कैसे ढूंढें अंतिम सत्य - बातों से बैल नहीं बंधते
इस लेख के विषय यदि सम्पादकीय टिप्पणी लिखने का प्रयास किया तो उसमें कुछ खतरे निहित हैं। उसमें पहला तो यही है कि अच्छी सी सम्पादकीय टिप्पणी लिखने के प्रयास में कहीं इस लेख को पत्रिका में 'अपलोड' करने में देरी ना होती जाए। दूसरा बड़ा खतरा यह है ही कि कुछ ऐसा भी हो सकता है कि हम कुछ और ही समझें हों और दार्शनिक असल में कुछ और ही कहना चाह रहे हों। इसलिए हमें यही सेफ लग रहा है कि अपन सब इस लेख को अपने-अपने हिसाब से पढ़ें और फिर अपने हिसाब से ही पढ़े को गुनें और उसका अर्थ निकालें। वैसे भी यह कहाँ ज़रूरी है कि सभी पाठक एक ही अर्थ निकालें - अलग अलग भी तो निकाल सकते हैं बल्कि उसी की ज्यादा सम्भावना है! बात थोड़ी उलझ रही है ना? जानते हैं क्यों? लेख पूरा पढ़िए तो (शायद ) उत्तर मिल जाए।
कैसे ढूंढें अंतिम सत्य - बातों से बैल नहीं बंधते
डॉ मधु कपूर
‘बातों से बैल नहीं बंधते’ यह कहावत ग्रामीण जीवन से ली गई है। एक बुज़ुर्ग किसान अपने बेटे से कहता है: “बेटा, तू रोज़ कहता है कि खेत में पानी देगा, खाद डालेगा, लेकिन अब तक कुछ किया नहीं। बातों से बैल नहीं बंधते—हाथ गंदे करने पड़ते हैं”। अर्थात बैल को बाँधने, खेत जोतने के लिए वास्तविक श्रम और क्रिया की आवश्यकता होती है।
रोबर्ट ब्रैन्डम (Robert Brandom) की प्रसिद्ध पुस्तक Between Saying and Doing: Towards an Analytic Pragmatism गहराई से सोचने के लिए विवश करती है कि व्यवहारिक जीवन और तात्त्विक विश्लेषणात्मक पद्धति के साथ कैसे संतुलन स्थापित किया जाए। उनके अनुसार किसी भी शब्द का कोषीय अर्थ जान लेना पर्याप्त नहीं होता है, उसका प्रयोग उस समाज में कैसे होता है, यह भी जानना अनिवार्य होता है। अर्थ की दृष्टि से ‘कहना’ (saying) और ‘करना’ (doing) दो अलग-अलग क्रिया-पद होने पर भी इनका प्रयोग युग्म रूप से होता है।
यह कहना काफ़ी नहीं है कि ‘अमुक व्यक्ति ने आज मुझे रास्ते में मारने की कोशिश की’। व्यक्ति को इसके समर्थन में कुछ सबूत भी पेश करने पड़ते हैं। अर्थात किसी कथन को प्रमाणित करने के लिए उसे कैसे कहा जाए यह भी बहुत जरूरी होता है। जिस तरह अगर कोई कहे—'कल बारिश होगी'—तो इसका अर्थ केवल मौसम की भविष्यवाणी नहीं है, बल्कि उस व्यक्ति की प्रतिबद्धता को भी दर्शाता है कि यदि कल बारिश नहीं हुई, तो उसका कथन गलत सिद्ध होगा। इसलिए ब्रैन्डम तार्किक नियमों और मानदंडों के अनुसार यह बतलाने का प्रयास करते हैं कि समझना या जानना ज्ञान की परिधि में तो आता है, पर यह अंतिम सत्य नहीं है। ज्ञान का अर्थ तभी सार्थक हो सकता है जब उसमें क्रिया-संपादन की क्षमता हो—अर्थात वह किसी कार्य को करने में समर्थ हो। ज्ञान की सत्यता उसकी उपयोगिता और सफलता पर निर्भर करती है।
जिस तरह ‘तैरा कैसे जाता है’ यह जानने के लिए तैरना आवश्यक है। संगीत, नृत्य, रंगमंच खेलकूद, इत्यादि सभी कलाओं की सफलता उनकी क्रियात्मक अभिव्यक्ति पर निर्भर करती है। तात्पर्य है कि इन्हें ‘कैसे किया जाए’ कथन पर जोर दिया जाता है। एक युवा अपने दादाजी से कहता है, "चलो, खाना खाओ।" इसका शाब्दिक अर्थ खाना खाने के लिए एक सीधा आदेश है। किन्तु सामाजिक रीति कहती है कि इस संदर्भ में ‘आप खाना खा लीजिए’ कहना अधिक उचित है। कथन में शिष्टाचार का अभाव दिखता है।
एक छात्र अपने शिक्षक से पूछता है, ‘क्या मैं अंदर आ सकता हूँ?’ शिक्षक को छात्र की बात का निहितार्थ समझने के लिए व्यावहारिक ज्ञान का उपयोग करना पड़ता है कि छात्र केवल प्रवेश करने की अनुमति नहीं मांग रहा बल्कि अपने आने की सूचना भी दे रहा है। एक मित्र दूसरे मित्र से कहता है (जिसने बहुत देर से कोई काम पूरा किया हो ), ‘वाह! तुमने तो बहुत जल्दी कर लिया’ —यहाँ शाब्दिक अर्थ प्रासंगिक नहीं है, क्योंकि आशय व्यंग्य है। सामाजिक प्राणी होने के नाते मनुष्य का अनुभव शून्य में नहीं विकसित होता, बल्कि सामाजिक मानदंड, संदर्भ और व्यावहारिक क्षमता, विश्वास उसके ज्ञान को समृद्ध करते हैं।
इस तरह ज्ञान केवल सूचना या तथ्यों का संग्रह न होकर उसके अतिरिक्त कुछ कहने का प्रयास करता है। उदाहरण के लिए क्या हम जानते है कि पृथ्वी गोल है? वास्तव में यदि देखा जाए तो हम वैज्ञानिकों के तर्कसंगत आधार पर विश्वास करते हैं कि पृथ्वी गोल है। अंतर सिर्फ इतना है कि हमारा यह तथाकथित ज्ञान कोरा विश्वास है, जो निश्चित ज्ञान की एक आवश्यक शर्त है। फिर भी हर विश्वास ज्ञान नहीं होता है। किसी व्यक्ति का यह विश्वास कि कल वह मैराथन दौड़ेगा, तब तक निश्चित ज्ञान नहीं हो सकता है, जब तक वह कल दौड़ न ले। हो सकता है अस्वस्थ होने के कारण वह दौड़ ही न पाए। स्कूल में हमें बताया गया था कि क्रिस्टोफर कोलंबस ने १४९२ में अमेरिका की खोज की थी, हमने इस जानकारी पर विश्वास कर लिया। कंप्यूटर आदि के माध्यम से हम अपना काम आसानी से कर लेते हैं, लेकिन उनकी अंदरूनी प्रक्रिया यथा चिप्स और इलेक्ट्रॉनों के स्तर की हमें कोई समझ नहीं होती है। हम सिर्फ यह स्वीकार कर लेते हैं कि यह ‘वह करने में सक्षम है जो हम चाहते हैं’।
प्रश्न उठता है कि पूर्णतः निश्चित ज्ञान पाने के लिए क्या करना चाहिए? आधुनिक युग में प्रसिद्ध दार्शनिक देकार्त ने पूछा: क्या कोई ऐसा ज्ञान है जो इन सभी भ्रमों से परे हो? चूँकि इंद्रियाँ हमें सटीक ज्ञान नहीं देती हैं—दूर की वस्तुएँ बड़ी होने पर भी छोटी दिखती हैं, सपनों में असंभव घटनाएँ घटती दिखाई देती हैं, जिससे सही और गलत में भेद करना असंभव हो जाता है। वे केवल Cogito Ergo Sum अर्थात ‘मैं सोचता हूँ, इसलिए मैं हूँ’ को निश्चित ज्ञान स्वीकार करते है, जो संदेह से परे है —इसे न तो इंद्रियाँ झुठला सकती हैं और न ही कोई तर्क। क्योंकि यदि हम इसे संदेह करते है तब भी संदेहकर्ता का अस्तित्व बना रहता है। देकार्ते का मानना है कि ज्ञान की बुनियाद निश्चित गाणितिक पद्धति का प्रतिरूप होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति अपर्याप्त प्रमाण के आधार पर विश्वास करता है, तो उसे दोषी कहा जाना चाहिए। इस तरह ज्ञान और नैतिकता की सार्थकता व्यवहार में है। केवल विचार या कथन पर्याप्त नहीं है, क्रिया ही अंतिम कसौटी है। यह दृष्टिकोण ज्ञान को कर्तव्य के परिप्रेक्ष्य में देखता है, न कि केवल सूचना-संग्रह की तरह। पर सवाल वहीँ ठहर जाता है क्या हम कभी पूर्णतः निश्चित ज्ञान प्राप्त कर सकते है?
अपनी जिज्ञासा को शान्त करने के लिए विज्ञान विभिन्न प्रकार के परीक्षण-निरीक्षण और तर्क प्रस्तुत करता है, पर इसके बावजूद मिथ्या की सम्भावना बनी ही रह जाती है। जैसा कि कार्ल पॉपर कहते है कि प्रामाणिक ज्ञान भी भविष्य में किसी नए दृष्टान्त के द्वारा मिथ्या सिद्ध किया जा सकता है। पूर्व न्यायाधीश एक किस्सा बयान करते है कि समस्त सुनवाई और तर्क समाप्त हो जाने के पश्चात एक सामान्य और युवा वकील की गुजारिश पर उन्होंने उसे बोलने का मौका दिया और उसके पंद्रह मिनट के वक्तव्य ने केस का फैसला ही पलट दिया। हालाँकि, संदेह की गुंजाईश बनी ही रह सकती है।
कहा जा सकता है सत्य को पा लेना इतना सहज नहीं है, जैसा कि समझा जाता है। विज्ञान का इतिहास उठाकर यदि हम एक तटस्थ अध्ययन करे तो प्रति पृष्ठ पर वहाँ बदलते हुए निर्णय पाए जाते है। ग्रह-नक्षत्रों की गति, स्थिति और स्वरूप के विषय में टोलमी का सिद्धांत कोपरनिकस के द्वारा गलत साबित किया गया और कोपरनिकस के निर्णयों पर आईंसटीन का सापेक्षवाद एक नया रूप लेकर आ धमका। आइन्स्टीन का निर्णय भी अंतिम नहीं रहा। निश्चयता की जगह संभावना ने ले ली और वैज्ञानिकों की एकतरफा सोच में बदलाव आया। विज्ञान अब यह नहीं बतलाता कि ‘क्या है’ बल्कि यह सिखाता है ‘कैसे सोचा जाए’। यह संकेत करता है कि बीसवीं सदी का सबसे बड़ा आविष्कार कोई यंत्र नहीं, बल्कि वह बदली हुई दृष्टि है जिसमें वस्तुएँ वैसी नहीं हैं जैसी वे पहले प्रतीत होती थीं।
डेकार्ट के प्रसिद्ध और प्रभावशाली दृष्टिकोण—के विपरीत, संदेह को केवल शब्दों के ज़रिए कृत्रिम रूप से उत्पन्न नहीं किया जा सकता ताकि वह सार्थक सत्य को पैदा कर सके। संदेह, ठीक विश्वास की तरह, औचित्य की माँग करता है। सच्चा संदेह असहज करता है और बाधा उत्पन्न करता है। विश्वास वह धरातल है जो पैरों के नीचे जमीन को मजबूत करता है। व्यावहारिक ज्ञान कभी भी दीर्घकालिक या अल्पकालिक रूप से निश्चित नहीं हो सकता है। दृष्टान्तस्वरूप माँ अपने बेटे से पूछती है, "तुम्हारी पढ़ाई कैसी चल रही है?" बेटा जवाब देता है, "ठीक-ठाक।" बेटे की आवाज़ में हिचकिचाहट सुनकर माँ अपने व्यवहारिक ज्ञान का उपयोग करके समझ जाती है कि सब कुछ उतना अच्छा नहीं है जितना बेटा कह रहा है। व्यवहारिक ज्ञान (Pragmatism) एक दार्शनिक परंपरा है, जिसका तर्क है कि आदर्शवादी और यथार्थवादी दर्शन मानव ज्ञान को विज्ञान की पहुँच से परे कर देता हैं। ज्ञाता और ज्ञेय (knower and known) के बीच संबंध को समझने नहीं देता है। इस तरह माँ की समझ यहाँ उपयोगी साबित होती है, यद्यपि यह तथ्यों के अनुरूप नहीं है पर सत्य है।
इस प्रसंग में विलियम जेम्स, प्रसिद्ध दार्शनिक का एक रोचक उदाहरण देकर इस लेख को समाप्त करना चाहूंगी—
“एक नवस्नातक ने कहना शुरू किया कि उसने हमेशा यह मान लिया था कि जब आप एक दार्शनिक कक्षा में प्रवेश करते हैं, तो आपको उस ब्रह्मांड से संबंध स्थापित करने पड़ता हैं जो हमारी पहचानी हुई दुनिया से पूरी तरह भिन्न होता है, जिसे अभी आप पीछे छोड़ आए हैं। उसने कहा कि दोनों का आपस में इतना कम संबंध होता है कि आप एक ही समय में दोनों के बारे में सोच भी नहीं सकते । एक ओर ठोस व्यक्तिगत अनुभवों की दुनिया है—कल्पना से परे बहुआयामी, उलझी हुई, कीचड़ भरी, पीड़ादायक और भ्रमित करने वाली और दूसरी ओर वह दुनिया जिसमें आपका दर्शनशास्त्र का प्रोफेसर आपको प्रवेश कराता है—जो सरल, स्वच्छ और उदात्त है... वास्तविक जीवन के विरोधाभास उसमें अनुपस्थित हैं ... वास्तव में वह इस वास्तविक दुनिया का वर्णन कम करता है, उस पर एक स्पष्ट सुन्दर संरचना अधिक करता है ... वह हमारे ठोस ब्रह्मांड की कोई व्याख्या नहीं दे सकता है”।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।