्शनिक एफ. एच. ब्रैडली और बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन द्वारा प्रतिपादित किये गए सिद्धांतों से हमारा परिचय कराती हैं। ये दोनों ही संबंधों का खंडन करते हैं लेकिन अलग-अलग कारणों से ! इस तरह संबंधों की यह बातें रुचिकर होती जा रही हैं।
सम्बन्ध की असंगति पर विमर्श
डॉ मधु कपूर
हम पिछले लेख में देख चुके हैं कि ‘सम्बन्ध’ के माध्यम से किसी भी पदार्थ को किसी अन्य पदार्थ से जोड़ कर उसके यथार्थ स्वरूप को जानने का प्रयास किया जाता है। जैसे कोई एक व्यक्ति किसी का पिता, किसी का भाई, किसी का पति, किसी संस्था का चेयरमैन, किसी देश का निवासी, किसी विशेष धर्म से आस्था रखने वाला इत्यादि बहु प्रकार के सम्बन्धों से बंधा होता है। कोई व्यक्ति अपने ही बेटे का गुरु बन कर जब शिक्षा देता है, तो उसका स्वभाव कठोर होता है, जबकि वही व्यक्ति पिता के रूप में बेटे से स्नेहपूर्ण व्यवहार करता है। लौकिक संसार में इन सम्बन्धों के बिना व्यक्ति परिचयहीन रह जाता है। पर यह भी एक त्रासदी है कि व्यक्ति के सभी सम्बन्धों को एक साथ समग्रता में ग्रहण करना संभव नहीं हो सकता है। अपनी सीमाओं को पहचानते हुए हम किसी व्यक्ति को टुकड़े टुकड़े संबंधों में ही बाँट कर जान सकते है। वैचारिक स्तर पर यदि मान भी लिया जाए कि कोई व्यक्ति सभी युक्त सम्बन्धों से मुक्त हो चुका है, तो प्रश्न उठता है कि उस व्यक्ति के अस्तित्व को कैसे परिभाषित किया जा सकता है ?
F.H. Bradley अपनी प्रसिद्ध पुस्तक Appearance and Reality में सम्बन्ध की असंगति को उजागर करते हुए उसकी स्वतंत्र सत्ता को चुनौती दी हैं। यद्यपि यह सत्य है कि सम्बन्ध और सम्बन्धी एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते हैं, लेकिन वे एक-दूसरे से कैसे सम्बंधित होते हैं यह प्रश्न लगातार हमें सोचने को बाध्य करता है। ऊपर के दृष्टान्त से स्पष्ट होता है कि एक व्यक्ति असंख्य रिश्तों से बंधा होता है, उसे किसी एक सम्बन्ध से जानकर उसके बारे में कोई सटीक निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता है। उदाहरण के लिए एक व्यक्ति महीने के पहले पखवाड़े में एक अच्छे चिकित्सक की, वहीँ दूसरे पखवाड़े में एक चोर या खूनी की, और अन्य किसी समय एक चित्रकार की भूमिका में देखा जाता है। ऐसे में उसके अखण्ड स्वरूप को जिसमें तीनों ही रूप शामिल हो — जानना असंभव हो उठता है। तथा किसी एक सम्बन्ध को ही समग्र समझ लेना अंतर्विरोध उत्पन्न कर देता हैं।
Bradley का मुख्य दावा यह है कि सम्बन्ध का कोई स्वतंत्र अस्तित्व नहीं होता है, वह केवल आभास मात्र हैं। वास्तव में समग्र दृष्टि सम्बन्ध-रहित ही होती है, जिसमें कोई विभाजन नहीं होता। Bradley न्याय दर्शन के उस तर्क की धज्जियाँ उड़ा देते हैं, जिसे 'अनवस्था दोष' के रूप में उपस्थित किया गया था। अर्थात मान लिया जाए दो वस्तुएँ 'क' और 'ख' के बीच एक सम्बन्ध है: 'स' (जैसे दोस्ती)। Bradley कहते हैं कि यदि 'स' को एक स्वतंत्र सत्ता मान लिया जाए तो यह सम्बन्ध 'स', 'क' और 'ख' से कैसे जुड़ता है? उसे 'क' से जुड़ने के लिए एक नया सम्बन्ध 'स१' चाहिए , और 'ख' से जुड़ने के लिए एक नया सम्बन्ध 'स2' चाहिए । अब 'स1' को 'क' और 'स' से जोड़ने के लिए एक और सम्बन्ध चाहिए और यह प्रक्रिया कभी समाप्त नहीं होती है। इस तरह हम एक अंतहीन दलदल में धंस जाते हैं। जो तत्व स्वयं को ही वस्तुओं से नहीं जोड़ पा रहा, वह दो वस्तुओं को आपस में कैसे जोड़ेगा? इसी आधार पर Bradley सम्बन्ध को विरोधाभास से युक्त मानकर उसे नकार देते हैं तथा तार्किक रूप से सम्बन्ध को असंभव करार देते हैं।
Bradley सम्बन्ध की बाह्यिक सत्ता अस्वीकार करते हैं। कोई भी सम्बन्ध वस्तु से बाहर नहीं रह सकता है, वह वस्तु के ‘अंतर्निहित’ ही रहता है । प्रश्न है कि यदि कोई व्यक्ति 'क' का भाई हैं, तो यह 'भाई होना' कोई बाहरी मैडल नहीं है, जो उस पर चिपका दिया गया है। यह सम्बन्ध उसके अस्तित्व, उसके परिवार और उसके पूरे व्यक्तित्व को परिभाषित करता है। ‘भाई होना’ यह दिखलाता है कि वह किससे जुड़ा है। इस तरह ब्रह्मांड की हर वस्तु दूसरी वस्तु से आंतरिक रूप से इतनी जुड़ी होती है कि उसे अलग करना संभव नहीं होता है। उनके अनुसार हम जिसे सम्बन्ध कहते हैं, वह असल में एक तार्किक भ्रान्ति है, जिसे हमारी बुद्धि जोड़ने की नाकाम कोशिश करती है। Bradley इस सम्बन्ध के पूरे ताने-बाने को ही ख़ारिज कर देते हैं। उनका मानना था कि वास्तविकता एक अखण्ड, विरोध-रहित पूर्णता है, जिसमें सभी वस्तुएँ आन्तरिक सम्बन्धों से जुड़ी रहती है। उदाहरण के लिए चिकित्सक जब किसी व्यक्ति को देखता है, तो उसके नाक, कान, हाथ-पैर आदि पृथक पृथक नहीं देखता है, बल्कि व्यक्ति को सम्पूर्ण रूप से देखने के बाद ही विशेष अंग की चिकित्सा करता है।
कुछ इसी तरह बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन भी सम्बन्धों को पारस्परिक निर्भरता और सापेक्षता के रूप में स्वीकार करते हैं। उनके इस सिद्धान्त को 'प्रतीत्यसमुत्पाद' कहा जाता है। कहने का तात्पर्य है कि विश्व की कोई भी वस्तु या तत्त्व अपने आप में स्वतंत्र या स्वयं से उत्पन्न नहीं होती है। वस्तुएँ एक-दूसरे पर निर्भर होकर (प्रतीत्य) उत्पन्न होती हैं। अर्थात इनका सम्बन्ध कारण-कार्य से कुछ इस तरह जुड़ा रहता है कि कारण की अनुपस्थिति में कार्य की उत्पत्ति नहीं हो सकती है। अन्य कुछ उदाहरण भी इसी प्रसंग में उल्लेख किये जा सकते हैं — जैसे 'लंबा' शब्द 'छोटे' के बिना निरर्थक है। ‘पिता’ शब्द का प्रयोग ‘संतान’ होने पर ही निर्भर करता है और संतान का होना पिता पर निर्भर करता है। दोनों में से कोई भी स्वतंत्र रूप से अस्तित्ववान नहीं हो सकते हैं।
नागार्जुन तर्क देते हैं कि यदि कोई वस्तु किसी अन्य वस्तु पर निर्भर नहीं करती है तो वह निरपेक्ष स्वभाव अथवा निस्वभाव कही जाती है, जिसे किसी सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं होती है। दूसरी ओर यदि कोई वस्तु पूरी तरह दूसरों पर ही निर्भर है, तो उसका अपना कोई पृथक अस्तित्व नहीं बचता है। इसलिए उनके अनुसार सम्बन्ध लौकिक व्यवहार के लिये यथार्थ जरूर है, लेकिन पारमार्थिक स्तर पर पहुँचकर 'शून्य' या सम्बन्ध रहित हो जाता है। सम्बन्ध के चतुष्कोटि रूप का खंडन करके नागार्जुन अपनी प्रसिद्ध कृति 'मध्यमककारिका' में तर्क और द्वंद्व (Dialectics) के माध्यम से सिद्ध करते हैं कि व्यवहारिक रूप से जो सम्बन्ध दिखाई देते हैं, तात्विक दृष्टि से उस सम्बन्ध की अवधारणा विरोधाभासी है। मानव बुद्धि सामान्यतः जिन चार प्रकार के तार्किक विकल्पों का सहारा लेता है, वे इस प्रकार है —
१. अस्ति: अर्थात यदि किसी वस्तु का अस्तित्व स्वतंत्र है, तो उसे किसी पर निर्भर रहने की आवश्यकता नहीं है (स्वतः) ।
२. नास्ति: अर्थात वस्तु किसी अन्य बाहरी वस्तु से यदि उत्पन्न होती है तो उनका आंतरिक सम्बन्ध नहीं बन पाएगा (परतः)।
३. अस्ति च नास्ति च: जब पहले दोनों विकल्प तार्किक रूप से खंडित हो चुके हैं, तो दोनों का मिलाजुला रूप भी तार्किक रूप से असंभव ही होगा।
४. नो अस्ति नो नास्ति च: अर्थात यदि कोई वस्तु बिना किसी कारण (अहेतुक) के उत्पन्न होती है, तो संसार में कोई भी वस्तु किसी भी कारण से उत्पन्न हो सकती है, किसी नियम की कोई आवश्यकता नहीं रह जाएगी।
चतुष्कोटि के इस चौतरफा तार्किक खंडन के माध्यम से नागार्जुन यह सिद्ध करते हैं कि वस्तुएँ पारमार्थिक दृष्टि से अन्ततः ‘निःस्वभाव' या शून्य होती है। सम्बन्ध केवल जागतिक व्यवहार के लिए ही आवश्यक है। तात्त्विक स्तर पर सम्बन्ध-रहित होने के कारण पदार्थ की सत्ता इस ओर संकेत करती है कि सभी सम्बन्धों से मुक्त स्थिति ‘शून्य’ होती है। नागार्जुन का तर्क है कि यदि दो वस्तुएँ पहले से ही स्वतंत्र हैं, तो उन्हें किसी सम्बन्ध की आवश्यकता नहीं है। यदि वे स्वतंत्र नहीं हैं, तो वे परनिर्भर है अर्थात उनका कोई स्वतंत्र अस्तित्व ही नहीं है, और जो अस्तित्व में नहीं है, उसके बीच सम्बन्ध कैसे हो सकता है?
पुनः Bradley के प्रसंग पर वापस आए, तो कहना पड़ेगा पदार्थ का सम्बन्ध-युक्त होना अनुभव विरोधी है, इसलिए वास्तविकता ऐसी होनी चाहिए जिसमें कोई भेद या सम्बन्ध न हो। वे इसे The Absolute (निरपेक्ष सत्ता) कहते हैं, जो एक सर्वांगीण आध्यात्मिक और तार्किक चेतना है। नागार्जुन सम्बन्धों का खंडन करके किसी निरपेक्ष सत्ता की स्थापना नहीं करते हैं। उनका अंतिम सत्य 'शून्यता' है, जिसका अर्थ है वस्तुओं का निःस्वभाव या स्वलक्षण होना। Bradley मानते हैं कि सभी आभास और सम्बन्ध अपने विरोधाभासों को खोकर निरपेक्ष सत्ता में किसी न किसी रूप में समाहित हो जाते हैं। नागार्जुन के अनुसार संवृति (व्यवहारिक सत्य) और परमार्थ (शून्यता) अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही वास्तविकता को देखने के दो नजरिए हैं।
Bradley सम्बन्धों का खंडन इसलिए करते हैं ताकि वे एक अखंड और पूर्ण सत्ता को सिद्ध कर सकें। इसके विपरीत, नागार्जुन सम्बन्धों का खंडन इसलिए करते हैं ताकि वे यह सिद्ध कर सकें कि किसी भी प्रकार की निःस्वभाव पूर्ण सत्ता अंततः ‘शून्यता’ को ही स्थापित करती है। जिसे रोज़मर्रा की जिंदगी के उदाहरणों से समझा जा सकता है। जैसे सिनेमा का परदा और उस पर चलने वाली फिल्में। परदे पर लड़ाई-झगड़े, प्यार मोहब्बत सब कुछ चलता रहता हैं, लेकिन असलियत में परदा पूरी तरह से साफ़ और शून्य (परमार्थ सत्य) होता है। जिस प्रकार निर्जन वन में यदि कोई व्यक्ति आवाज़ लगाता है, तो वह सिर्फ गूंज बन कर अपने में ही वापस लौट आती है।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। अभी हाल ही में उनकी पुस्तक "द्रष्टा दृश्य और दर्शन दर्शन - एक चौथे आयाम की खोज" प्रकाशित हुई है. इससे पहले भी उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance आ चुका है।