मिशन से व्यवसाय की ओर गतिशील हुई 200 वर्षों की हिंदी पत्रकारिता
इसी माह हिंदी पत्रकारिता के दो सौ वर्ष पूरे होने पर डॉ. शैलेश शुक्ला वर्तमान में पत्रकारिता के परिदृश्य पर और इसके विभिन्न आयामों पर हमारी इस वेब पत्रिका में लेख लिख रहे हैं। उनके पिछले दो लेख आप यहाँ और यहाँ पढ़ सकते हैं। आज का लेख श्रृंखला का तीसरा लेख है जिसमें आपको कुछ बातें तो ऐसी मिलेंगी जो आप पिछले दो लेखों में पढ़ चुके होंगे लेकिन सन्दर्भ अधूरे ना रहें, शायद इसीलिए लेखक ने उन्हें दोहराया होगा। आज के लेख में आप पेड न्यूज, 1990 से शुरू हुए उदारीकरण का पत्रकारिता पर प्रभाव और नई परिस्थितियों में संपादक की बदलती भूमिका जैसे बिंदुओं के बारे में पढ़ेंगे।
मिशन से व्यवसाय की ओर गतिशील हुई 200 वर्षों की हिंदी पत्रकारिता
डॉ. शैलेश शुक्ला
हिंदी पत्रकारिता की दो शताब्दियों की यात्रा केवल समाचारों के प्रकाशन की कहानी नहीं है, बल्कि यह भारतीय समाज, राजनीति, संस्कृति और जनचेतना के विकास का भी इतिहास है। जिस पत्रकारिता ने कभी राष्ट्रजागरण, सामाजिक सुधार और स्वतंत्रता आंदोलन को अपनी प्राथमिकता बनाया था, वही पत्रकारिता आज बड़े उद्योग, बाजार और विज्ञापन आधारित व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी है। यह परिवर्तन अचानक नहीं हुआ, बल्कि समय, तकनीक, राजनीति और आर्थिक संरचना के बदलते स्वरूप के साथ धीरे-धीरे विकसित हुआ। आज जब हिंदी पत्रकारिता अपने दो सौ वर्षों की यात्रा के महत्वपूर्ण पड़ाव पर खड़ी है, तब यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या पत्रकारिता अब भी समाज के लिए मिशन है या वह पूरी तरह व्यवसाय में बदल चुकी है।
हिंदी पत्रकारिता का आरंभ एक सामाजिक दायित्व और राष्ट्रीय चेतना के उद्देश्य से हुआ था। जब पंडित जुगल किशोर शुक्ल ने सन् 1826 में ‘उदन्त मार्तण्ड’ का प्रकाशन शुरू किया, तब उनके सामने आर्थिक लाभ का कोई आकर्षण नहीं था। उस समय पत्रकारिता करना किसी व्यापारिक निवेश की तरह नहीं, बल्कि समाज के लिए तपस्या करने जैसा कार्य था। सीमित साधन, कम पाठक, अंग्रेजी शासन का दबाव और आर्थिक कठिनाइयों के बावजूद प्रारंभिक हिंदी पत्रकारों ने अपने लेखन को जनता की आवाज बनाया। उस दौर में पत्रकारिता का उद्देश्य जनमानस को जागरूक करना, भारतीय भाषाओं को सम्मान दिलाना और सामाजिक कुरीतियों के विरुद्ध चेतना पैदा करना था।
भारतेन्दु हरिश्चंद्र, बालमुकुंद गुप्त, प्रतापनारायण मिश्र और गणेश शंकर विद्यार्थी जैसे पत्रकारों ने हिंदी पत्रकारिता को केवल सूचना का माध्यम नहीं रहने दिया, बल्कि उसे सामाजिक परिवर्तन का औजार बनाया। हिंदी पत्रकारिता ने बाल विवाह, छुआछूत, स्त्री शिक्षा, विदेशी शासन और सामाजिक असमानताओं के विरुद्ध जनमत तैयार किया। स्वतंत्रता आंदोलन के समय तो पत्रकारिता ने आंदोलनकारी की भूमिका निभाई। अनेक समाचार पत्रों पर प्रतिबंध लगे, संपादकों को जेल हुई, आर्थिक संकट आए, लेकिन पत्रकारिता अपने मिशन से पीछे नहीं हटी। उस समय का पत्रकार अपने लेखन को राष्ट्रसेवा का माध्यम मानता था।
स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद हिंदी पत्रकारिता के सामने नई चुनौतियाँ आईं। अब संघर्ष विदेशी शासन के विरुद्ध नहीं, बल्कि लोकतंत्र को मजबूत करने, सामाजिक न्याय स्थापित करने और विकास की दिशा तय करने का था। शुरुआती दशकों में पत्रकारिता ने लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। समाचार पत्रों की विश्वसनीयता ऊँची थी और संपादकों का समाज में नैतिक प्रभाव दिखाई देता था। संपादक केवल संस्थान के कर्मचारी नहीं, बल्कि वैचारिक नेतृत्वकर्ता माने जाते थे। उनके लेखों से सरकारें प्रभावित होती थीं और जनता दिशा प्राप्त करती थी।
लेकिन धीरे-धीरे परिस्थितियाँ बदलने लगीं। तकनीकी विकास, मुद्रण व्यवस्था में परिवर्तन और बढ़ती बाजार व्यवस्था ने पत्रकारिता के स्वरूप को प्रभावित किया। जैसे-जैसे समाचार पत्रों का प्रसार बढ़ा, वैसे-वैसे विज्ञापन उनका मुख्य आर्थिक आधार बनने लगे। यहीं से पत्रकारिता में व्यवसायिक सोच का प्रवेश हुआ। पहले समाचार पत्र पाठकों के भरोसे चलते थे, बाद में वे विज्ञापनों के भरोसे चलने लगे। पाठक धीरे-धीरे केंद्र से हटता गया और विज्ञापनदाता केंद्र में आ गया।
1990 के दशक में आर्थिक उदारीकरण के बाद यह परिवर्तन और तेज हो गया। निजी पूंजी का विस्तार हुआ, मीडिया समूह बड़े कॉरपोरेट संस्थानों में बदलने लगे और समाचार को भी उत्पाद की तरह प्रस्तुत किया जाने लगा। प्रतिस्पर्धा इतनी बढ़ी कि समाचार पत्रों और समाचार चैनलों ने पाठकों और दर्शकों को आकर्षित करने के लिए सनसनी, मनोरंजन और उत्तेजना को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया। पत्रकारिता का उद्देश्य सूचना देना कम और ध्यान खींचना अधिक हो गया। खबरों का चयन भी जनहित के बजाय बाजारहित के आधार पर होने लगा।
आज हिंदी पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा टीआरपी, क्लिक, विज्ञापन और ब्रांड प्रबंधन की दौड़ में शामिल दिखाई देता है। समाचार चैनलों पर गंभीर विमर्श की जगह शोरगुल, आरोप-प्रत्यारोप और उत्तेजक बहसों ने ले ली है। समाचार पत्रों में भी कई बार जनसरोकारों की खबरों से अधिक स्थान ग्लैमर, मनोरंजन और प्रचारात्मक सामग्री को मिलने लगा है। ग्रामीण भारत, किसान, मजदूर, शिक्षा, स्वास्थ्य और स्थानीय समस्याएँ अक्सर मुख्यधारा की प्राथमिकताओं से बाहर दिखाई देती हैं। इसका कारण स्पष्ट है कि इन विषयों से बाजार को वैसा लाभ नहीं मिलता जैसा राजनीति, अपराध या मनोरंजन आधारित सामग्री से मिलता है।
पत्रकारिता में बढ़ती कॉरपोरेट संस्कृति ने संपादकीय स्वतंत्रता को भी प्रभावित किया है। कई मीडिया संस्थानों के मालिक बड़े उद्योग समूह हैं, जिनके अपने आर्थिक और राजनीतिक हित होते हैं। ऐसे में पत्रकारिता की निष्पक्षता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। कई बार समाचार और विज्ञापन के बीच की सीमा धुंधली हो जाती है। ‘पेड न्यूज’ जैसी प्रवृत्तियों ने पत्रकारिता की विश्वसनीयता को गहरी चोट पहुँचाई है। चुनावों के समय विशेष नेताओं या दलों के पक्ष में समाचार प्रकाशित करने के आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहे हैं। इससे जनता का भरोसा कमजोर हुआ है।
डिजिटल क्रांति ने हिंदी पत्रकारिता को एक नई दिशा भी दी और नई चुनौतियाँ भी पैदा कीं। इंटरनेट और सामाजिक माध्यमों के आगमन के बाद सूचना का प्रवाह अत्यंत तेज हो गया। अब हर व्यक्ति मोबाइल फोन के माध्यम से समाचार प्राप्त कर सकता है। इससे हिंदी पत्रकारिता का विस्तार तो हुआ, लेकिन प्रतिस्पर्धा और अधिक तीव्र हो गई। सबसे पहले खबर देने की होड़ में कई बार तथ्यों की पुष्टि की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है। अपुष्ट सूचनाएँ, भ्रामक शीर्षक और आधी-अधूरी खबरें तेजी से प्रसारित होने लगती हैं। इससे पत्रकारिता की विश्वसनीयता पर संकट गहराया है।
इसके बावजूद यह कहना उचित नहीं होगा कि हिंदी पत्रकारिता पूरी तरह अपने मिशन से भटक चुकी है। आज भी अनेक पत्रकार, छोटे समाचार पत्र, वैकल्पिक मीडिया मंच और डिजिटल पोर्टल जनसरोकारों की पत्रकारिता कर रहे हैं। अनेक पत्रकार जोखिम उठाकर भ्रष्टाचार, सामाजिक अन्याय, पर्यावरण विनाश और सत्ता के दुरुपयोग के मामलों को सामने ला रहे हैं। कई स्वतंत्र पत्रकार सीमित संसाधनों में भी समाज की वास्तविक समस्याओं को उठाने का प्रयास कर रहे हैं। यह हिंदी पत्रकारिता की सकारात्मक आशा है।
समस्या वास्तव में संतुलन की है। किसी भी समाचार संस्था को चलाने के लिए आर्थिक संसाधनों की आवश्यकता होती है। इसलिए व्यवसाय होना गलत नहीं है। गलत तब होता है जब व्यवसाय पूरी तरह पत्रकारिता के मूल उद्देश्य पर हावी हो जाए। यदि लाभ कमाने की दौड़ में सत्य, निष्पक्षता और जनहित की उपेक्षा होने लगे, तो पत्रकारिता का मूल चरित्र कमजोर पड़ जाता है। पत्रकारिता केवल उद्योग नहीं हो सकती, क्योंकि उसका संबंध सीधे लोकतंत्र और समाज की चेतना से है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हिंदी पत्रकारिता अपने ऐतिहासिक दायित्व को पुनः समझे। उसे यह स्मरण रखना होगा कि उसकी सबसे बड़ी पूंजी जनता का विश्वास है। यदि यह विश्वास टूट गया, तो तकनीक, पैसा और बड़े भवन भी पत्रकारिता को सम्मान नहीं दिला सकते। पत्रकारिता को फिर से जनसरोकारों की ओर लौटना होगा। गाँव, किसान, युवा, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, पर्यावरण और सामाजिक न्याय जैसे मुद्दों को प्राथमिकता देनी होगी। पत्रकारिता को सत्ता और बाजार दोनों से समान दूरी बनाकर चलने की नैतिक शक्ति विकसित करनी होगी।
पत्रकारिता संस्थानों में भी संपादकीय स्वतंत्रता को मजबूत करना आवश्यक है। पत्रकारों को केवल कर्मचारी नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी निभाने वाले सामाजिक प्रतिनिधि के रूप में देखा जाना चाहिए। पत्रकारिता शिक्षा में भी नैतिकता, संवेदनशीलता और सामाजिक दायित्व पर विशेष बल देने की आवश्यकता है। केवल तकनीकी दक्षता से अच्छा पत्रकार नहीं बनता, उसके भीतर समाज के प्रति संवेदना और सत्य के प्रति प्रतिबद्धता भी होनी चाहिए।
हिंदी पत्रकारिता की दो सौ वर्षों की यात्रा गौरव और आत्ममंथन दोनों का अवसर है। यह यात्रा हमें बताती है कि पत्रकारिता ने कभी समाज को दिशा दी थी, स्वतंत्रता आंदोलन को ऊर्जा दी थी और जनचेतना को जागृत किया था। आज आवश्यकता इस बात की है कि वह बाजार की चमक के बीच अपने मूल उद्देश्य को न भूले। व्यवसाय आवश्यक हो सकता है, लेकिन पत्रकारिता की आत्मा हमेशा इसके उदात्त उद्देश्यों से ही जुड़ी रहनी चाहिए। यदि हिंदी पत्रकारिता इस संतुलन को बनाए रखने में सफल होती है, तो वह आने वाले समय में भी लोकतंत्र की सशक्त प्रहरी बनी रहेगी।
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डॉ. शैलेश शुक्ला | Dr. Shailesh Shukla
वैश्विक समूह संपादक, सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह | Global Group Editor, Srijan Sansar Group of International Journals
सलाहकार संपादक, नईदुनिया एवं गौड़सन्स टाइम्स | Consulting Editor, NaiDunia & GaurSons Times
आशियाना, लखनऊ - 226012, उत्तर प्रदेश | Ashiyana, Lucknow – 226012, Uttar Pradesh
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