इच्छा की स्वतंत्रता और नियति की पारदर्शिता
डॉ मधु कपूर के दार्शनिक निबंधों की श्रृंखला में इस बार चर्चा का विषय है डच दार्शनिक बेनडिक्ट स्पिनोज़ा (Benedict de Spinoza) द्वारा उनके ग्रन्थ एथिक्स में प्रतिपादित सिद्धांत जिसके अनुसार ब्रह्माण्ड मनमर्जी से नहीं, बल्कि बुद्धिगम्य नियमों के द्वारा संचालित होता है। डॉ मधु कपूर का पिछला लेख वर्तमान लेख के साथ एक महीन धागें से बंधा है। ‘इसमें और उसमें’ कठपुतली का प्रसंग, नियति के चक्र में फंस कर, एक सांस्कृतिक मंच पर दार्शनिक परिप्रेक्ष्य में उपस्थित हो गया, जिसमें वह न तो बंधी होती है, न ही पूरी तरह स्वतंत्र—वह केवल खेलती है अनभिज्ञ अदृश्य धागों से.