डॉ मधु कपूर के दार्शनिक विषयों पर लिखे जा रहे निबन्धों में रुचि ले रहे पाठकों को ध्यान होगा कि अपने पिछले निबंध से उन्होंने संबंधों पर श्रृंखला प्रारंभ की है. अपने इस पहले निबंध को समाप्त करते समय उन्होंने लिखा था कि सम्बन्धों के सहारे मानवीय संवेदनाएं ज़िंदा रहती हैं और यदि ऐसी मानसिक प्रवृत्ति न होती तो यह संसार केवल स्वतंत्र परमाणुओं का एक बिखरा हुआ स्तूप रह जाता। आज के अपने लेख में वह ब्रिटिश दार्शनिक एफ. एच. ब्रैडली और बौद्ध दार्शनिक नागार्जुन द्वारा प्रतिपादित किये गए सिद्धांतों से हमारा परिचय कराती हैं.











