वो संकरी गलियां जहां लम्बे अरसे से चहल-पहल रही है, रौनक रही है, हैरानी है आज वहाँ क्यूं इतना सन्नाटा छाया है, जैसे दिन में ही अंधेरा हो। या क्या हो गया हमारे जीवंत मोहल्लों को या यूं कहें कि हमारे समाज को? यहाँ ऐसी कैसी खामोशी है - सब तरफ जैसे एक डरावनी चुप्पी पसरी है...









