राजेन्द्र भट्ट हमारी वेब-पत्रिका पर नियमित लिखते रहे हैं। उनके लेखन का फलक व्यापक है - बानगी के लिए आप उनके नाम पर क्लिक करें तो उनके सभी लेख सामने आ जायेंगे। आज की उनकी रचना को उन्होंने 'कहानी' कहा है। है भी शायद ये कहानी ही लेकिन क्या विडम्बना है कि हमारे समाज की इतनी बड़ी सच्चाई, जिस पर उन्होंने मार्मिक टिप्पणी की है, वो कहानी ही है। याद आ रही है एक मशहूर पंक्ति जो शायद किसी ग़ज़ल का हिस्सा है - 'हक़ीक़त का अगर अफ़्साना बन जाए तो क्या कीजे'।










