पूरा विश्व आजकल दम साधे देख रहा है कि अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान से शुरू किया गया युद्ध आखिर क्या करवट लेता है. सभी देश चिंतित हैं कि कहीं हम विश्व-युद्ध की ओर तो नहीं बढ़ रहे. ऐसे माहौल में हमारे वरिष्ठ मित्र, कवि एवं लेखक सुभाष सेतिया को उनकी एक पुरानी कविता की याद हो आई जो उन्होंने हमें प्रकाशन के लिए भेजी. कविता युद्ध विरोधी तो नहीं कही जा सकती लेकिन जिस भावुक अंदाज़ में युद्ध की निर्ममता को रेखांकित करती है, वह अपने आप में युद्ध की व्यर्थता को ही जताने का भाव है. आइए, पढ़िए हृदय को द्रवित करने वाली इस कविता को जो दशकों पुरानी होते हुए भी सामयिक है.











