स्वप्न: चेतना का विस्तार और अचेतन की प्रतिध्वनि
दर्शनशास्त्र की विश्वविद्यालयी या अकादमिक पढ़ाई में हमें पता नहीं कि 'योग वशिष्ठ' नामक ग्रन्थ का ज़िक्र आता है या नहीं किन्तु बहुत वर्ष पहले हमने जब कहीं सुना कि यह बहुत उच्च कोटि का धार्मिक ग्रन्थ है जिसमें कई महत्वपूर्ण प्रस्थापनाएं की गईं हैं तो हमने भी शौक-शौक में इसे ले लिया. थोड़ा-बहुत पढ़ने के बाद लगा कि यह हमारे वश की बात फिलहाल तो नहीं है, बाद में कभी देखेंगे. बहरहाल, वो बात तो आई-गई हो गई या शायद यूँ कहें कि पूरी तरह आई-गई नहीं हुई क्योंकि योग-वशिष्ठ में एक बात बार बार आ रही थी जिसका तात्पर्य कुछ इस प्रकार था कि स्वप्न-जगत् के समान यह जगत् भी आभासमात्र है। हमारी वेब-पत्रिका में पचास के आस-पास दार्शनिक निबंध लिख चुकीं डॉ मधु कपूर ने अपना लेख भेजते हुए जब यह सूचित किया कि वह dream-sequence जैसी कोई श्रृंखला शुरू कर रहीं हैं तो हमें सीधे योग वशिष्ठ की याद आई जिसमें कई प्रसंगों में संसार को एक जाग्रत स्वप्न के रूप में समझाया गया है। अब डॉ मधु कपूर इस किश्ती को किस तरफ ले जाएँगी, यह कहना तो अभी मुश्किल है लेकिन स्वप्न-श्रृंखला का पहला निबंध आपके लिए प्रस्तुत हैं. पत्रिका से जुड़ रहे नए पाठकों को बता दें कि यदि उन्हें दर्शनशास्त्र में रूचि है तो डॉ मधु कपूर के नाम पर क्लिक करके उनके सभी निबंध एक साथ देख सकते हैं.
स्वप्न: चेतना का विस्तार और अचेतन की प्रतिध्वनि
डॉ मधु कपूर
स्वप्नकालीन अवस्था सबसे रहस्यमयी मानसिक अवस्था होती है, जिसमें हम अपने शरीर को बिस्तर पर शिथिल छोड़कर विचित्र अनुभूतियों, क्रियाओं, भावनाओं से गुजरते रहते हैं। यद्यपि घटनाओं की प्रतीति वास्तव लगती है, पर जागने पर हमें महसूस होता है कि हम किसी वैकल्पिक वास्तविकता से वापस आए है। सपनों का मूल स्वरूप क्या है, इनके क्या अर्थ होते हैं? हमारा भौतिक जगत किस प्रकार शारीरिक नींद के दौरान मस्तिष्क की गतिविधियों से सम्बन्धित रहता है— ये सभी प्रश्न बराबर हमसे जवाव मांगते हैं। कारण हम सपनों में वही करते है जो वास्तव जीवन में करते हैं, फिर भी सपनों को ‘भ्रमज्ञान’ की परिधि में रखा जाता अथवा दैवीय आदेश भी माना जाता है। पश्चिमी दर्शन के इतिहास में, स्वप्न को अब किसी रहस्यमय ब्रह्मांड विज्ञान का हिस्सा न मानकर उसमें छिपे गूढাर्थ को खोलने का प्रयास किया जाता है। उदाहरण के लिए, नींद के दौरान, शरीर एक कठपुतली की तरह होता है, जिसकी डोर अवचेतन मस्तिष्क की अकल्पनीय स्मृति के पुस्तकालय से बंधी रहती है। मन के पात्र में संचित स्मृतियाँ जब किसी संकेत से छू जाती हैं, तो वे सुप्त स्मृतियों को जाग्रतकर स्वप्न रूप में प्रकट हो जाती है, जिस तरह किसी पुराने भारी पात्र में हल्की-सी चोट लगने पर भीतर का स्वर गूँज उठता है।
सपने हमारी चेतना के अंश होते हैं, जो मस्तिष्क की स्नायु तंत्रिकाओं की गतिविधियों से एक ऐसी दुनिया का निर्माण करते हैं, जिसमें तुलनात्मक रूप से जाग्रत अवस्था से कोई भेद नज़र नहीं आता है। अपने ग्रंथ “The Meditations” में देकार्ते निश्चित ज्ञान के सन्दर्भ में कहते हैं कि यद्यपि उन्हें इस बात का पूरा यकीन है कि वे एक सर्दी की रात बैठे आग ताप रहे हैं, लेकिन जागने पर उन्हें पता चलता है कि वे केवल स्वप्न देख रहे थे। अब वे कैसे विश्वास करें कि जो देखा वह वास्तव नहीं था? तो फिर जिसे हम वास्तव कहते है वह भी स्वप्न की तरह भ्रम हो सकता है? स्वप्नकाल के दौरान जैसे हमें यह अहसास नहीं होता है कि हम स्वप्न देख रहे हैं, वैसे ही तथाकथित वास्तव ज्ञान के क्षेत्र में मेरे पास ऐसा कोई प्रमाण नहीं है जो दावा करे कि वह स्वप्न नहीं है?
दार्शनिक आमतौर पर यह खोजने की कोशिश करते हैं कि सपनों को जाग्रत जीवन से कैसे पृथक किया जाए? संत ऑगस्टीन का कहना है चूँकि सपनों में कोई शारीरिक गतिविधियां नहीं देखी जाती है, कोई निर्णय लेने की क्षमता नहीं होती है इसलिए स्वप्न में घटी घटनाओं का कोई नैतिक मूल्यांकन नहीं हो सकता है। मैं सपना देखता हूँ कि ‘मैं उड़ रहा हूँ” लेकिन वास्तव में मैं बिस्तर पर ही पड़ा रहता हूँ। सब कुछ हमारी इच्छा के बिना घटित होता रहता है। जबकि जाग्रत अवस्था में यदि कोई व्यक्ति किसी को नुक्सान पहुंचाता है तो उसे उसका जिम्मेदार माना जाता है।
फ्रायड ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक "The interpretation of dreams” में सपनों का वैज्ञानिक और मनोवैज्ञानिक आधार प्रस्तुत कर स्वप्नों के सभी भ्रमजाल पर सेंध लगा दी। फ्रायड का मूल मंत्र था कि "हर सपना एक दबी हुई इच्छा की पूर्ति है" जो बातें हम समाज या नैतिकता के डर से जाग्रत अवस्था में नहीं कह पाते हैं, हमारा मन उन्हें सपनों के माध्यम से पूरा कर लेता है। फ्रायड ने सपनों को, इसलिए, Royal Road to the Unconscious कहा है अर्थात सपने हमें अपने अवचेतन मन को समझने की चाबी पकड़াते हैं। फ्रायड अपनी पुस्तक के पहले अध्याय में फ्रांसीसी भौतिक विज्ञानी अल्फ्रेड मौरी की चर्चा करते हुए कहते है कि वे कुछ समय तक फ्रांसीसी क्रांति में भाग लेने का सपना देखते थे, जिसके बाद उन्हें जबरन गिलोटिन पर ले जाया जाता है। सपने में जब गिलोटिन का तख़्ता उनकी गर्दन पर गिरने वाला था, वे जाग गए। इस प्रकार मॉरी का सपना एक प्रकार का इच्छा-पूर्ति वाला सपना हो सकता है।
फ्रायड अपनी मनोविश्लेषण पद्धति के माध्यम से मानसिक रोगियों की समस्याओं का इलाज करने के लिए free association पद्धति का प्रयोग करते थे, जिसमें स्वप्नों की व्याख्या करना भी शामिल होता था। सपनों की खिड़की से रोगी के अवचेतन मन में झांकना सहज होता है, क्योंकि नींद के दौरान मन बाहरी दुनिया से अलग होकर सहज प्रवृत्तियों से प्रेरित होता रहता है। सपने उसी प्रवृत्ति का प्रतिफलन होते हैं।
वे मन की गतिविधियों को क्रमशः इड (id), ईगो (ego) और सुपर-ईगो (super-ego) में विभाजित करते हैं अर्थात अवचेतन, चेतन और अति-चेतन । इड मन का पूरी तरह से अवचेतन भाग है, जो अराजक, आक्रामक, अव्यवस्थित होता है, जिस पर हम नियंत्रण नहीं कर सकते, बल्कि इसे व्यवस्थित रूप से दबाने का प्रयास हम करते हैं। जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, उसकी सहज आवश्यकताओं का नियंत्रण सुपर-ईगो के हाथ में चला जाता है। ego अधिकांशत चेतन होता है। उसे id और superego के बीच के संघर्ष को संतुलित करना पड़ता है। अर्थात जिन इच्छाओं को पूरा करने पर व्यक्ति और समाज की क्षति नहीं होती है, उसे ही पूरा करने का प्रयास इगो करता है। जैसे गुस्सा आने पर इड की आक्रामक प्रवृत्ति व्यक्ति की खून करने की इच्छा को जगा सकती है, जिसे सुपर इगो नैतिकता की दुहाई देकर रोकता है और व्यक्ति हत्या करने की इच्छा का दमन कर लेता है। लेकिन मन की यह प्रवृत्ति सपने में किसी अन्य रूप में प्रकट होकर उसे संतुष्ट कर देती है।
सपने अत्यन्त जटिल होते हैं, जो एक ओर व्यक्ति की इच्छा को पूरा करता है, वहीँ दूसरी ओर उसे छिपाने के लिए प्रतीकों का सहारा लेते हैं। जैसे सपने में किसी सुरंग से गुजरती ट्रेन में यात्रा करने का अर्थ हो सकता है अप्रत्यक्ष रूप से किसी कठिनाई से निकलने का रास्ता बनाना। यद्यपि प्रतीकों के अर्थ इतने सरल नहीं होते है, व्यक्ति की परिस्थितियों के अनुकूल उनके अर्थ बदल जाते है। हम इड की इच्छाओं को सीधे रूप से सपने में अनुभव नहीं करते हैं, जैसे शत्रु को पराजित करने की आक्रामक इच्छा को खेल की प्रतियोगिता में जीत हासिल कर पूरा कर लेते हैं। इस तरह व्यक्ति अपना मानसिक संतुलन बनाए रखता है। स्वप्न, इस अर्थ में, हमारी नींद के रक्षक कहे जाते हैं। रोजमर्रा के जीवन में हम देखते हैं उच्च पदस्थ बॉस का गुस्सा अक्सर कर्मचारी अपने नीचे स्तर के कर्मचारी पर निकाल कर शांत कर लेते हैं।
फ़्रायड अपने एक सपने का उदाहरण देते हैं, जिसमें वे एक मरीज़ को ठीक न कर पाने के कारण गहरे अपराधबोध से ग्रस्त थे। इस अपराधबोध को सीधे स्वीकार करने के बजाय, उनके स्वप्न ने इसे प्रतीकात्मक रूप से रूपांतरित किया—उन्होंने दोष उस साथी डॉक्टर पर डाल दिया जिसने इंजेक्शन लगाया था और जिसके कारण मरीज़ संक्रमित हो गया था। इस तरह फ़्रायड की अपराधबोध से मुक्त होने की इच्छा का शमन हुआ।
फ्रायड की तरह, उनके मित्र और बाद में बाद में उनके विरोधी C.G. Jung, जो स्वयं एक मनोविश्लेषक थे, का भी मानना था कि स्वप्न विश्लेषण अचेतन मन के बारे में ज्ञान प्राप्त करने का एक प्रमुख तरीका तो है, लेकिन फ्रायड जहाँ स्वप्न को बचपन के अनुभवों, अतीत में झांकने, यौन इच्छाओं के सन्दर्भ में व्याख्या करते हैं, वहीँ जुंग का मानना था कि सामूहिक अवचेतन मन स्वप्न में विशेष रूप से प्रकट होता है, जिन्हें वे आद्यरूप (archetype) कहते हैं, अर्थात उसे वे अपनी संस्कृति से जोड़कर देखते हैं जिसमे भविष्य की संभावनाएँ छिपी रहती है। एक व्यक्ति स्वप्न में अंधकारमय वन में भटकता हुआ अचानक किसी वृद्ध पुरुष को देखता है और उससे मार्ग दर्शन प्राप्त करता है। यह वृद्ध पुरुष केवल उसकी व्यक्तिगत स्मृति नहीं है, बल्कि ‘ज्ञानी वृद्ध’ एक आदर्श आद्य रूप है, जो सामूहिक स्मृति चेतना से जुड़ा प्रतीक है, जो हर संस्कृति का हिस्सा होता है।
हालांकि, मानसिक संरचना के लिहाज़ से हम स्वप्न देखने से बच नहीं सकते, क्योंकि सपने मन की कार्यप्रणाली और नींद के बीच इस प्रकार स्थित होते हैं, जैसे किसी मेहराब में वास्तुशिल्पीय रूप से वांछित दो स्तंभों के बीच spandrel होते हैं, जो जीवन से सीधे जुड़े नहीं होते है, लेकिन वह हमारी दुनिया को अधिक सुंदर और अर्थपूर्ण बनाते हैं। जैसे खजुराहो या कोणार्क मंदिर में स्तंभों के बीच की जगहों में नृत्य करती अप्सराएँ अंकित होती है। वैसे ही दर्शन में कई विचार या प्रतीक मुख्य तत्त्वों के साथ-साथ उत्पन्न होते हैं, जो उन्हें सुन्दरता प्रदान करते हैं। जैसे पक्षाघातग्रस्त व्यक्ति स्वप्निल दुनिया में वास्तविक दुनिया की गतिविधियाँ को अनुभव करता हुआ स्वयं को सुरक्षित महसूस करता है।
कभी-कभी कल्पना की स्वतंत्र उड़ान बाहरी परिस्थितियों, सामाजिक दायित्वों और समयाभाव के कारण पूरी तरह विस्तार नहीं पाती हैं। लेकिन स्वप्न में बाहरी दुनिया से अलग होकर मन अधिक सहजता और गहराई से कल्पना को बेहतर अंजाम दे देता है। इसका एक प्रत्यक्ष किस्सा कोलकाता के एक विख्यात ट्रैफिक पुलिस अफसर के मुंह से सुना था। कोलकाता का एक विशेष रास्ता जो चारो तरफ से वाहनों के कारण इतना जाम रहता था कि लोगों को आधा-आधा घंटा तक पैदल चलना पड़ता था। उन्हें इसका कोई उपाय नहीं दिखाई दे रहा था। अचानक एक दिन रात में सोते हुए उन्हें यान नियंत्रण का उपाय सूझा और वह उसी समय उसे क्रियान्वित करने के लिए दौड़ पड़े। उनके निम्नपदस्थ अधिकारियों को विश्वास नहीं हो रहा था पर अंत में उनका वह सपना कारगार सिद्ध हुआ।
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डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।