सूने कोने और रंग - नन्दिता मिश्र की कविताएँ
नन्दिता मिश्र हमारी वेब-पत्रिका में बहुत सी कहानियों और लेखों से अपना योगदान दे चुकी हैं! अभी पिछले कुछ माह में आपने उनकी लाइब्रेरी, बाबा का मसनद, आखिर क्यूँ, माँ, अंतर्मन का द्वन्द जैसी कई कहानियां पढ़ी होंगी! इस बीच हमें पता चला की नन्दिता जी ने कविताएँ भी लिखीं हैं तो हमने उनसे कविता भेजने का भी आग्रह किया! चूँकि नंदिता जी मूलतः कथाकार हैं. इसलिए आप उनकी इन छोटी-छोटी कविताओं में भी कथ्य ढूंढ सकते हैं. प्रस्तुत हैं उनकी दो कविताएँ!
सूने कोने और रंग - नन्दिता मिश्र की कविताएँ
सूने कोने ...............
आजकल घरों में कोने नहीं होते,
फिर भी घर का हर कोना सूना है ,
किसी की कमीज़, बनियान,
स्कूल बैग, हाकी ,क्रिकेट किट ,
जूते , न जाने कहां गये,
अब वे बेतरतीब बिखरे होंगे, हास्टल में,
किसी पी जी रूम में,
जहां उन्हें कोई नहीं उठायेगा,
लतयाती जायेंगी वो चीज़ें,
जिन्हें पड़ा देख पिताजी चिल्लाते थे,
लानत मलामत करते थे, आंखें तरेरते थे,
मां चुपचाप उठा कर सहेजती थी,
अब वो सब गुज़रा ज़माना हो गया,
वो पढ़ने चला गया,
फिर कमाने निकल जायेगा,
अब कभी कभी आयेगा, मां क्या करे!
उसके मन में एक नहीं, कई कोने हैं,
वे सूने हैं और सूने रहेंगे,
घरों में आजकल कोने नहीं होते,
फिर भी वे सूने होते हैं।
रंग
ये रंग इंद्रधनुष के हैं
मैंने चुराये नहीँ
दान है ये प्रकृति का
मैं भाग्यशाली हूं
मैं इन्हें फैला दूं तो
ये गजब ढाते हैं
छा जाती है खुशी
लाल,नीले, पीले
बैगनी,जामुनी
हरे और नारंगी
रंग बिखर जाते हैं
दुनिया रंगों से भर जाती है
धीरे धीरे समेटने लगूं इन्हें
तो दुनिया सिमटने लगती है
ये रूप मेरा
तभी सार्थक है
जब मुझे आभा मिलती है सूरज से
मेरे रंग उसके
प्रकाश के बगैर
मुखर नहीं....।
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वर्षों आकाशवाणी के समाचार सेवा प्रभाग और केंद्र सरकार के अन्य संचार माध्यमों में कार्य-रत रहने के बाद नन्दिता मिश्र अब स्वतंत्र लेखन करती हैं।