नन्दिता मिश्र : चार नई कविताएँ
नन्दिता मिश्र हमारी वेब-पत्रिका में बहुत सी कहानियों और लेखों से अपना योगदान दे चुकी हैं. अभी पिछले माह आपने उनकी कहानी घर जो ना हुआ अपना पढ़ी होगी जो उनकी इससे पहले लिखी गई कहानियों की तरह खूब पढ़ी गई थी. नन्दिता कविताएँ बहुत नहीं लिखतीं या शायद हमें ज़्यादा नहीं भेजतीं. पिछले वर्ष अक्तूबर में उन्होंने दो कवितायेँ भेजीं थीं जो आप यहाँ पढ़ सकते हैं. इस बार की उनकी कविताओं में भावनाओं का ज्वार तो है लेकिन यह ऐसा ज्वार है जो बहुत धीमे-धीमे आता है जैसे कोई उसे पीछे से नियंत्रित कर रहा हो! हमें पता नहीं कि भौगोलिक शब्दावली में ऐसा कोई ज्वार हो सकता है या नहीं (जो इतना धीमे धीमे आता हो) लेकिन नीचे की दी जा रही कविताओं में आप उस आत्म-नियंत्रण को महसूस कर सकते हैं. आइये, पढ़िए हमारे साथ ये कविताएँ!
नन्दिता मिश्र : चार नई कविताएँ
अपना कौन
जब पहली बार समुद्र देखा था
तब ऐसा लगा इससे बढ़ कर
कुछ हो ही नहीं सकता
भव्य, विशाल, गहरा और बलशाली
ऊंची ऊंची लहरें
जैसे बहा ले जायेंगी तट भी
ऐसी शक्ति,चकित हो गया!
फिर देखी बर्फ स्वच्छ
सफेद धवल जैसे कोई रूपसी,
रुई जैसी हल्की,रेत जैसी भुरभुरी
लोहे से भी पक्की कठोर
बड़ी बड़ी चट्टानें,पर्वत श्रृंखलाएं
बर्फ़ से ढंके रास्ते,गांव, पेड़ पौधे
तब लगा अरे ये तो समुद्र से भी सुन्दर है
लुभावना है!
कुछ दिन बीते
फिर आया एक नदी किनारे और
जी भर आया उसका
प्रवाह, संयम देख सबको समेटे थी
भार से दबी थी,
गरिमामय,
धीरे-धीरे बह रही थी
पर गर्व नहीं था उसमें
समर्पण था , सम्मान था
उसकी शांत कलकल से
थके हुए मन और शरीर को मिली ऊर्जा!
तभी किनारे के पेड़ हिले
लगा पुकारा मुझे
चहचहाते पंछियों ने
मेरा रोम रोम खिल उठा
मन जो समुद्र का बल, बर्फ़ की सुन्दरता और धवलता
सब देख कर अनमना था ,अकेला था
हो गया सचेत,खुश
कितने साथी मिल गये
सहसा लगा ध्वनि,शब्द, शांति
इसी में है सब
कुछ भी कितना ही सुन्दर और भव्य क्यों न हो
दे नहीं सकता चैन, आराम, निश्चिंतता
यदि वो अपना न हो!
XXXXX
कविताएं ताले में
अब कविताएँ भी ताले चाभी में रखी जा रही हैं
और कुछ तो बचा नहीं जो ताले में रखें
मां के ज़ेवर हमारी पढ़ाई और ढिठाई में बिक गये
पिता कभी इतना कमा नहीं पाये के बचा कर रखते
शिवानी, मेरी भांजी ने
एक डायरी खरीदी
ताले चाभी वाली
पहला पन्ना मेरा माना
मैंने समझाया तुम कुछ लिखो!
उसने जिद पकड़ ली
मौसी तुम कुछ लिखो!
अनायास मैंने लिखना शुरू किया
मैं वैसे लिखती नहीं
पर कभी कभी जब मन
बहुत ज़ोर देता है कि लिखो
तो बस कविताएं लिखती हूं अपने लिये!
क्योंकि शब्दों पर अपना बस है
उन्हें मैं जैसा चाहे मोड़ दूं,तोड़ दूं ,घुमा दूं
वो कुछ कहते नहीं!
चाहें या न चाहें
उतर आतें हैं कागज़ पर
और बन जाती है एक बेतरतीब कविता
मन खश हो जाता है तन हल्का!
इसी से इतना बन जाता है
यही मेरे जीवन की कमाई है
जो अब कैद है तुम्हारी डायरी में
सम्भालना बिटिया.....
XXXXX
गेंदे के फूल
त्योहार मतलब उत्सव
गणपति बप्पा मोरया से लेकर
नये साल तक
अब गुलाब बहुत मंहगे हो गये हैं!
समय बीतते बीतते
गेंदा भी उसी राह पर है
रोज़ रोज़ मंहगा होने लगा है।
गुलाबों की खूशबू दब जाती है
इनकी आभा के सामने
ताजे चाहिए मिल जायेंगे
पर और मंहगे!
बस बात यहीं आ कर अटक जाती है
मेरी कमीज़ तुम्हारी कमीज़ से मैली या सफेद कैसे
ये बात प्रतिष्ठा का प्रश्न बन जाती है
शब्दों के अर्थ बदल जाते हैं
पहले शब्द प्रतिष्ठा खुद ही बहुमूल्य थी!
क्या आपको ठीक लगती हैं
ऐसी ओछी बातें
शोभा देती हैं क्या
सब कुछ दिखावा बन गया है
प्रतिष्ठा बन गयी है प्रश्न
और वो दूर खड़ी देख रही है ये परिवर्तन
उसके ओठों पर हल्की मुस्कान है
वो धीरे-धीरे पीछे हटती जाती है
ओझल हो जाती है
बच जाते हैं सिर्फ मंहगे फूल गुलाब और गेंदें
........
XXXXX
चाय की चुस्की
कहते हैं साल में एक चाय दिवस भी होता है
लेकिन मैं तो रोज़ चाय पीती हूं
कभी कभी इसके बाद भी चाय की तलब लगती है
याद आया कि तुम कहते थे
बात बिगड़े या बने
बस चाय पीना चाहिए ।
कुछ तो हो जीवन में ऐसा
कि जो अकेले जिया जा सके
जनाब वो चाय है
कोई साथ हो या न हो
वो मज़ा देती ही है
चाय का मज़ा लेना ही चाहिए !
चाय की हर चुस्की से जुड़ी हैं
हज़ारों यादें
प्यार की झगड़ने की
रूठने की मनाने की
साथ की बिछड़ने की !
तुम कहते थे
चाय न होती तो ये भी ये सब होता
तब हंसती थी जब तुम कहते थे
अब समझ आया
चाय की हर चुस्की बढ़ा देती है
ऐसी यादों का मज़ा
वो लम्हें
जो हमने कभी साथ जिये थे!
तुम ठीक ही कहते थे
अरे यार चाय पियो चाय
बात बने या न बने
चाय तो बन सकती है
बस चाय पीना चाहिये।
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वर्षों आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग और केंद्र सरकार के अन्य संचार माध्यमों में कार्य-रत रहने के बाद नन्दिता मिश्र अब स्वतंत्र लेखन करती हैं।