पिछले लेख में विलियम जेम्स के एक नवस्नातक के कथन से हमें इस बात का आभास मिल चुका है कि हम ऐसे दो जगतों के बीच निवास करते हैं, जिनका आपस में कोई तालमेल नहीं होता है। इनमें से एक को हम जानते है, जो विज्ञान का जगत है, दूसरे को मानते है, जो ईश्वर, आत्मा की अमरता और जगत सृष्टि पर विश्वास का आधार है। Immanuel Kant, इस सदी के विख्यात जर्मन दार्शनिक, के ज्ञानमीमांसा की केंद्रीय धुरी इस ‘आभासिक जगत’ (Phenomenal World) और ‘वास्तव जगत’ (Noumenal World) के बीच चक्कर काटती है।











