चाहतें, अकेलापन और ज़िन्दगी का नशा - डॉ उदय पन्त के तीन गीत
हिंदी में नवगीतों की परंपरा तो १९५० में ही शुरू हो गई थी लेकिन आलोचना के दायरे में कविता का ही आधिपत्य रहा और बहुत सारे बेहतरीन गीत तो मुंबई की फिल्म इंडस्ट्री का हिस्सा बनकर आम जन में तो लोकप्रियता पा गए किन्तु साहित्य में विशेष चर्चा ना हुई। इस वेब-पत्रिका में बीच-बीच में कविताएँ तो आप पढ़ते रहते हैं किन्तु गीतों के मामले में हम कुछ पिछड़े ही रहे क्योंकि बहुत कभी-कभार योगेन्द्र दत्त शर्मा के कुछ गीतों के अलावा हमें कभी अच्छे गीत प्राप्त भी नहीं हुए। फिर अभी हाल ही में जब हमारा परिचय डॉ उदय पन्त से हुआ (जिनका परिचय आप नीचे पढ़ सकते हैं) तो हमने उनसे अपनी रचनाएं शेयर करने का अनुरोध किया जिसके लिए वह तैयार हो गए। नीचे उनके तीन गीत हैं और तीनों में आपको कोई ना कोई जीवन-दर्शन मिलेगा या यूँ कहें की ज़िन्दगी के ऐसे फ़लसफ़े मिलेंगे जिन पर हमारा ध्यान आसानी से नहीं जाता। उम्मीद करनी चाहिए कि उनकी रचनाएं मिलने का यह सिलसिला आगे भी चलता रहेगा।
चाहतें, अकेलापन और ज़िन्दगी का नशा - डॉ उदय पन्त के तीन गीत
गीत -1
मनचाहा, सब मिलता है कहाँ
ये बस, ख़्वाबों की बात है
पर कुछ ना मिला, तो ना सही
अच्छा है, सपनों का साथ है
ज़िन्दग़ी, तेरे संग संग जियेंगे हम
अपना सफ़र, ख़ुद तय करेंगे हम
हासिल हो जो उसे, मंज़िल कहेंगे हम
मुकम्मल जहाँ, कहाँ पायेंगे हम
ये बस, ख़्वाबों की बात है
एक लम्हा, काफ़ी है अपने लिए
ख़ुद का साथ, सबसे जरूरी यहाँ
बांटेंगे हर ग़म, और हर ख़ुशी हम
वक़्त के संग, मिलेगी मंज़ूरी यहाँ
ये ही, हक़ीक़त की बात है
मनचाहा, सब मिलता है कहाँ
ये बस, ख़्वाबों की बात है
पर कुछ ना मिला, तो ना सही
अच्छा है, सपनों का साथ है
अच्छा है, सपनों का साथ है
गीत - 2
डर लगता है अब अकेलेपन से
अकेले में अकेले घर में
लगता है यहाँ मेरा भी होता
ऐसा कोई साथी दुख सुख में
कोई ग़म न था ज़माने में
पर करूं बात किस से अकेले में
दिल खोल के रख दूं ये मेरा
लगता है कभी किसी के सामने में
लगता है यहाँ मेरा भी होता
ऐसा कोई साथी दुख सुख में
दोस्तों को कहते सुना है मैंने भी
मज़े हैं कितने अकेले जीने में
जानता हूँ मग़र कितने सपने
बुनते हैं वही सब अकेले में
लगता है यहाँ मेरा भी होता
ऐसा कोई साथी दुख सुख में
डर लगता है अब अकेलेपन से
अकेले में अकेले घर में
लगता है यहाँ मेरा भी होता
ऐसा कोई साथी दुख सुख में
डर लगता है अब अकेलेपन में!
गीत - 3
नशे में हूँ , नशे में हूँ , नशे में हूँ
नशे में हूँ, मुझको, ज़िन्दग़ी का है नशा
मैं ख़ुश हूँ, मुझको, ज़िन्दग़ी का है नशा
जो भी है, उसी का मैं अमीर हूँ
मैं दौलतों, के बीच भी, फ़क़ीर हूं
ज़मीं तो क्या, अज़ीज़ मुझको कहकशाँ
मुझको, ज़िन्दग़ी का है नशा
मैं ख़ुश हूँ, मुझको, ज़िन्दग़ी का है नशा
मैं ख़ुश हूँ, मुझको, ज़िन्दग़ी का है नशा
मुफलिसी भी, हो तो, मैं अमीर हूँ
अमीर बन भी, मुफ़लिसी का मैं, मुरीद हूँ
है हमेशा, एक सी, रहे मेरी दशा
मुझको, ज़िन्दग़ी का है नशा
मैं ख़ुश हूँ, मुझको, ज़िन्दग़ी का है नशा
मैं ख़ुश हूँ, मुझको, ज़िन्दग़ी का है नशा
नशे में हूँ , नशे में हूँ , नशे में हूँ
नशे में हूँ, मुझको, ज़िन्दग़ी का है नशा
मैं ख़ुश हूँ, मुझको, ज़िन्दग़ी का है नशा
नशे में हूँ , नशे में हूँ , नशे में हूँ
नशे में हूँ , नशे में हूँ , नशे में, हूँ ...
**********

1980 बैच के सिविल सेवा अधिकारी डॉ उदय पन्त बहुमुखी प्रतिभासंपन्न कला-मर्मज्ञ हैं जो राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय वित्त-प्रशासन के क्षेत्र के विशेषज्ञ होने के साथ-साथ एक लेखक, कवि, चिंतक, फिल्म मेकर, निर्देशक, गायक, गीतकार, सामाजिक कार्यकर्त्ता और 'हैप्पीनेस गुरु 'भी हैं। कई वृत्तचित्र (डाक्यूमेंट्री) और शार्ट फ़िल्म्स बनाने के बाद डॉ उदय पन्त ने 2024 में एक हिंदी फीचर फिल्म 'अपना आकाश' बनाई , जो फिल्म समारोहों में अपनी प्रेरक विषयवस्तु के चलते खूब सराहे जाने के बाद अब रिलीज़ के लिए तैयार है। विभिन्न राष्ट्रीय एवं अंतराष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं में नियमित लेखन के अतिरिक्त इनकी कई प्रकाशित पुस्तकें हैं जिनमें से कुछ कविता संग्रह हैं और कुछ अन्य चिंतन प्रधान पुस्तकें जैसे मन की बात/Talks of Mind; टुकड़ों में ज़िन्दगी/ Life in Parts,Open Secrets of Happiness; Apple and Spade (Poetry); Wars Within (Poetry) आदि। वित्त प्रबंधन के क्षेत्र की इनकी पुस्तकें Budgeting and Public Financial management in India; Payment and Accounting System in India खूब चर्चित रही हैं। सेण्टर फॉर सोशल एंड मैनेजमेंट सोलूशन्स के प्रेजिडेंट व् संस्थापक के तौर पर सामाजिक कार्य इनको प्रिय रहा है। आजकल वह इसके यूट्यूब चैनल के माध्यम से 'बीइंग सोशल' पॉडकास्ट में देश विदेश के जाने माने लोगों से चर्चा करते हैं जिसे यूट्यूब पर लाइव प्रसारित किया जाता है।