सुन्दर ही सत्य:सत्य ही सुन्दर - सौन्दर्यशास्त्र शृंखला का तीसरा लेख
सौंदर्यशास्त्र का तीसरा लेख सुंदर ही सत्य और सत्य ही सुंदर इस बात की जांच करता है कि 'सत्य' एवं 'सौन्दर्य' के बीच तालमेल कैसे किया जाए। प्रश्न यह भी है कि रसानुभूति का सत्य के साथ समायोजन कैसे किया जाए? फिर विज्ञान से जुड़े प्रश्न भी तो हैं। आइए, इन सभी प्रश्नों पर आप भी विचार कीजिए।
सुन्दर ही सत्य,सत्य ही सुन्दर
डॉ मधु कपूर
यह अंतर सदियों से चला आ रहा है कि विज्ञान सत्य की खोज करता है और कला सौंदर्य की। Ode on a Grecian Urn कविता में जॉन कीट्स का "Beauty is truth, truth beauty" यह वाक्यांश सौंदर्य और सत्य की अवधारणाओं के बीच एक गहरे सम्बन्ध को पुष्ट करता है। इसलिए कभी-कभी यह बहस का विषय बन जाता है कि ‘सत्य’ एवं ‘सौंदर्य’ का तालमेल कैसे किया जाय? सत्य कई बार अप्रिय और कड़वा होता है, तथा किसी एक की नज़र में जो वस्तु कुरूप होती है, अन्य की नज़र में वह खूबसूरत हो जाती है। यूँ तो सौन्दर्य का आकर्षण मनुष्य को उतना ही खींचता है, जितना सत्य का सन्धान। यह अलग बात है कि अक्सर हम स्वार्थ के वशीभूत होकर सत्य को अनदेखा कर जाते है।
सत्य शब्द की उत्पत्ति संस्कृत सत् शब्द से हुई है जिसका अर्थ होता है अस्तित्व का होना, अर्थात किसी कथन को सत्य तभी कहा जा सकता है, जब वास्तव जगत में हूबहू घटना घटी हो। उदाहरण के लिये ‘घास हरी है’ यह वाक्य सत्य है क्योंकि हमारी दुनिया में घास हरी होती है। एक कैंची का अस्तित्व सत है यदि वह काटने में समर्थ है। एक पेड़ सत है यदि वह फल फूल देता है। वैज्ञानिक सत्य अक्सर ठंडे और कठोर कहे जाते हैं, क्योंकि वे प्रयोग गणितीय-सापेक्ष होते है, जैसे सापेक्षता का सिद्धांत, गुरुत्वाकर्षण, क्वांटम का सिद्धांत, इत्यादि। पर इतिहास ऐसी घटनाओं से भी पटा पड़ा है, जब सत्य भाषण के लिए गैलिलियो को सजा और सुकरात को मृत्युदंड भी झेलना पड़ा।
कितनी दिलचस्प बात है कि आज तक किसी को गंभीरता से यह कहते हुए नहीं सुना गया कि इन्द्रधनुष, सूर्यास्त या अपनी माँ का चेहरा सुन्दर नहीं हैं। हम पहले भी देख चुके हैं कि रसानुभूति न तो यथार्थ होती है और न ही भ्रम होती है। फिर इसका सत्य से समायोजन कैसे किया जा सकता है? कला के खातिर एम.एफ. हुसैन को देश निकाला तक दे दिया गया था। सलमान रश्दी की तो हत्या की कोशिश की गई थी। प्लेटो तो काव्य की वैधता ही अस्वीकर कर देते है, क्योंकि काव्य की लच्छेदार और पेंचीदी भाषा न केवल धोखे में डालती है, बल्कि काव्य को सत्य से भी दूर कर देती है। उनके अनुसार कला यदि वास्तव पदार्थ की नक़ल मात्र है तो ऐसी कला का क्या मूल्य?
विज्ञान की प्रवृत्ति व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठकर सत्य का सन्धान करना है। इसलिए तथाकथित वैज्ञानिक ज्ञान निरपेक्ष कहे जाते है। विज्ञान की तरह कला के भावपक्ष में जिस आनंद और आस्वाद का अनुरणन होता है, वहाँ भी एक तटस्थभाव मौजूद रहता है, जो उसे भोग की अपेक्षा उदात्तता की भूमि पर ले जाता है। गुस्सा होने के पश्चात् यह कहना कि ㄧ‘मैं जानता हूँ कि मैं उस समय गुस्से में था’, इस अनुभूति में सत्य का बोध हो जाता है। कला का रसबोध इस तरह सत्य की उपेक्षा नहीं करता है। प्रेमभाव की अनुभूति होने के पश्चात ही कलाकार उसे मार्मिक चित्रों में या कविता में अभिव्यक्त करने में सक्षम होता है। इस तरह कवि-कल्पना लौकिक जीवन का ही पुनर्गठन होता है, जो सत्य से अलग नहीं होता है। इस तरह कला को भी ज्ञान की साधना कहा जा सकता है। जब तक रचनाकार अपने सुख दुःख में जकड़ा रहता है, वह सृजन नहीं कर सकता है। इस सन्दर्भ में शंकर के परकाया प्रवेश का उल्लेख करना प्रासंगिक होगा। कहा जाता है कि उन्होंने मृत राजा अमरु के शरीर में प्रवेश कर भोगादि प्रतीति के बाद दृष्टा भाव से अमरुशतक की रचना की थी। भयंकर, वीभत्सादि घटनाओं का मंचन जब हम किसी नाटक में देखते है तो वह भय न तो किसी लेखक का, न तो किसी पाठक का और न ही किसी ही दर्शक का होता है। वह किसी एक का होते हुए भी किसी एक का न होकर रसानुभूति में रूपान्तरित हो जाता है। वाल्मीकि के राम, तुलसी के राम, भवभूति के राम, कृत्तिवास के राम भिन्न भिन्न होकर भी है एक ही राम होते है.
इस तरह सत्य की भी बहुमुखी प्रकृति अलग-अलग पहलुओं को प्रतिबिंबित करती हुई विलक्षण और जटिल हो जाती है। विज्ञान के विभिन्न मॉडल या सिद्धांत एक ही घटना की व्याख्या कई तरीके से करते हैं। उदाहरण के लिए, प्रकाश के कण और तरंग सिद्धांत भौतिक पदार्थ की पृथक पृथक व्याख्याएँ देने के बावजूद अपने अपने संदर्भों में स्वीकृत होते हैं। यह द्वंद्व दर्शाता है कि किस प्रकार विज्ञान अलग-अलग दृष्टि बिन्दुओं से सत्य स्वरूप की व्याख्या करता है। हम जितना देखते है उतना ही सत्य नहीं होता है, कल्पना की उड़ान हमें प्रत्यक्ष के पार ले जाती है। किसी के कमरे में खून से सने कपडे देख कर हम इस निष्कर्ष पर नहीं पहुँच सकते है कि उस कमरे में रहने वाले व्यक्ति ने ही खून किया है। सम्भावनाओं के असंख्य द्वार रहस्य रोमांच का कारण बन जाता है। कला की तरह विज्ञान में भी भावनाओं के नए गलियारें खुलते है, और किसी एक सम्भावना पर मुहर लग जाती है। देखा जाय तो प्रेमादि भाव इन्द्रिय गम्य तथ्य नहीं होते है, प्रेम में ‘होना’ पड़ता है। प्रेम में भी सत्य की बात तब उठती है जब हम कहते है सच्चा प्रेम, झूठा प्रेम, प्रेम में धोखा आदि। झूठे प्रेम को ख़ारिज करने के लिए प्रमाण की जरूरत पड़ती है। प्रेम सच्चा होने पर सत्य की कोटि में आ जाता है।
कुछ सत्य वस्तुनिष्ठ होते हैं, जैसे दो और दो मिलकर चार होते है। दूसरी ओर, सांस्कृतिक, व्यक्तिगत और नैतिक सत्य व्यक्तिगत अनुभवों और सामाजिक मानदंडों के आधार पर भिन्न भिन्न होते हैं। सिर्फ इतना फर्क होता है कि ज्ञान प्रमाणसिद्ध है, जबकि भाव को संचारित करना पड़ता है। पुष्प सुंदर होता है, पर कांटा भी उतना ही सुंदर होता है, क्योंकि वह पुष्प का रक्षक होता है। साधारण चीजें ㄧजैसे रास्ते की दीवारों पर पुता हुआ पुराना पैम्फलेट, किसी की कार पर सोया कुत्ता, रिक्शे पर भोजन करता रिक्शेवाला, बच्चों को ठेलती हुई बिल्लियाँ, चलती हुई ट्रेनों की आवाज़, सड़कों पर लड़ते हुए बूढ़े जोड़े ㄧ जिसे हम आमतौर पर अनदेखा कर देते है, सत्य तो होते ही है, सुन्दर भी।
हाईडेगर, जर्मन दार्शनिक, के अनुसार कला सिर्फ सौंदर्य या आनंद का उत्स ही नहीं, सत्य का स्रोत भी होती है, जिसमें हम अपने अस्तित्व के सही स्वरूप को पहचान सकते है। कला का प्रमुख उद्देश्य उसके उपादानों से न होकर संसार के साथ व्यक्ति के संबंधों को खोल कर रखने में होता है। हाईडेगर सत्य को ग्रीक शब्द "aletheia," से व्युत्पन्न मानते है, जिसका अर्थ होता है "unconcealment" or "disclosure अर्थात जो छिपे हुए अर्थ को उन्मोचित करता है, और संसार को एक नई दृष्टि से समझने में सहायक होता है। जिस तरह बांसुरी अन्दर से खोखली होने पर ही सुरों का साधन बनती है, उसी तरह मनुष्य के अस्तित्व की पराकाष्ठा कला में परिपूर्णता प्राप्त करती है। किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में इतना जानना पर्याप्त नहीं है कि वह लम्बा है, काला है, उसका वजन ७५ किलो है, इत्यादि। यह भी जानना आवश्यक है कि उसका चिन्तन जगत कैसा है, जिसमें वह आत्म-विच्युत न होकर आत्म-प्रतिष्ठित हो जाता है, अर्थात स्वयं को स्वयं से बाहर होकर देखना (being-outside of-oneself)। काव्य का सत्य यथार्थ की नक़ल मात्र नहीं होता है, वह तथ्य को सत्य में बदल देता है। लौकिक जगत का आंवला कला के क्षेत्र में आम तो नहीं बन सकता, किन्तु रस के पाक से मुरब्बा जरूर बन जाता है। पर हाँ, उत्तर आधुनिक काल में कलाकार कल्पनाओं के मिश्रण से आमांवला का यथार्थ भी सृजन कर लेता है। आज इतिहास की भी हमें बहुआयामी व्याख्यायें प्राप्त होती है, जो इतिहास पढ़ने का नजरिया ही बदल देती है। इसी तरह काव्य-रस की सामग्री लोक से ही प्राप्त होती है, रचनाकार भी लौकिक ही होता है, पर कला से लोक तिरोहित होकर अ-लौकिक बन जाता है। कला निरी काल्पनिक धरातल पर खड़ी होकर भी वास्तविकता की तलाश करती है।
नीत्शे ने कला को दो विरोधी शक्तियों के रूप में वर्णित किया है। सुंदर कला में व्यवस्था और अव्यवस्था दोनों तत्व समान रूप से चलते है। एक गणितीय और तार्किक व्यवस्था का प्रतीक है, दूसरा भावना और तार्किक व्यवस्था के खंडन का प्रतीक है। वैज्ञानिक और कलाकार के बीच के इस अंतर को बहुत नहीं खींचना चाहिए, क्योंकि सत्य की खोज और सौंदर्य का सृजन एक-दूसरे के परिपूरक है। गणितीय प्रमाण सुरुचिपूर्ण होते ही इसलिए है कि क्योंकि उनमें सौंदर्य का सामंजस्य होता है, और सौंदर्य का काम हमें उन सत्यों के करीब ले जाना है। ईदगाह का हामिद, कफ़न का घीसू और माधव हमारे आसपास के ही किरदार है, जो कठोर सत्य को मीठी चाशनी में परोसे जाते है।
और अंत में स्पिनोज़ा, एक यहूदी दार्शनिक, की उपमा ㄧकला और ज्ञान दो आइने है जिन्हें आमने सामने रखने पर जो अनंत अनुवृत्तियाँ बिम्बों के रूप में उभरती है, वही इस सम्बन्ध को सटीक परिभाषित कर सकती है.
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ हुआ है।