बात निकली है तो दूर तलक जाएगी: जेन-ज़ी ने बदल दिया राजनीति का नैरेटिव
राजकेश्वर सिंह ने हाल ही में जब अपना पिछला लेख लिखा तो उसके बाद शिक्षा मंत्री का इस्तीफ़ा भी आ गया और इसके अलावा उन्हें जैसे महसूस हुआ कि जैसे उन्हें अपने पिछले लेख में कुछ जोड़ना भी था. आज के लेख में वह बता रहे हैं कि अब यह प्रक्रिया जो चल निकली है, वह रुकने वाली नहीं है बल्कि जेन-ज़ी से जुड़े मुद्दों पर सवाल और जवाब का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा।
बात निकली है तो दूर तलक जाएगी
जेन-ज़ी ने बदल दिया राजनीति का नैरेटिव
राजकेश्वर सिंह
न हिंदू-मुसलमान का कोई सवाल और न अगड़े-पिछड़े और दलित का! मुद्दा सिर्फ युवाओं का था। दिल्ली के जंतर-मंतर पर वे देशभर से अपने खुद के खर्चे पर पहुंचे युवा थे, जहां भारी उमस, गर्मी और बरसात के बीच खुले आसमान के नीचे उन्हें सोना और रहना था। भारतीय राजनीति में यह अपने तरीके की इकलौती और अप्रत्याशित घटना थी। अप्रत्याशित इसलिए, क्योंकि बड़े-बड़े राजनीतिक पंडित और पत्रकारिता के माहिर लोग भी युवाओं के आंदोलन के उबाल को समझने में फेल हो गये। वे भी कुछ नहीं समझ पाये जिन्होंने पूरी उम्र राजनीति के दांव-पेंच में गुजारी है। किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि तंज़िया लहजे में अकस्मात बनी एक गैर-राजनीतिक पार्टी अपने गठन के महज 71 दिनों के भीतर केंद्र की मोदी सरकार के चहेते केंद्रीय शिक्षा मंत्री को इस्तीफा देने को मजबूर कर देगी। वह भी तब, जब देश की मुख्यधारा का मीडिया (प्रिंट व इलेक्ट्रानिक) उसके खिलाफ हो।
देश के युवा (जेन-ज़ी) केंद्र सरकार और पूरे सरकारी सिस्टम को किस तरह देखते हैं? सीजेपी के आंदोलन सही तस्वीर देश के सामने रख दी। युवाओं का आंदोलन होने के बाद भी उसकी खूबसूरती यह रही कि वह उनकी तरफ से शांतिपूर्ण रहा। पहली बार देश में युवाओं ने डिजिटल आधारित किसी आंदोलन की शुरुआत और फिर उसे जमीन पर उतार दिया। सिर्फ सोशल मीडिया के सहारे ही यह आंदोलन पूरे देश में उठ खड़ा हुआ। सीजेपी ने प्रधान के इस्तीफे के साथ ही सरकार से यह भरोसा भी लिया है कि देशभर में इस आंदोलन में शामिल किसी प्रदर्शनकारी के खिलाफ दर्ज मुकदमों कोई कार्रवाई नहीं होगी। नीट के जो परीक्षार्थी आत्महत्या के शिकार हुए हैं, उनके परिजनों को मुआबजा भी मिलेगा।
इतना ही नहीं, महीने भर के बाद वे सरकार फिर वार्ता करेंगे कि शिक्षा में सुधार के लिए उन्होंने जो पांच सूत्रीय चार्टर दिया है, सरकार ने उस पर अब तक क्या किया ? मतलब साफ है कि जेन-ज़ी से जुड़े मुद्दों पर सवाल और जवाब का सिलसिला आगे भी जारी रहेगा। इस बीच, सीजेपी के प्रवक्ता ने मीडिया से यह भी कहा है कि छात्रों और शिक्षा के सवाल पर वे राज्यों में जाकर मामलों को उठाएंगे और इस कदम में इससे फर्क नहीं पड़ेगा कि किस राज्य में किस पार्टी की सरकार है। इतना ही नहीं उन्होंने यह भी कहा कि हम CJP को ग्रासरूट लेवल पर ले जायेंगे और उन्हें राजनीति से कोई परहेज़ नहीं है, अच्छे लोगों की राजनीति में ज़रूरत भी है.
संदेश साफ है कि परंपरागत ढंग से राजनीति के आदी बन चुके सभी राजनीतिक दल अपने ही देश के युवाओं (जेन-ज़ी), जिनकी आबादी लगभग 42 करोड़ है, को समझ पाने में असफल हैं। इसमें जेन अल्फा को भी जोड़ दें तो यह संख्या लगभग 70 करोड़ हो जाती है। दिल्ली के जंतर मंतर पर कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) की अगुवाई में छात्रों और युवाओं का धरना-प्रदर्शन सिर्फ 37 दिन चला और केंद्र की वह मोदी सरकार घुटने पर आ गई, जिसके सामने देशभर के विपक्षी दल बीते 12 वर्षों से असहाय साबित हो रहे हों। मोदी सरकार ने अपने कार्यकाल में अब तक कई बार यह प्रमाण दिया है कि वह अपनी मनमानी से हर वह काम करने में सफल है, जो वह करना चाहती रही हो। तो सवाल यह कि फिर वह कॉकरोच जनता पार्टी की ताकत का आंकलन क्यों नहीं कर पाई?
सीजेपी प्रमुख अभिजीत दीपके, उनकी टीम और उनके आंदोलन की चाल-ढाल समझने में सरकार की विफलता का जवाब तलाशें तो यह साफ लगता है कि सरकार ने मान लिया था कि अमेरिका में रहकर बोस्टन यूनिवर्सिटी से जनसंपर्क में स्नात्तकोत्तर डिग्री लेने वाले भारतीय मूल के अभिजीत दिपके ने सीजेपी का गठन भले ही कर लिया हो और महज कुछ ही दिनों में इंस्टाग्राम पर उसके तीन करोड़ से अधिक फालोवर्स भले ही हो गये हों, लेकिन अगर दिल्ली आकर वह आंदोलन करता भी है तो उसके साथ कौन जाएगा? सरकार को शायद यह भी लगा हो कि हफ्ते-दस दिन में आंदोलन फेल होकर खुद ही खत्म हो जाएगा, वरना सरकार अभिजीत को जंतर मंतर पर प्रदर्शन की इजाजत ही क्यों देती? जाहिर है, इजाजत देते समय सरकार के पास उसकी खुफिया एजेंसियों के भी इनपुट रहे ही होंगे।
दरअसल, सरकार और उसकी सभी एजेंसियों को इसका अंदाजा ही नहीं है कि जमीन पर, खासकर देश के युवाओं के मन में क्या चल रहा है? शायद उसे यह भी पता नहीं कि देश का युवा हिंदू-मुसलमान, भारत-पाकिस्तान व अगड़े और पिछड़े के नैरेटिव (विमर्श) से बहुत आगे निकल गया है। उसके सामने अपने मुद्दे हैं। पढ़ाई और कैरियर का सवाल है। वह पूरी तरह से डिजिटल ही नहीं, बल्कि देश-दुनिया के मौजूदा बदलावों पर अपडेट भी है। वह महज़ चुनावी जीत के लिए अपनाए जाने वाले हथकंडों से आजिज़ आ चुका है। प्रतियोगी परीक्षाओं के बार-बार पर्चे लीक होना उसे परेशान करता है, इसीलिए उसने नीट पेपर लीक और उसके चलते 20 से अधिक अभ्यर्थियों की आत्महत्या के मामले में न सिर्फ केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग लिया, बल्कि उसे लेकर ही माना।
दिल्ली पुलिस की सोनम वांगचुक के साथ 18 जुलाई को जबर्दस्ती और 20 जुलाई को प्रदर्शनकारियों के संसद तक मार्च के दौरान पुलिस के बर्बर लाठीचार्ज के बाद जिस तरह देशभर से छात्र-छात्राओं और युवाओं ने खुद के खर्चे से जंतर मंतर पहुंचना शुरू किया, वह इस बात के संकेत है कि सरकार और युवाओं में ‘डिसकनेक्ट’ है। सरकार ने जंतर मंतर के आसपास के 16 मेट्रो स्टेशन बंद कर दिये, फिर भी जंतर मंतर पर जहां तेज गर्मी, धूप, बरसात के बीच सोने रहने की समुचित व्यवस्था नहीं, वहां युवक-युवतियां ही नहीं, तमाम संकट झेलकर उनके माता-पिता भी पहुंच रहे थे। अंदाजा लगा सकते हैं, वहां क्या चल रहा था! एक वीडियो में मुंबई से आए एक दंपति ने बयां कि उनका बेटा विदेश में है। वह इस आंदोलन में नहीं पहुंच पा रहा और यहां प्रदर्शनकारियों को मारा पीटा जा रहा है, लिहाजा बेटे ने भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए यहां भेजा है।
प्रदर्शन स्थल पर साफ-सफाई से लेकर खाना-पीना और दवाई तक की व्यवस्था प्रदर्शनकारियों ने खुद संभाल रखी थी। देखा जाए तो इस आंदोलन का पूरा मोर्चा यू-ट्युबर्ज़ ने संभाला, जबकि देश की मुख्याधारा का मीडिया आंदोलन को कमजोर करने की नाकाम कोशिश में लगा रहा। प्रदर्शनकारियों को विदेशी फंडिंग से जुड़ा होने और आतंकी जैसा बताने का भी प्रयास किया गया। इस आंदोलन का यह भी सबक है कि यदि कोई वाजिब मुद्दा है और जनसमर्थन हासिल है तो मुख्यधारा की मीडिया के बिना भी वह लड़ाई जीती जा सकती है।
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लेखक राजनीतिक विश्लेषक व वरिष्ठ पत्रकार हैं। उन्होंने लंबे अर्से तक राष्ट्रीय राजनीति और संसदीय रिपोर्टिंग की है। लगभग चार दशक की पत्रकारिता में उत्तर प्रदेश की राजनीति को उन्होंने प्रमुखता से कवर किया है। वह नियमित रूप से रागदिल्ली.कॉम के लिए लिखते रहते हैं।