शब्दहीनता और अर्थहीनता का समीकरण = शून्यता
डॉ मधु कपूर द्वारा आरंभ की भाषा-दर्शन के सिद्धांतों की चर्चा अब काफी आगे बढ़ चुकी है। जैसा कि हम एक बार पहले भी निवेदन कर चुके हैं, दर्शन या फिलासफी में सरलता से समझ आने वाला शायद कुछ नहीं है। लेकिन अच्छी बात ये है कि डॉ मधु कपूर फिर भी काफी हद तक विषय का प्रस्तुतिकरण रोचक ढंग से कर देती हैं। कुल मिलाकर आप कह सकते हैं कि विषय सरल नहीं भी हो पाया तो सरस तो हो गया। अब आज के लेख का यही वाक्य लीजिए - "भाषा यद्यपि शिक्षण में मदद करती है, पर इसकी सीमा निर्धारित है, क्योंकि वह सत्य को उजागर करने में कोई मदद नहीं करती है, उलटे अपव्याख्या कर श्रोता को दिग्भ्रांत करती है।" तो हुई ना लेख पढ़ने में रुचि! आइए आगे बढ़ते हैं।