कथ्य सेतु भी है और अवरोध भी - भाषा-दर्शन कड़ी का अंतिम लेख
आजकल डॉ मधु कपूर के भाषा-दर्शन पर लेखों लिख रही हैं। इस कड़ी में आपने पिछले दिनों संवाद, भाषा और तत्त्वबोध, अस्तित्व, चेतना और भाषा की अद्भुत लीला : कश्मीर शैवागम, शब्दहीनता और अर्थहीनता का समीकरण = शून्यता, और दो शब्दों के बीच शून्य स्थान की अहमियत जैसे लेख पढ़े हैं। प्रस्तुत है भाषा-दर्शन पर लेखों की कड़ी में उनका अंतिम लेख!
कथ्य सेतु भी है और अवरोध भी - भाषा-दर्शन कड़ी का अंतिम लेख
डॉ मधु कपूर
मैं रास्ते से गुजर रही थी, तो सामने क्या देखा ̶ दो व्यक्ति आपस में झगड़ रहे थे. पहला व्यक्ति दूसरे से कोई फ़िल्मी डायलाग के लहजे में कह रहा था, “कुत्ते! मैं तेरा खून पी जाऊंगा!” मैंने सोचा यह ‘कुत्ते का खून’ पीने की धमकी दे रहा है. क्या यह दूसरा व्यक्ति सचमुच में कुत्ता है? असली कुत्ते से क्या कोई ऐसी बात कहने की हिमाकत कर सकता है? और यदि कह भी दे तो क्या कुत्ता समझेगा? जो कहना था या जो वह कहना चाहता था, वह कह नहीं पाया, जो कहा गया, वह समझा नहीं गया, जो समझा गया वह कहीं मन की गहराई में दबा रह गया और उसे भाषा द्वारा समझाया नहीं जा सका.
इस तरह जो भाषा हम बोलते हैं, वह एक मृत इकाई है. इसमें ‘मीठा’ कहने से मुंह मीठा नहीं होता है, ‘चाकू’ कहने से मुँह नहीं कट जाता है और ना ही ‘आग’ कहने से मुंह जलता है. इसलिए बोली हुई भाषा में सच्ची कहानी मत खोजे. ‘कुत्ता’ एक पशु है, जो काटता है, भौंकता है, पैर भी चाटता है. इन अर्थों की बंदिशों को पार करके शब्द के निर्धारित अर्थ से जब हम कुछ अतिरिक्त कहना चाहते हैं, तो इस तरह शब्दों का प्रयोग करते हैं. जैसे ‘दिल बल्लियों उछलने लगा’ जो आनंद की अनुभूति को दर्शाता है. ‘थोथा चना बजे घना’, अहंकार की अभिव्यक्ति करता है.
तो आज जो मैं भाषा का किस्सा कहूँगी वह किसी भी सृजनशील शिल्प और कला पर लागू होता है. चाहे वह वर्णमाला हो, चाहे रंगों का खेल हो, चाहे सुरों का मेल हो, चाहे नृत्यमुद्रा ही हो, जहाँ तथाकथित व्याकरण के नियम और आभिधानिक अर्थों से अलविदा लेनी पड़ती है. ‘कुत्ता’ कहने वाले व्यक्ति के लिए कुत्ता महज एक शब्द रह गया है, उसका गुस्सा, कोश-में उल्लिखित, ‘कुत्ता’ शब्द अपने नाम और रूप से विदा ले चुका है. वह ऐसा कुछ सत्य खोज रहा है, जिसे वह व्यक्त करना चाहता है, पर उसे शब्द नहीं मिलते हैं, तो वह ‘कुत्ता’ नाम के परिचित शब्द से काम चला कर अपने गुस्से की बौछार कर देता है.
भाषा की सबसे गहरी परत को भारतीय दर्शन में ‘पश्यन्ती’ कहा जाता है, जहाँ शब्द और अर्थ एकदम असंपृक्त अवस्था में रहते है, और वर्णात्मक भाषा फूट कर बाहर निकल नहीं पाती है. शोक, क्रोध और प्रेम की यह भावात्मक भाषा है. धीरे धीरे इस स्थिति से उबर कर मध्यमा-भाषा स्तर का उदय होता है, जो वर्णात्मक वाक् की चादर ओढ़े ‘क्षोभ, प्रेम, कष्ट’ इत्यादि अनुभूतियों को शब्दों के माध्यम से स्पष्ट करने लगती हैं, जो विषय-विषयी रूप में विभक्त हो जाती है. फिर यही सूक्ष्म भाषा बैखरी के रूप में मुख से बिखर पड़ती है, जो हम दूसरों तक पहुँचाने में सक्षम हो जाते है. यद्यपि दूसरों की अनुभूतियों को हम ग्रहण तो कर लेते है, पर उसके गहन भाव तक हम पहुँच नहीं सकते हैं. वक्ता और श्रोता के बीच इस खाई को पाटने का काम कोई भी भाषा-सेतु नहीं कर सकता है.
इस तरह वर्णात्मक भाषा अनुभूति की भाषा को वस्त्र पहनाने का कार्य करती है, जो कहीं गहरे में छिपी रहती है. अर्थात अंतर में छिपी इस भाषा का अनुवाद हम कभी वर्ण, कभी कलाकृति, कभी कविता, कभी सुर, कभी रंग इत्यादि के माध्यम से उजागर करते हैं. यहाँ बना बनाया कुछ नहीं होता, सब कुछ बन रहा होता है, जो हमारे अन्दर घट रहा है. हाईडेगर के शब्द उधार लेकर कहूँ तो भाषा हमारा घरौंदा है, जिसमें हम निवास करते हैं. दृष्टान्तस्वरूप "कुआঁ" शब्द एक मृत रूपक है, लेकिन ‘उसे बचाओ, वह कुएँঁ में कूद पड़ा है.’—यह वाक्य कुएँঁঁ में नई जान फूंक कर श्रोता को आगाह कर देता है,
जिस तरह घोंघा कभी-कभार अपने खोल से बाहर निकल कर रेंगने लगता है, और दुनिया के साथ अपना सम्बन्ध कायम करता है. पर ऐसा करके वह दुनिया के साथ कोई पहली बार नहीं जुड़ता है, क्योंकि यह रिश्ता तो पहले से ही उसके खोल के अंदर था, जिसमें वह सुकून महसूस करता था. इसी तरह वक्ता जब बोलता है, तो खुद को बोलते हुए भी सुनता है, और बोलने के पहले भी अन्तर्निहित भाषा को सुनता है. जिस तरह किसी विवादास्पद विषय पर बात करते समय हम केवल वही नहीं सुन रहे होते जो हम कह रहे हैं या दूसरा पक्ष कुछ कह रहा है, बल्कि उसे भी सुन रहे होते हैं, जो हमारे भीतर बैठा वक्ता बोल रहा होता है, बाहरी वक्ता तो महज एक स्थूल वक्ता होता है.
साधारणत हमारी धारणा है कि भाषा का कार्य सूचनाओं का तथ्यगत सम्प्रेषण करना होता है. लेकिन कोई भी सृजनशील लेखन व्याकरणिकता की सीमा का अतिक्रमण कर नए नए शब्दों और अर्थों को गढ़ता है, जिसका उद्देश्य सौंदर्य संतुष्टि के साथ साथ स्वयं को उपलब्धि करने की चाह भी रहती है. अगर किसी व्यक्ति में कलाकार बनने की ललक है, तो इसकी वजह यह है कि उसे खुद को खोजने की अभिलाषा है. कला के माध्यम से वह जीवन की सम्भावनाओं को, संघर्षों को, जीवन-मृत्यु के रहस्यों को कुछ विश्वसनीय तरीके से खोजने की आवश्यकता को महसूस करता है. कलाकार के लिए भाषा कोई इतिहास का तथ्यात्मक दस्तावेज़ नहीं होता है, उल्टे उन ऐतिहासिक तथ्यों को मुआवज़े सहित कला के रूप में वापस करना होता है. उदाहरण के लिए हिटलरकालीन घटनाओं को साहित्य या फिल्म किसी भी कला के माध्यम से धरोहर के रूप में सुरक्षित करना एक आत्मिक 'प्रतिक्रिया' है.
ऑस्टिन के सम्बन्ध में पहले ही कहा जा चुका है कि भाषा उनके लिए एक क्रियात्मक सत्ता है, जिसकी प्रासंगिकता उसके प्रयोग काल में ही विचारणीय होती हैं. जबकि हाईडेगर भाषा के माध्यम से अस्तित्व के सृजनशील सत्य-स्वरूप-को उद्घाटित करने में सचेष्ट होते हैं. यह भाषा पहले से ही हमारे अस्तित्व में मौजूद होती है, हम सिर्फ उसे विभिन्न माध्यमों से उजागर करते हैं. हमारी बातचीत की भाषा इस तरह संवाद में सहायक होकर भी उथली ही रह जाती है. जैसा कवयित्री गगन गिल कहती हैं ᅳ
शब्द
जो कहना था मुझे
तुम्हारे कान में
जिसे उतरना था
तुम्हारे भीतर
उड़ गया आसमानों में.
असल में कवि जो कहना चाहता है, वह अनकहा ही रह जाता है, और भाषा कुछ कहने की ईमानदारी से भी वंचित रह जाती है. वस्तुतः भाषा का कार्य मूर्त वस्तु को अमूर्त बनाना होता है, उदाहरण स्वरूप बाहरी दुनिया में स्थित मूर्त पेड़ अपनी विशिष्टता खोकर ‘पेड़’ नाम के द्वारा अमूर्त हो जाता है, और वह सामान्य रूप से किसी भी पेड़ के लिए प्रयुक्त होने लगता है. लेकिन जब कवि कुँवर नारायण अपनी कविता ‘एक वृक्ष की हत्या’ में कहते है:
“अबकी घर लौटा तो देखा वह नहीं था—
वही बूढ़ा चौकीदार वृक्ष
जो हमेशा मिलता था घर के दरवाज़े पर तैनात” तो वे उस नामरूपात्मक जगत से मानो पेड़ को विदा कर उसमें अन्य अर्थ आरोपित कर देते है. पिंजड़े में बंद पक्षी और आकाश में उड़ती चील की उड़ान की तरह दोनों ही हमारे चित्त की स्थितियों के दो प्रतीक है. भाषा के कारागृह में बंद हम सत्य के मुक्त आकाश में उड़ने से वंचित रह जाते है. दूसरी तरफ हम शब्दों के पंख लगा कर आकाश में उड़ते हुए पक्षी की तरह अपने पदचिह्न भी नहीं छोड़ते हैं, और न उड़ान का कोई मार्ग ही बनाते है. सृष्टि-सत्य का भी ऐसा ही एक आकाश है, जो मुक्त होता है, उसके पीछे कोई पदचिह्न नहीं बनते हैं. इसलिए सत्य के बंधे-बंधाये मार्ग की तलाश व्यर्थ है, जो हमेशा अनहोना, अविश्रुत, सर्वथा अपरिचित रह जाता है. कवि गुरु रवीन्द्रनाथ के शब्दों में:
आकाशे तो आमी राखि नाहि मोर
उड़िबार इतिहास तबू उड़े छिनु
ऐई मोर उल्लास. (यद्यपि आकाश में मैंने अपने पैर नहीं कभी रखे, तथापि आकाश में उड़ने का उल्लास मैं छोड़ नहीं पाया.)
निस्संदेह सृजन की भाषा का आधार जीवन की गतिविधियाँ ही है. इसी नींव पर कला की दीवार, खिड़कियाँ, दीवारें और छतें बनती हैं; लेकिन बुनियाद मिट्टी के नीचे दबी रहती है, जो अपने आप में एक भाषा है. इस तरह भाषा जीवन का लेखा जोखा नहीं है, बल्कि उन भावों के साथ अपने अस्तित्व का उद्गाता भी है. वह खोखली बाँसुरी में फूँक भरने का कौशल मात्र है, जो भावों का प्रक्षेपण करती है, और ध्वनि के माध्यम से सुर प्रकट करती है. सृजन सुन्दर खोजता है— राजा के महल में भी, रंक की झोपडी में भी, जो मस्तिष्क की वस्तु नहीं, हृदय की वस्तु है, जहाँ ज्ञान और भाषा ‘गूंगे के गुड़’ की तरह अर्थ बतलाने में असफल हो जाते हैं.
तो कहना न होगा कि भाषा तथ्य प्रकट करने की अपेक्षा छिपाने का काम बेहतर ढंग से करती है. कवि उदयन वाजपेयी के शब्दों में इस लेख का समापन करना चाहूँगी:
हर सुबह तुम आँखों में छिपाती हो आँसुओं को,
आँसुओं में छिपाती हो टूटे नक्षत्रों को
जिन्हें तुमने बीना था अकेलेपन के समुद्र तट पर एक शाम.
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ हुआ है।