पुस्तक समीक्षा - शोध की शालीन शास्त्रीयता : एक सार्थक संदर्भ-संकलन
डॉ. शैलेश शुक्ला द्वारा लिखी गई यह समीक्षा प्रो.हरीश अरोड़ा की हाल ही में प्रकाशित कृति "शोध : प्रविधि और प्रक्रिया" पर केंद्रित है. डॉ. शुक्ला का यह कहना है कि यह हिन्दी शोध-जगत की पद्धतिगत चुनौतियों और उनके समाधान की ओर गहन दृष्टि डालती है। डॉ. शुक्ला ने पुस्तक की संरचना, उसके व्यावहारिक योगदान और शोधार्थियों व निर्देशकों के लिए इसकी उपयोगिता को सूक्ष्मता से रेखांकित किया है। यह लेख हिन्दी शोध की गंभीरता और उसके नैतिक अनुशासन पर पुनः विचार करने का आमंत्रण है।
पुस्तक समीक्षा - शोध की शालीन शास्त्रीयता : एक सार्थक संदर्भ-संकलन
डॉ. शैलेश शुक्ला
प्रो. हरीश अरोड़ा द्वारा लिखित शोध : प्रविधि और प्रक्रिया एक ऐसे समय में प्रकाशित हुई है जब हिन्दी के शोध-जगत में पद्धतिशास्त्र को लेकर एक गहरी बेचैनी विद्यमान है। विश्वविद्यालयों में शोध-प्रबन्ध प्रस्तुत किए जा रहे हैं, उपाधियाँ दी जा रही हैं, किन्तु शोध की आत्मा — उसकी वैज्ञानिक पद्धति, उसके नैतिक अनुशासन और उसकी मौलिक दृष्टि — को लेकर शोधार्थियों और कभी-कभी निर्देशकों में भी पर्याप्त जागरूकता नहीं है। यह पुस्तक उसी रिक्तता को भरने का प्रयास करती है और इस दृष्टि से इसका प्रकाशन न केवल स्वागत-योग्य है, बल्कि आवश्यक भी था। लेखक स्वयं दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध पी.जी.डी.ए.वी. कॉलेज के हिन्दी विभाग में प्रोफेसर हैं और उनका दीर्घ शोध-अनुभव पुस्तक के प्रत्येक पृष्ठ पर अनुभव की गहराई के साथ उपस्थित है। बुद्ध पूर्णिमा, विक्रमी संवत् 2082 को प्रकाशित इस ग्रंथ में लेखक ने जो समर्पण-वाक्य चुना है — "हर उस यायावर को जो खोज रहे हैं अन्नत को और शोध रहे हैं अपने मन की अविगत गति को" — वह स्वयं में इस पुस्तक की भावभूमि को स्पष्ट कर देता है। शोध केवल एक अकादमिक कर्म नहीं, वह एक आंतरिक यात्रा है — यह संदेश पुस्तक के आरंभ से ही पाठक के मन में बैठ जाता है।
पुस्तक की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह 'शोध' शब्द को लेकर किसी सतही परिभाषा पर नहीं रुकती, बल्कि उसकी व्युत्पत्ति, उसके पर्यायों और उनके सूक्ष्म भेदों की गहरी पड़ताल से आरंभ होती है। 'शोध', 'अनुसंधान', 'अन्वेषण', 'गवेषणा', 'अनुशीलन', 'समीक्षा', 'आलोचना', 'खोज', 'परिशीलन', 'अन्वीक्षण' — इन सभी शब्दों को हिन्दी में प्रायः पर्याय मान लिया जाता है, किन्तु प्रो. अरोड़ा ने इनमें से प्रत्येक की व्युत्पत्ति और अर्थ-परंपरा को इतने सुचिंतित ढंग से प्रस्तुत किया है कि पाठक स्वयं महसूस करने लगता है कि ये शब्द एक-दूसरे से कितने भिन्न हैं। इसी प्रकार 'डिस्कवरी' और 'रिसर्च' जैसे अंग्रेजी पदों का विश्लेषण करते हुए लेखक यह स्थापित करते हैं कि 'डिस्कवरी' का अर्थ है गुप्त तथ्यों को स्पष्ट करना और 'रिसर्च' का अर्थ है ज्ञात तथ्यों का पुनराख्यान। यह भेद सामान्य लगता है, किन्तु शोध-कार्य की दिशा निर्धारण में इसका बहुत महत्त्व है। 'शोध' और 'समीक्षा' के बीच जो विस्तृत तुलना की गई है — विषय प्रकृति, स्वरूप, प्रक्रिया और प्रयोजन की दृष्टि से — वह हिन्दी के साहित्यिक समाज में बहुत काम की चीज है।
शोध के प्रकारों पर विचार करते हुए लेखक ने जिस विस्तार और वर्गीकरण-कुशलता का परिचय दिया है, वह प्रशंसनीय है। जीवन वृत्तीय शोध, प्रवृत्तिगत शोध, प्रभावगत शोध और आलोचनात्मक शोध — इन चारों प्रकारों की साहित्यिक शोध के अंतर्गत विवेचना करते हुए लेखक ने न केवल उनकी परिभाषाएँ दी हैं, बल्कि उनकी व्यावहारिक कठिनाइयों और संभावनाओं पर भी प्रकाश डाला है। ऐतिहासिक शोध, भाषा-वैज्ञानिक शोध, शैली-वैज्ञानिक शोध, समाजशास्त्रीय शोध, मनोवैज्ञानिक शोध और सांस्कृतिक शोध पर भी इसी परिपक्वता के साथ विचार किया गया है। तुलनात्मक शोध के अंतर्गत एक भाषा के भीतर तुलनात्मक शोध और दो भाषाओं के अंतर्गत तुलनात्मक शोध की कठिनाइयों का जो विवेचन है, वह व्यावहारिक अनुभव से उपजा लगता है। तुलनात्मक शोध की कठिनाइयों में भाषा-ज्ञान की सीमा, निर्देशक की अनुपलब्धता और निष्पक्ष दृष्टि की आवश्यकता — तीनों को बहुत ईमानदारी से रखा गया है।
पाठालोचन पर स्वतंत्र और सविस्तार चर्चा इस पुस्तक का एक विशिष्ट योगदान है। हिन्दी में यह विधा प्रायः उपेक्षित रही है और इस पर कोई स्वतंत्र ग्रंथ तो दूर, विस्तृत अध्याय भी उपलब्ध नहीं था। प्रो. अरोड़ा ने पाठालोचन के उद्देश्य, उसके योगदान, उसकी प्रक्रिया और उसके सिद्धांतों पर जो विवेचन किया है, वह शोधार्थियों के लिए एक नई दुनिया खोल देता है। भाषिक सिद्धांत, संरचनावादी सिद्धांत, उत्तर-संरचनावादी सिद्धांत, अलंकारिक एवं काव्यशास्त्रीय सिद्धांत, पाठक-प्रतिक्रिया सिद्धांत, ऐतिहासिक और सामाजिक संदर्भ सिद्धांत, नारीवादी सिद्धांत और मनोविश्लेषणात्मक सिद्धांत — इन सभी को एक ही अध्याय में इतने सुलभ ढंग से प्रस्तुत करना बहुत कठिन कार्य है और लेखक इसमें काफी हद तक सफल रहे हैं। पाठालोचन के महत्त्व को समझाते हुए लेखक ने जो व्यावहारिक उदाहरण दिए हैं — प्राचीन हस्तलेखों की प्रतिलिपियों में मूल पाठ से होने वाले अपभ्रंश और उनकी पहचान की प्रक्रिया — वे पाठ को जीवंत बनाते हैं।
शोध की प्रक्रिया वाला खंड पुस्तक का सर्वाधिक व्यावहारिक और उपयोगी भाग है। शोधार्थी के व्यक्तित्व और व्यवहार संबंधी गुणों — अभिरुचि, धैर्य, परिश्रम एवं लगन, योग्यता, शिष्ट-आचरण, स्वास्थ्य और अध्ययन की प्रवृत्ति — की जो विवेचना की गई है, वह कहीं-कहीं आदर्शवादी लगती है, किन्तु आदर्श का निरूपण भी एक शैक्षणिक ग्रंथ का दायित्व है। निर्देशक के गुणों और सिद्धांतों पर इतने विस्तार से हिन्दी में पहले नहीं लिखा गया था। निर्देशक की क्षमता, रुचि, निर्देशन-अवकाश, धैर्य और अनवरत चिंतन की प्रवृत्ति, कर्त्तव्य-पालन की भावना, अहंकारमुक्त प्रवृत्ति और निष्पक्ष एवं तटस्थ दृष्टि — इन सभी पर प्रो. अरोड़ा ने जो विचार किए हैं, वे न केवल शोधार्थियों को अपने निर्देशक को समझने में सहायता करते हैं, बल्कि स्वयं निर्देशकों के लिए भी आत्मावलोकन का अवसर देते हैं। विषय निर्वाचन की चर्चा में शोधार्थी, शोध-निर्देशक, शोध के स्थान और शोध-विषय के शीर्षक — चारों आधारों पर जो विचार किया गया है, वह व्यावहारिक और तार्किक दोनों है।
रूपरेखा-निर्माण पर चर्चा करते हुए लेखक ने संक्षिप्त और विस्तृत रूपरेखा का भेद स्पष्ट किया है और उदाहरण के रूप में 'गुरु गोविन्द सिंह के काव्य में राष्ट्रीय अस्मिता' विषय की रूपरेखा दी है जो शोधार्थियों को तत्काल व्यावहारिक सहायता प्रदान करती है। इसी प्रकार सामग्री संकलन के अंतर्गत मुख्य कोटि, मध्यम कोटि और सहायोगी कोटि के स्रोतों का वर्गीकरण, आसन-कार्य पद्धति, घुमक्कड़ कार्य पद्धति, साक्षात्कार पद्धति और प्रश्नावली पद्धति का विवेचन बहुत उपयोगी है। सामग्री के सम्पादन, प्रामाणिकता की जाँच, विश्लेषण की दृष्टि और सामग्री उपयोग पर जो विचार हैं, वे शोधार्थी को सामग्री के साथ कैसा व्यवहार करना चाहिए — इस प्रश्न का उत्तर बहुत स्पष्टता से देते हैं।
शोध प्रबन्ध लेखन के अंतर्गत मुख पृष्ठ, प्राक्कथन, विषय-सूची, तालिका सूची, चित्र सूची, विषय-प्रवेश, मूल प्रबन्ध, निष्कर्ष, ग्रंथ सूची और परिशिष्ट — इन सभी अंगों की विस्तृत विवेचना के साथ लेखक ने चार अलग-अलग विश्वविद्यालयों के मुख पृष्ठों के उदाहरण भी दिए हैं। यह उदाहरण-पद्धति शोधार्थियों के लिए बहुत काम की है क्योंकि पुस्तकों में सिद्धांत तो मिलते हैं, किन्तु व्यावहारिक उदाहरण दुर्लभ हैं। उद्धरण देने की विधि और संदर्भोल्लेख पर जो अध्याय है, वह आज के शोधार्थियों के लिए अत्यंत आवश्यक है। पाद-टिप्पणी की चार विधियाँ — प्रबन्ध के अंत में, अध्याय के अंत में, उद्धरण की समाप्ति पर और पाद-टिप्पणी में — और उनके गुण-दोषों का विवेचन पुस्तक को पूर्णता देता है।
संदर्भ/उद्धरण की मानक शैलियों पर चर्चा करते हुए लेखक ने MLA, Chicago Style (Notes and Bibliography तथा Author-Date दोनों रूप), APA (7वाँ संस्करण) की विस्तृत और उदाहरण-सहित व्याख्या की है। यह जानकारी हिन्दी में पहली बार इतने व्यवस्थित रूप में उपलब्ध हुई है। इससे भी महत्त्वपूर्ण यह है कि लेखक ने एक स्वदेशी 'अरोड़ा शैली' या 'भारतीय शैली' का प्रस्ताव किया है। उनका तर्क है कि भारत, जो ज्ञान की सबसे प्राचीन परंपरा का वाहक है, उसकी अपनी कोई मानक संदर्भ शैली न हो — यह स्वीकार करने योग्य नहीं। यह प्रयास निस्संदेह साहसिक और स्वाभिमानपूर्ण है। इस शैली में पुस्तक, जर्नल-लेख, वेबसाइट, संपादित पुस्तक, अनूदित कृति, पत्र-पत्रिका और कोश — सभी के लिए संदर्भ के स्वरूप उदाहरण सहित दिए गए हैं। हालाँकि यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि इस शैली को व्यापक मान्यता दिलाने के लिए UGC, Inflibnet या विश्वविद्यालय अनुदान आयोग जैसी संस्थाओं के अनुमोदन का क्या मार्ग होगा — इस पर पुस्तक में कोई संकेत नहीं है। फिर भी एक मानक भारतीय शैली की आवश्यकता को स्थापित करने और उसके प्रारूप को प्रस्तुत करने का यह प्रयास अपने आप में मूल्यवान है।
साहित्यिक नकल, समानता और चोरी पर केंद्रित अध्याय इस पुस्तक का सर्वाधिक समसामयिक और जरूरी हिस्सा है। डिजिटल युग में जब शोध-सामग्री की उपलब्धता असीमित हो गई है, तब साहित्यिक चोरी की समस्या भी उतनी ही तेजी से बढ़ी है। Direct Plagiarism, Paraphrasing Plagiarism, Self-Plagiarism और Source Omission — इन चारों प्रकारों को स्पष्ट करते हुए लेखक ने Drillbit, Turnitin, Plagscan, Urkund/Ouriginal, Copyscape, PaperRater और Quetext जैसे उपकरणों की विस्तृत और तुलनात्मक समीक्षा प्रस्तुत की है। Semrush और Grammarly का भी उल्लेख है। यह जानकारी हिन्दी में पहली बार इतनी व्यापकता से उपलब्ध हुई है। Drillbit का विशेष परिचय देते हुए लेखक ने बताया है कि यह भारतीय कंपनी द्वारा निर्मित उपकरण है जो हिन्दी, मराठी, गुजराती, तमिल, तेलुगु, कन्नड़ और बंगाली सहित लगभग 150 भाषाओं में वास्तविक समय में साहित्यिक चोरी की पहचान करता है — यह जानकारी स्वदेशी प्रौद्योगिकी के प्रति जागरूकता के दृष्टिकोण से भी महत्त्वपूर्ण है।
हिन्दी शोध के इतिहास पर अंतिम अध्याय पुस्तक को एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य प्रदान करता है। पूर्वपीठिका से लेकर आरंभिक काल, विकास काल, वैभव काल तक की यात्रा का वर्णन रोचक और तथ्य-परक है। सन् 1911 में इटालियन विद्वान लुईजि पिओ तेसीतोरी का 'रामचरितमानस और रामायण' पर लेख, सन् 1931 में बाबूराम सक्सेना का 'एवोल्यूशन ऑफ अवधी' पर भारतीय विश्वविद्यालय द्वारा स्वीकृत प्रथम शोध-प्रबन्ध — ये ऐतिहासिक विवरण पाठक को हिन्दी शोध की जड़ों से जोड़ते हैं। शोध-स्तर में गिरावट के कारणों का विश्लेषण — शोधार्थी की अभिरुचि और क्षमता का मूल्यांकन न होना, विश्वविद्यालय-चयन की समस्या, निर्देशक के चयन की समस्या, विषय निर्वाचन की कठिनाई, तथ्य-संकलन और संयोजन में असंतुलन, विश्वविद्यालयों में आपसी तालमेल की कमी और दोषपूर्ण प्रवेश-प्रक्रिया — यह सूची व्यापक और यथार्थ-परक है। सुधार के उपाय भी उतने ही व्यावहारिक हैं।
पुस्तक के दोनों परिशिष्ट अत्यंत उपयोगी हैं। आठ विभिन्न विषयों पर लघु शोध प्रबन्धों की रूपरेखाएँ और 228 से अधिक स्वीकृत शोध प्रबन्धों की विषय-सूची मिलकर इस पुस्तक को एक व्यावहारिक संदर्भ-ग्रंथ बनाती हैं। नए शोधार्थी इन रूपरेखाओं को देखकर अपने विषय की रूपरेखा बनाने में बहुत सुविधा पाएंगे।
कुछ सीमाएँ भी ध्यान देने योग्य हैं। पुस्तक का केंद्र मुख्यतः साहित्यिक शोध है और अंतरानुशासनिक शोध, डिजिटल ह्यूमैनिटीज़ या कॉर्पस भाषाविज्ञान जैसी नई विधाओं पर विस्तृत चर्चा की गुंजाइश थी। उदाहरण-सामग्री में दिल्ली और उत्तर भारतीय विश्वविद्यालयों का प्राधान्य है। कहीं-कहीं विचारों की पुनरावृत्ति भी खलती है। किन्तु ये सीमाएँ पुस्तक की उपयोगिता को महत्त्वपूर्ण रूप से कम नहीं करतीं।
कुल मिलाकर, शोध : प्रविधि और प्रक्रिया हिन्दी के शोध-साहित्य में एक मील का पत्थर है। यह पुस्तक शोधार्थियों, निर्देशकों और हिन्दी विभागों — तीनों के लिए समान रूप से उपयोगी है। इसकी भाषा सरल और प्रवाहमयी है, संरचना सुव्यवस्थित है और विषय-विस्तार व्यापक है। प्रो. हरीश अरोड़ा ने इस पुस्तक के माध्यम से हिन्दी शोध-परंपरा को एक ऐसा उपकरण दिया है जिसकी प्रतीक्षा बहुत लंबे समय से थी।

डॉ. शैलेश शुक्ला | Dr. Shailesh Shukla
वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह | Global Group Editor, Srijan Sansar Group of International Journals
सलाहकार संपादक, नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स | Consulting Editor, NaiDunia & GaurSons Times
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