हम बनाम वह: सभ्यता के प्रतिमान और युद्ध की आदिम वृत्ति
दर्शनशास्त्र से अर्जित अपने ज्ञान को आधार बनाते हुए डॉ मधु कपूर ने अपने इस लेख में 'युद्ध क्यों होता है', इस प्रश्न को डील करते हुए हमें अत्यंत महत्वपूर्ण जानकारियां दी हैं. यह लेख कई मूलभूत मुद्दों की तरफ हमारा ध्यान आकर्षित करता है और पाठकों को और अधिक जानने की इच्छा होती है. उदाहरण के लिए लेख के अंत में Thanatos (the death drive) के सिद्धांत के बारे में बताया गया है जो डोनाल्ड ट्रम्प की पूरी सभ्यता को समाप्त करने की पाशविक धमकी से जुड़ता है. यह लेख निश्चय ही पढ़ा जाना चाहिए क्योंकि आप थोड़ी और खोजबीन करें तो इसमें आप आने वाले युग की आहट भी सुन सकते हैं.
हम बनाम वह: सभ्यता के प्रतिमान और युद्ध की आदिम वृत्ति
डॉ मधु कपूर
जैसा कि हमने पिछले लेख में चर्चा की थी, सामूहिक कार्यों के लिए न्यायसंगत नैतिक उत्तरदायित्व व्यक्तिगत न होकर पूरे समूह का होता है। युद्ध एक जटिल और विनाशकारी सामूहिक क्रिया है जिसकी जिम्मेदारी भी सामूहिक होनी चाहिए। अक्सर इसे ‘राष्ट्रीय सुरक्षा’ या ‘राजनीतिक निर्णय’ की आड़ में नैतिक अपराध की श्रेणी में गण्य न करके वैध ठहरा दिया जाता है। फलस्वरूप, व्यक्तिगत अपराध की धारणा धुंधली हो जाती है। एक ही क्रिया — हत्या, विनाश और निर्दोषों की मौत को शांति के समय अपराध, लेकिन युद्ध के समय ‘कर्तव्य’ या ‘वीरता’ कहा जाता है। यह नैतिकता का सबसे बड़ा विरोधाभास है। इतिहास में ऐसे अजस्र किस्से मिलते है, जहाँ युद्ध को धर्म और न्याय की रक्षा के नाम पर उचित ठहराया गया है। यही कारण है कि नैतिकता और राजनीतिक सत्ता जब आमने-सामने खड़ी होती है, तो असल सवाल उठता है कि क्या सामूहिकता अपराध को वैध बना देती है?
गांधीजी मानते थे कि युद्ध में मानवीय मूल्य, नैतिकता और सारे नियम इस कदर दम तोड़ देते हैं कि वहाँ केवल ताकत के अलावा और कुछ नहीं बचता है। उनके अनुसार, ‘आंख के बदले आंख पूरी दुनिया को अंधा बना देगी’ — अतः युद्ध कभी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकता है। इसके विपरीत अरस्तू इत्यादि कुछ दार्शनिक मानते थे कि युद्ध का अंतिम लक्ष्य शांति और न्याय होता है, जो सुशासन स्थापित करने मदद करता है। यह एक अजीबोगरीब स्थिति है, जहाँ शांति के लिए भी युद्ध की आवश्यकता पड़ती है। इसलिए Just War का सिद्धांत युद्ध को पूरी तरह अपराध नहीं मानता, बल्कि उसे शर्तों के साथ वैध ठहराता है। किन्तु ऐसा भी देखा जाता है कि शक्तिशाली राष्ट्र सामरिक लाभ के लिए अक्सर नागरिक सुरक्षा, जनजीवन की निरंतरता और हथियारों के मर्यादित प्रयोग जैसे अंतरराष्ट्रीय नियमों की खुलेआम अवहेलनाकर मानवीय संधियों और सीमाओं का उल्लंघनकर उन्हें 'न्याय युद्ध' की आड़ में तर्कसंगत ठहराने का प्रयास करते हैं। महाभारत के युद्ध के पूर्व सभी शांतिपूर्ण विकल्प आज़माए गये पर अंतिम उपाय के रूप में न्याय की स्थापना के लिए युद्ध को ही जायज विकल्प के रूप में चुना गया।
जर्मन दार्शनिक हीगेल (Hegel) के अनुसार, युद्ध राष्ट्र के नैतिक स्वास्थ्य की रक्षा के लिए एक अनिवार्य प्रक्रिया है, जो समाज में व्याप्त जड़ता और स्थिरता को समाप्त करता है। उनका तर्क था कि दीर्घकालिक शांति राष्ट्रों में आलस्य और चारित्रिक पतन को जन्म देती है। इसके विपरीत, युद्ध की स्थिति नागरिकों को सामूहिक चेतना में एकीकृत करती है और उनमें आत्मोत्सर्ग की भावना भी जागृत करती है। कहने का तात्पर्य है कि युद्ध अर्थात संघर्ष ही जीवन को गतिशीलता प्रदान करता है; क्योंकि इसके अभाव में मानवीय अस्तित्व प्रवाहहीन और नीरस होकर अपनी जीवंतता खो देता है।
हॉब्स (Hobbes) इत्यादि चिंतकों के अनुसार मनुष्य सबसे बड़ा स्वार्थी प्राणी है वह अपने जीवन की रक्षा के लिए और मृत्यु के भय से बचने के लिए दूसरों से समझौता करता है और राजनीतिक करारों पर हस्ताक्षर करने से भी नहीं हिचकता है। उनकी दृष्टि में प्रत्येक व्यक्ति अधिक से अधिक शक्ति और संसाधन प्राप्त करना चाहता है। चूंकि संसाधन सीमित हैं, इसलिए मनुष्य आत्म-रक्षा के लिए एक-दूसरे के प्रति हिंसक हो उठते हैं। हॉब्स लिखते हैं कि मनुष्य में शक्ति पाने की एक ऐसी 'शाश्वत और बेचैन इच्छा' होती है। हॉब्स का प्रसिद्ध कथन है कि प्रारंभिक अवस्था में 'सही' और 'गलत' या 'न्याय' और 'अन्याय' जैसी कोई धारणा नहीं होती थी; यहाँ केवल 'ताकत' ही एकमात्र कानून होता था। राष्ट्र अक्सर अपने अस्तित्व के प्रति जब खतरा महसूस करते हैं, तो वे दुश्मन के मनोबल को झूठ, दुष्प्रचार का निशाना बनाकर उन्हें मानसिक रूप से तोड़ना शुरू कर देते है, जिससे अवसाद और सामाजिक अस्थिरता पैदा होती है, जिसे युद्ध— "हम बनाम वह" की मानसिकता में धकेल देता है।
एक ओर जहाँ हॉब्स का मानना था कि मनुष्य स्वार्थवश समझौता करता है, वहीं J. L Rawls का मानना था कि मनुष्य विचारशील होने के कारण निष्पक्षता को चुनता है। यह एक ऐसी मानसिक स्थिति है जहाँ हमें निष्पक्ष नियम बनाने के लिए अपनी वर्तमान पहचान पर पर्दा डालना पड़ता है, जिसे वे अज्ञानता का पर्दा (Veil of Ignorance) कहते हैं। कहने का तात्पर्य है कि व्यक्ति जब अपनी सत्ता और क्षमता से निरपेक्ष होकर नियम बनाता है तो पूर्वग्रह का कोई अंश उसके निर्णय को प्रभावित नहीं करता है। Rawls जिस निरपेक्ष प्रक्रिया की बात करते है वह उचित होने पर भी एक आदर्श परिकल्पना ही अंत में साबित होती है।
इस प्रसंग में Albert Einstein और Sigmund Freud के बीच में Why War? शीर्षक पत्राचार को युद्ध और शांति पर दार्शनिक व मनोवैज्ञानिक विमर्श का आधार माना जा सकता है। इसमें आइंस्टाइन ने पूछा था कि क्या मानवता को युद्ध के खतरे से मुक्त करने का कोई रास्ता है? फ्रायड का उत्तर था कि युद्ध को पूरी तरह समाप्त करना कठिन है, क्योंकि यह मानव स्वभाव में गहराई से निहित है। महाभारत में शांति और न्याय के सभी विकल्प अपनाने के बाद भी युद्ध कौरवों की जिद और दुर्योधन की आक्रामकता से जुड़ता है। एक ओर शांति की आकांक्षा, दूसरी ओर आक्रामक प्रवृत्ति की अनिवार्यता और बीच में न्याय की पुकार।
फ्रायड मानते थे कि हर इंसान में दो मूल प्रवृत्तियाँ होती हैं: जीवन प्रवृत्ति (Eros) जोड़ने और सृजन करने वाली शक्ति तथा मृत्यु प्रवृत्ति (Thanatos) विनाश और मृत्यु की शक्ति। युद्ध इसी विनाशकारी शक्ति का परिणाम है।। जब यह वृत्ति अंतर्मुखी न होकर बाह्यमुखी होती है, तो यह आक्रामकता और युद्ध का कारण बनती है। सभ्य समाज में रहने के लिए हमें अपनी हिंसात्मक भावनाओं को दबाना पड़ता है। जब ये दमित भावनाएं बहुत बढ़ जाती हैं, तो वे युद्ध के रूप में बाहर निकलती हैं। भीड़ या राष्ट्र के रूप में, व्यक्ति अपने नैतिक बंधन को शिथिल कर देता है और आक्रामक प्रवृत्तियां सामूहिक रूप से युद्ध के लिए प्रेरित करती हैं। फ्रायड और अल्बर्ट आइंस्टीन के कथोपकथन से ज्ञात होता है कि युद्ध को रोकने के लिए एक केंद्रीय सत्ता जैसे लीग ऑफ नेशंस, अब संयुक्त राष्ट्र की शक्ति को बढ़ाना और मानव में सांस्कृतिक विकास को बढ़ावा देना आवश्यक है, जो आक्रामकता को नियंत्रित कर सके। क्योंकि बाहरी युद्ध अक्सर मनुष्य के आंतरिक असंतोष का ही प्रतिबिंब होता हैं।
शुरू में विवाद 'पाशविक बल' से सुलझाए जाते थे, लेकिन धीरे-धीरे लोगों ने महसूस किया कि एकता में शक्ति है। इसी एकता से 'कानून' का जन्म हुआ, जो सामूहिक हिंसा को रोकने का एक तरीका है। फ्रायड ने सुझाव दिया कि स्वतंत्र विचार वाले लोगों को शिक्षित करना और मनुष्यों के बीच भावनात्मक जुड़ाव अर्थात सहानुभूति पैदा करना युद्ध रोकने के अप्रत्यक्ष तरीके हो सकते हैं। लेकिन ऐसे आदर्श समाज की कल्पना के सम्बन्ध में फ्रायड स्वयं संशय में थे क्योंकि उनके अनुसार आक्रामकता मानव स्वभाव का अभिन्न अंग है, जिसे रूपांतरित किया जा सकता है, पर ख़त्म नहीं किया जा सकता है। Thanatos का विचार फ्रायड के मन में प्रथम विश्व युद्ध की विभीषिका देखने के बाद आया था। उन्होंने महसूस किया कि इंसान केवल सुख नहीं खोजता, बल्कि उसके भीतर एक गहरा विनाशकारी पक्ष भी होता है। उनका मानना था कि हर जीवित प्राणी के भीतर अनजाने में inorganic अवस्था में लौटने की एक तीव्र इच्छा होती है। सरल शब्दों में, जीवन के तनाव से मुक्त होने की आकांक्षा होती है। जब Thanatos की विनाशकारी ऊर्जा अंदर दबी रहती है, तो यह व्यक्ति स्वयं को नुकसान पहुँचाने लगता है, जो उसे अवसाद या आत्म-हनन की ओर ले जाता है। इसलिए, मन इस ऊर्जा को बाहर की ओर मोड़कर युद्ध, हत्या, शिकार या दूसरों के प्रति गुस्से के रूप में उभरने लगता है। फ्रायड के अनुसार, युद्ध इसलिए होते हैं क्योंकि हम अपनी आंतरिक मृत्यु इच्छा को दूसरों पर आक्रमण में बदल देते हैं ताकि हम खुद बचे रह सकें।
फ्रायड ने इस विनाशकारी ऊर्जा को बदलने की प्रक्रिया को 'उदात्तीकरण' (Sublimation) कहा है। उनके अनुसार, इंसान अपनी पाशविक प्रवृत्तियों को सीधे तौर पर समाज में प्रकट नहीं कर सकता, इसलिए मन उन्हें 'सभ्य' और 'रचनात्मक' रास्तों पर मोड़ देता है। फुटबॉल, बॉक्सिंग या कुश्ती जैसे खेल आक्रामकता को निकालने का सबसे सुरक्षित तरीका हैं। यहाँ जीत की इच्छा और शारीरिक संघर्ष असल में युद्ध का एक सभ्य विकल्प है। एक कलाकार अपनी भीतर दबाई हुई नफ़रत, भय या विनाशकारी भावनाओं को चित्रकला, कविता या फ़िल्म जैसी कलात्मक अभिव्यक्तियों में रूपांतरित करता है। इस प्रक्रिया से वह न केवल अपने मन को शांति प्रदान करता है, बल्कि समाज को भी एक सुंदर और सार्थक रचना का उपहार देता है। फ्रायड का एक दिलचस्प तर्क था कि एक सर्जन के भीतर की 'चीर-फाड़' करने की प्रवृत्ति, जो हिंसक हो सकती थी, समाज के लिए जीवन रक्षक बन जाती है। यहाँ आक्रामकता का उपयोग मानव कल्याण के लिए किया जाता है। भारी शारीरिक काम करना, पहाड़ों को काटना या बड़ी इमारतें बनाना भी आंतरिक तनाव और ऊर्जा को खर्च करने के तरीके हैं। उनका मानना था कि संस्कृति और सभ्यता का पूरा ढांचा इसी 'उदात्तीकरण' पर टिका होता है।
आज के वैश्विक परिदृश्य में यह द्वंद्व बार बार उभरकर सामने आता है। जहाँ एक ओर युद्धोन्माद का रूप Thanatos की मनोवृत्ति (फ्रायड का death drive या मृत्यु को वरन करने का सिद्धांत) के तहत ‘एक समूची सभ्यता को’ ख़त्म करने की घोषणा करता है, वहीं इसके विपरीत ‘न्याय और नैतिक समावेशिता’ को सभ्यता की पहचान और बल के रूप में स्वीकार करने में हिचकिचाता नहीं है।

डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। दर्शन पर उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance प्रकाशित हुआ है।