बच्चे भी अजीब होते हैं - राजेन्द्र भट्ट की कहानी
राजेन्द्र भट्ट हमारी वेब-पत्रिका पर नियमित लिखते रहे हैं। उनके लेखन का फलक व्यापक है - बानगी के लिए आप उनके नाम पर क्लिक करें तो उनके सभी लेख सामने आ जायेंगे। इस बार वह कुछ महीनों के अंतराल के बाद लौटे हैं।. उनका अंतिम लेख बल्कि यह लेखों की श्रृंखला थी, सोशल मीडिया और उसके विभिन्न आयामों पर था। इस श्रृंखला का अंतिम लेख आप यहाँ देख सकते हैं और वहीँ इस श्रृंखला के अन्य लेखों के लिंक मिल जायेंगे।. आज की उनकी रचना को उन्होंने 'कहानी' कहा है। है भी शायद ये कहानी ही लेकिन क्या विडम्बना है कि हमारे समाज की इतनी बड़ी सच्चाई, जिस पर उन्होंने मार्मिक टिप्पणी की है, वो कहानी ही है। याद आ रही है एक मशहूर पंक्ति जो शायद किसी ग़ज़ल का हिस्सा है - 'हक़ीक़त का अगर अफ़्साना बन जाए तो क्या कीजे'।
बच्चे भी अजीब होते हैं
राजेन्द्र भट्ट
बात फलसफे की थी, कॉफी तेज थी, ऊपर से मौसम में घुटन – जाहिर है, हमारी राय एक न हो सकी।
बमुश्किल आठ-नौ साल के, चिपटी नाक और फैले होंठों वाले उस बच्चे की आँखें फिर मुँद गईं और सिर नींद के झोंके में टेबल से टिक गया।
15-16 साल के बड़े लड़के को शायद ज्यादा ही गुस्सा आया अबकी बार। आखिर वह ‘ऑर्डर’ भी ले रहा था और किचन के ऊपर की मंजिल पर बने केबिन में दौड़-दौड़ कर ‘सर्व’ भी कर रहा था।
उसने बच्चे के काफी लंबे हो आए सूखे-सूखे बाल पकड़े और दो-तीन बार उसका सिर टेबल से पटक दिया। दो-चार मोटी गालियां दीं।
ज्यादा कुछ कहने की जरूरत नहीं थी। 8-9 साल वाला बच्चा झटके से उठा। वाकई तीन-चार टेबलों पर कप-प्लेट जमा हो गए थे। उसने उन्हें उठाया, किचन तक ले गया, ऊपर जा कर मशीन की तरह टेबलों पर कपड़ा मारा – और फिर सबसे कोने की टेबल पर सिर टिका कर ऊँघने लगा।
जैसे कुछ हुआ ही नहीं हो।
xxxx
दोस्त कुछ ज्यादा ही भावुक है।
“उसे नींद की सख्त जरूरत है। आखिर क्या हक़ है हमें बच्चों की नींद छीन लेने का? इस वक्त उसे माँ की गोद और लोरियाँ मिलने का हक़ है, टेबल पर सिर पटकवाने का नहीं....”
मैं सिर्फ मुस्करा दिया।
मैं खुद को बेहद तार्किक और विवेकशील समझता हूँ। इसलिए जब कोई भावुक होकर जोर-शोर से बहस करने लगे तो मैं अपनी ऊर्जा को बचाए रखते हुए सिर्फ मुस्करा देता हूँ। इसका सही असर पड़ता है – मतलब, सामने वाले को एहसास हो जाता है कि मैं उसके तर्क को एकदम सतही, भावनाओं में बहका हुआ और अवैज्ञानिक मानता हूँ – कि वह ‘ऑब्जेक्टिव’ होकर समस्या की तह तक तो पँहुच ही नहीं सकता।
और इस तरह, मैं बिना बोले ही उसे बौना और हीन बना देता हूँ – मखौल बना देता हूँ उसके तर्कों का।
दोस्त भी बौखला गया, “क्या तुम्हें वाकई तकलीफ नहीं होती यह सब देख कर? या जबरन अपनी भावनाएं छिपा कर खुद को बुद्धिजीवी और दूसरे को मूर्ख दिखाना चाहते हो?”
मैंने अपनी बौद्धिक मुद्रा जारी रखी और दोस्त पर जैसे एहसान करते हुए बोला, “दरअसल भावुक बचपने से सही निर्णय तक नहीं पँहुचा जा सकता। अगर ‘ऑब्जेक्टिव’ तरीके से सोचा जाए तो व्यक्तिगत करुणा से इन वाकयों का समाधान नहीं निकाला जा सकता। जब तक व्यवस्था में आमूल परिवर्तन नहीं हो जाता, एक तरह से क्रांति नहीं हो जाती…….."
…….दोस्त ने तड़प के मुझे बीच में ही टोक दिया, “.....तब तक आप उदासीन बुद्धिजीवी बने कॉफी पीते रहेंगे? अपनी जिम्मेदारी टालते रहेंगे, ठूंठ बने रहेंगे! व्यक्तिगत करुणा, सहानुभूति, किसी की मदद कर देना, ममता – कुछ है ही नहीं आपकी डिक्शनरी में? बस, अपनी खुदगर्जी और निकम्मेपन को व्यवस्था पर छोड़ दो……".
मैंने फिर उदासीन दार्शनिक मुस्कान का ब्रह्मास्त्र प्रयोग किया।
xxxxx
दोस्त ने बच्चे को अपने पास बुलाया। वह झिझका-शरमाया। आखिर दोस्त उसे कुछ सहज बना पाने में सफल हो गया।
बच्चे के अनुसार – उसका नाम रामबहादुर है। एक छोटी बहन है। माँ बीमार रहती है। बाप कोठी में चौकीदार है। खूब शराब पीता है। सबको पीटता है। वह मामा के साथ भाग आया।
दोस्त द्रवित हो रहा है। मुझे यह उसकी मूर्खता लगती है। यह सीरियलों वाली ‘आँसू-गिराऊ’ कथा है। सहानुभूति जुटाने का स्टॉक नुस्खा है।
बच्चे को फिर डाँट पड़ी है। वह जल्दी-जल्दी टेबलें साफ करने लगा है।
xxxxx
“मैं इसे सौ रुपये दूंगा।“ दोस्त कहता है।
“क्यों?” मेरे ‘टोन’ में उपहास है।
“इसकी जिंदगी में प्यार-सहानुभूति नाम की कोई चीज नहीं है। इसने सिर्फ डाँट खाई है – मार खाई है। प्यार से दिए गए इस रुपये से जुड़ी इंसानी सहानुभूति जीवन के प्रति इसकी आस्था को मजबूत करेगी। इसे लगेगा, यह किसी मकसद से – किसी के लिए जी सकता है।“
“बिल्कुल गलत,” मैं दोस्त के भोलेपन पर हंसा, “तुम्हारे रुपये देने से इसके अंदर मांगने और उम्मीद करने की प्रवृत्ति बढ़ेगी। दुनिया कोमल भावना नहीं, खुरदुरा यथार्थ है। यह उम्मीद करेगा। उम्मीद टूटेगी तो यह भी टूटेगा – कमजोर पड़ेगा," यह मेरा तर्क था और फिर साथ ही मैंने जोड़ा, “दूसरे- अपने अधिकार शोषण का चरित्र समझ कर, उससे लड़कर लिए जाते हैं, दान में नहीं। दान देकर हम शोषितों को जाहिल, कामचोर, भाग्यवादी और दिमागी तौर पर गुलाम बनाते हैं, उनकी विद्रोह की भावना को कुंद करते हैं – और इस तरह क्रांतिकारी चेतना तथा संघर्षों को टालते-भटकाते हैं।“
दोस्त भी जैसे नहीं समझने की जिद पर अड़ा था, “इस लफ्फाजी की आड़ में, हम अपनी व्यक्तिगत जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड सकते। मुमकिन है कि ये रुपये उसे आगे बढ़ने की ऐसी प्रेरणा दें कि वह एक-एक रुपया जोड़कर स्कूल की किताबें खरीद ले, या फिर अपनी माँ और बहन के लिए पैसा बचाए, सबका सहारा बने, अपना बने – आगे चलकर …….” दोस्त को आशावादी होने की लत है। जरा-जरा सी बात में, उसकी आवाज रुँध जाती है, आँखों में तरल सपने तैरने लगते हैं।
“मुमकिन तो यह भी है कि इस मुफ़्त की खैरात से यह जुआ खेले या सिगरेट-गाँजा पिए। ये लोग ऐसे ही होते हैं – चूंकि ये गरीब हैं, अपढ़ हैं - इसलिए इनमें तमाम बुरी आदतें आ जाती हैं और ये बुराइयाँ इन्हें और नीचे गिराती हैं। दुष्चक्र है यह। ए विशियस सर्किल, यू कांट ब्रेक इट.. होपलैस क्रिएचर्स।“ मैंने कंधे झटके, मुँह बनाया। वह बौद्धिक ही क्या, जो जीवन की हर चीज को शक की, निराशा की नज़र से न देखे! थोड़ा ‘सिनिक’ न हो!
xxxxx
दोस्त ने लड़के को फिर बुलाया। कहा, “अगर तुम्हें सौ रुपये दें तो क्या करोगे?”
लड़का बस दांत कुरेदता रहा, उसे यकीन नहीं था। पढे-लिखों, खाते-पीतों के क्रूर मज़ाक सुनने की इन लोगों की आदत पड़ जाती है।
दोस्त ने द्रवित होते हुए कहा, “बोलो ना!”
यह करुणा की भाषा थी – बच्चे जल्दी समझ जाते हैं। बोला, “मैं पतंग लूँगा।“
बोलते हुए, वह खिड़की से झाँकते आकाश में लहराती पतंग को आँखों में समा रहा था।
xxxxx
कितनी फ़िज़ूल थी हमारी बहस। कितनी बचकाने होते हैं बड़ों के फलसफे और करुणा, अगर यह यह भी न समझ न हो कि –
बस बच्चे के अंदर की पतंग बचानी चाहिए – जूझती-लहराती-ऊंचाई चूमती!
***************

*लंबे समय तक सम्पादन और जन-संचार से जुड़े रहे राजेन्द्र भट्ट अब स्वतंत्र लेखन करते हैं। वह नियमित रूप से इस वेब पत्रिका में लिखते रहे हैं।