चित्त की तरंगें - काल का भ्रम - गाधि का महास्वप्न
डॉ मधु कपूर की स्वप्न‑श्रृंखला का यह दूसरा लेख पाठक को एक गहन दार्शनिक यात्रा पर ले जाता है और स्वप्न, काल और चेतना के रहस्यमय संबंधों को रेखांकित करता है। लेख में स्वप्न और जाग्रत अवस्थाओं के बीच की सूक्ष्म सीमाओं को माण्डूक्य उपनिषद की दृष्टि से समझाया गया है। इस लेख की विशेषता यह है कि यह भारतीय दर्शन, आयुर्वेद और आधुनिक क्वांटम भौतिकी—तीनों को एक सूत्र में पिरोकर पाठक को यह अनुभव कराता है कि सत्य बाहरी जगत में नहीं, बल्कि भीतर की चेतना में निहित है। स्वप्न और काल का यह रहस्य पाठक को अंत तक बाँधे रखता है और उसे अपने ही जीवन के अनुभवों पर पुनर्विचार करने के लिए प्रेरित करता है। स्वप्न -श्रृंखला का पहला लेख आप यहाँ क्लिक करके पढ़ सकते हैं.
चित्त की तरंगें - काल का भ्रम-गाधि का महास्वप्न
डॉ मधु कपूर
आज मैं अपनी बात पिछले लेख की सम्पादकीय टिप्पणी से शुरू करूँगी, जिसमें सम्पादक द्वारा ‘योगवाशिष्ठ’ का उल्लेख किया था। वस्तुतः यह ग्रन्थ महर्षि वशिष्ठ और वैराग्य-मुखी राम के बीच संवाद है। गाधि नामक एक ब्राह्मण की कठोर तपस्या से प्रसन्न होकर विष्णु उसे वरदान देते हैं कि अब वह जगत के सभी रहस्य को जानने में समर्थ होगा। एक दिन गाधि ने एक विचित्र सपना देखा। उसने नदी में डुबकी लगाई और देखा कि उनका जन्म एक शूद्र जाति में हुआ हैं। वे घूमते-घामते ऐसे नगर में पहुंचते हैं, जहाँ का राजा मर गया है और राजहस्ति उत्तराधिकारी की तलाश में घूम रहा है। हाथी ने गाधि ब्राह्मण को चुना और उन्हें उस राज्य का राजा बना दिया। उन्होंने वहां कई वर्षों तक सुखपूर्वक शासन किया। वर्षों बाद, स्थानीय लोगों को पता चला कि गाधि वास्तव में एक अन्त्यज है। इस बात से दुखी होकर, गाधि के दरबार के मंत्रियों ने आत्मदाह कर लिया। दुखी होकर गाधि ने भी आत्मदाह कर लिया। इस आत्मदाह के क्षण में गाधि की ‘जागृति’ हुई और उन्हें एहसास हुआ कि वे केवल एक सपना देख रहे थे जबकि वे अभी भी अपने आश्रम में तपस्या कर रहे थे।
गाधि ब्राह्मण की कथा में स्वप्न और काल का अद्भुत संयोग दिखाई देता है। ध्यान की अवस्था में गाधि स्वप्नवत् वर्षों का जीवन जी लेते हैं, जिसमें जन्म, मृत्यु, राज्य और विनाश सब घटित होते हैं। बाद में उन्हें ज्ञात होता है कि यह काल और माया का खेल था— यथा स्वप्ने दृश्यते विश्वं तथैवायं कालः — जैसे स्वप्न में जगत दिखता है, वैसे ही काल भी केवल अनुभूति ग्राह्य है, वस्तुतः उसका कोई अस्तित्व नहीं है।
जिस प्रकार गाधि ने अपने मन के संकल्प से राजा बनने का अनुभव किया, उसी प्रकार यह जाग्रत संसार भी मन की एक कल्पना या चित्त की रचना मात्र है, जो कि अज्ञान के कारण वास्तविक लगती है। दोनों अवस्थाएँ ही अंततः चित्त का विस्तार मात्र हैं, परंतु साधक की चेतना में एक सूक्ष्म भेद की सीमा रेखा दिखाई देती है, जो स्वप्नावस्था को जाग्रत अवस्था से पृथक करती है।
माण्डूक्य उपनिषद में चेतना की चार अवस्थाएँ बतलाई गई हैं—जाग्रत, स्वप्न, सुषुप्ति और तुरीय। जाग्रत अवस्था 'बहि:प्रज्ञ' या बहिर्मुखी अवस्था है। इसमें मन इंद्रियों के माध्यम से बाहरी दुनिया के स्थूल पदार्थों का अनुभव करता है, जो पंचभूतों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से बने होते हैं। यह एक साझा यथार्थ जगत है—यहाँ जो मैं देख रहा हूँ, वही आप भी देख रहे हैं। इसमें समय, स्थान और कार्य-कारण का नियम लागू होता है। सुबह जागने पर हमें वही बिस्तर और दुनिया मिलती है, जो सोने के पहले हमने छोड़ी थी। लेकिन स्वप्नावस्था में कुछ भी साझा नहीं होता है, सब कुछ व्यक्तिगत होता है। जाग्रतावस्था का स्थूल संसार वर्तमान का अनुभव कराता है, जो काल और देश की सीमाओं में बंधा हुआ है। स्वप्नावस्था शरीर की वह सूक्ष्मাवस्था है, जिसमें चेतना बाह्य इंद्रियों से अलग होकर मन, बुद्धि, मैं-बोध और चित्त से स्मृति, संस्कार और कल्पना के सहयोग से सक्रिय बना रहता है। स्वप्नावस्था का निर्माण मन और चित्त की गतिविधियों से होता है, जो नए रूपों और प्रतीकों के रूप में सपने में प्रकट होते हैं। सूक्ष्म शरीर स्वप्नावस्था में सतही नहीं, बल्कि गहरे अर्थों से भरा होता है—एक ओर अवचेतन इच्छाओं का प्रतीकस्वरूप, दूसरी ओर आत्मा की अद्भुत रचनात्मक शक्ति का खेल है।
चेतन शक्ति के विभिन्न स्तरों को ध्यान में रखकर स्थूल शरीर, सूक्ष्म शरीर और कारण शरीर की कल्पना भारतीय दार्शनिक करते हैं। जब हमारी 'चेतना' कारण- शरीर के अनुरूप होकर घोर निद्रा में प्रवेश करती है तो इस चेतना को 'सुषुप्तावस्था' कहते हैं। इस अवस्था में मनुष्य की समूची चेतना शक्ति संचित होकर घनीभूत रहती है। इसमें जागरण कालीन सत्ता तथा स्वप्नावस्था दोनों का ही अभाव होता है। सुषुप्तावस्था में चेतना को केवल ‘अज्ञ-भाव’ का बोध रहता है। जैसे गहरी नींद से उठने के बाद हम कहते है, ‘मुझे आज अच्छी नींद आई, बाहर इतना शोर हो रहा था मुझे कुछ भी होश नहीं था।’ जैसा कि एक कहावत भी प्रसिद्ध है ‘घोड़े बेच कर सोना’। यही चेतना कभी जाग्रतावस्था के स्थूल संसार के रूप में, कभी अंतर्जगत के सूक्ष्म संसार अर्थात स्वप्नावस्था में और कभी सुषुप्तावस्था से परिचित कराती है। जिस तरह एक जौहरी सुन्दर तथा कीमती आभूषण में जड़े हुए एक हीरे के विभिन्न पहलूओं को ध्यान में रख कर ही उसका मूल्यांकन करता है, उसी तरह हम चेतना के विभिन्न पहलुओं से अवगत होकर उन्हें परखते हैं।
तीन विविध अवस्थाओं को स्पन्दित करने वाला जीवन-तत्त्व चेतना एक ही है, लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से इनमें सूक्ष्म अंतर होता हैं। स्वप्न के पदार्थ केवल स्वप्न के दौरान ही अस्तित्व में रहते हैं। यहाँ बाह्य इंद्रियाँ सोई रहती हैं, केवल अन्तःकरण सक्रिय रहता है। स्वप्न में न भूमि होती है, न समुद्र, न घोड़ा, न हाथी; बल्कि मन ही अपनी जाग्रत चेतना से प्राप्त सामग्री से सब कुछ सृजन करता है।
शंकराचार्य के अनुसार, जाग्रत अवस्था भी स्वप्न की तरह ही मिथ्या —न तो पूरी तरह सत्य, न तो पूरी तरह असत्य ही होती है। जाग्रत अवस्था तब तक सच लगती है जब तक हम उच्च चेतना यानी तुरीयावस्था में नहीं पहुँच जाते हैं। दोनों ही अवस्थाओं में एक ही "मैं" चेतन साक्षी के रूप में विद्यमान रहता है, जो स्वप्न के अनुभवों को भी देखता है और जागृत के अनुभवों को भी। फर्क सिर्फ इतना है कि स्वप्नावस्था क्षणकालिक होती है और जाग्रतावस्था उसकी तुलना में दीर्घकालिक होती है। पर गाधि का सपना तो उसे पूरी जिंदगी जीने का मौका देता है।
आयुर्वेद चिकित्सा की यदि बात करें तो यहाँ स्वप्नावस्था को शरीर, मन और आत्मा की स्थिति का दर्पण कहा गया है। वात, पित्त, कफ की असंतुलित अवस्था में स्वप्न का आगमन होता है, जो व्यक्ति के अनुभव, इच्छाएँ व संस्कारों से उत्पन्न होता है। चिकित्सक स्वप्नों को देखकर रोग का निदान उनके लक्षणों के अनुसार चिकित्सा करते हैं। आयुर्वेद में स्वप्नों को दृष्ट, श्रुत, अनुभूत, प्रार्थित, कल्पित, भाविक और दोषज सात श्रेणियों में बाँटा गया है, जो कहीं न कहीं हमारे बाह्य अनुभव से जुड़े रहते हैं। हरित संहिता के शारीरस्थान प्रकरण में ‘स्वप्नाध्याय’ मिलता है, जिसमे स्वप्नों को केवल मिथ्या कल्पना नहीं माना गया है, बल्कि उन्हें जीवन की गहरी परतों को उघাड़ने का संकेतक माना गया है।
गाधि ब्राह्मण की कथा इसी सत्य को उजागर करती है कि स्वप्न में हमारा मन ही 'समुद्र' बनाता है और उसमें डुबकी लगाने वाला व्यक्ति भी वही होता है। कहने का तात्पर्य है कि कर्ता और कर्म, भोक्ता और भोग्य, दोनों एक ही चित्त की तरंगे हैं। क्वांटम भौतिकी का सिद्धांत भी यही समर्थन करता है कि जब तक कोई द्रष्टा न हो, कण केवल तरंग के रूप में होते हैं, यानी उनका कोई ठोस रूप नहीं होता। जैसे ही हमारी चेतना इसे ग्रहण करती है, तो यह संसार ठोस बन जाता है।
जिस तरह स्वप्न की दुनिया के हटने पर स्वप्नद्रष्टा विलीन हो जाता है, वैसे ही जाग्रत संसार का 'द्रष्टा' भी सुषुप्ति के बाद 'तुरीयावस्था' पहुँचकर विलीन हो जाता है। यदि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति सिनेमा के पर्दे पर चलने वाले दृश्य हैं, तो 'तुरीय' वह पर्दा है जो तीनों अवस्थाओं में निर्विकार रहता है। गाधि की तपस्या का लक्ष्य केवल स्वप्न देखना नहीं था, बल्कि उस अवस्था तक पहुँचना था जहाँ स्वप्न और जाग्रत की सीमाएं समाप्त हो जाती हैं और केवल 'होने' का बोध शेष रहता है। अत्यাधिक सुख में काल मिनटों की तरह बीत जाता है, और दुख में एक क्षण युग जैसा लगता है। ‘योगवाशिष्ठ’ का यह सूत्र कि 'काल चित्त की वृत्ति मात्र है', आज के सापेक्षता के सिद्धांत की पुष्टि करता है।
अंततः गाधि ब्राह्मण की कथा से पता चलता है कि सत्य 'बाहर' की वस्तुओं में नहीं, बल्कि 'भीतर' की चेतना में है। स्वप्न में राजा बनना या जाग्रत अवस्था में भिखारी बनना, दोनों ही चेतना के सागर में उठने वाले बुलबुले हैं। जिस क्षण 'बोध' का सूर्य उदय होता है, भ्रम का अंधकार मिट जाता है। गाधि का नदी में डुबकी लगाना और एक पूरी जिंदगी जीकर वापस अपनी कुटिया में जागना, चेतना का एक ऐसा अनुभव था जिसने काल और स्थान के भ्रम को तोड़ दिया।
‘योगवाशिष्ठ’ हज़ारों साल पहले यह बता रहा था कि यह जाग्रत संसार भी एक Cosmic Simulation है अर्थात जहाँ धूल-बबंडर, बरसात, ब्लैक होल और गुरुत्वाकर्षण जैसी भौतिक प्रक्रियाओं का यहाँ निर्माण होता हैं। यह ब्रह्माण्ड का आभासी मंच है जो चित्त के परदे पर चल रहा होता है। जिसका अनुभव अक्सर हमें फिल्मों में होता है। ध्यान के कुछ क्षणों में वर्षों का जीवन जी लेना Time Dilation का प्रमाण है, जिसमें दो अलग-अलग प्रेक्षकों के लिए समय अलग अलग गति से बहता हुआ दिखाई देता है—अर्थात किसी एक के लिए घड़ी धीमी चलती है, तो किसी अन्य के लिए तेज चलती है। समय कोई स्थिर नदी नहीं है, बल्कि यह हमारे चेतनवृत्ति से सापेक्ष है।
प्रश्न उठता है कि अगर हमें आज पता चले कि हम इस वक्त जो जिंदगी जी रहे हैं, वह किसी और का देखा जा रहा सपना है? तो हमारी प्रतिक्रिया क्या होगी? यही सोच पाठक को अंत तक बांधे रखती है।
************

डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।