भाट न हों हम, बनें न चारण - माँ सरस्वती से प्रार्थना
इस वेबपत्रिका में कुछ ही माह पहले योगेन्द्र दत्त शर्मा की कविताएँ प्रकाशित हुईं थीं जो सभी खूब पसंद की गईं थी हालाँकि उनमें से भी "चक्र घूमेगा कभी " विशेष रूप से सराही गई थी. आज वसंत पंचमी और सरस्वती पूजन के अवसर पर हमें उनकी यह कविता प्राप्त हुई है जिसमें उन्होंने माँ सरस्वती से अद्भुत प्रार्थनाएं की हैं - ऐसी प्रार्थनाएं जो आज हर प्रबुद्ध व्यक्ति की प्रार्थना हो सकती है.
भाट न हों हम, बनें न चारण - माँ सरस्वती से प्रार्थना
योगेन्द्र दत्त शर्मा की सरस्वती वंदना
हंसवाहिनी !
मातु शारदे !
शुभ्र चेतना निर्विकार दे !
श्वेत पद्म, पुलकित शेवंती
बहती रहे पवन वासंती
धरा उर्वरा हो रसवंती
निर्मल गिरा परा, पश्यंती
आतुर कंठों में उतार दे !
मातु शारदे !
जड़ता मिटे, अंधेरा भागे
ज्योतिर्मयी चेतना जागे
मानवता निद्रालस त्यागे
रहे प्रखरता आगे-आगे
कलुष, कालिमा को निखार दे !
मातु शारदे !
राग-रंग-रस-गंध मुखर दे
लय-छंदों के गीत सुघर दे
मधुरिम वाणी, झंकृत स्वर दे
दिशा-दिशा कर जगर-मगर दे
हर मन में भर हरसिंगार दे !
मातु शारदे !
बुद्धि विमल, विद्या निश्छल हो
अंतस्तल भास्वर, उज्ज्वल हो
हर मरुथल निर्मल शाद्वल हो
स्नेह-सिक्त वसुधा चंचल हो
मर्त्य जगत को अमृत-धार दे !
मातु शारदे !
भाट न हों हम, बनें न चारण
करें न सुख-सुविधा-भंडारण
जन के कवि हों, जन-साधारण
रचें काव्य हम कष्ट-निवारण
कर समाप्त मन के विकार दे !
मातु शारदे !
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लेखक कवि और गीतकार हैं। कई लब्धप्रतिष्ठ पत्र-पत्रिकाओं में गीत-नवगीत, ग़ज़ल, कहानी, निबंध व आलेख प्रकाशित हो चुके हैं। आकाशवाणी और दूरदर्शन से रचनाओं का प्रसारण; हाल ही में दो उपन्यास प्रकाशित हुए हैं जिनके बारे में आप यहाँ पढ़ सकते हैं।