बहुसांस्कृतिक ऑस्ट्रेलिया में हिंदी - सभी संस्कृतियों का सम्मान
अब तक अपनी कहानियों और कविताओं के माध्यम से संवेदनशील रचनात्मक लेखन करने वाली अनीता गोयल इस बार एक अनुभवजन्य आलेख लेकर आई हैं, जिसमें वे बताती हैं कि ऑस्ट्रेलिया जैसे बहुसांस्कृतिक समाज में हिंदी किस प्रकार नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ते हुए वैश्विक नागरिकता की ओर भी अग्रसर करती है। भाषा, शिक्षा और सांस्कृतिक आत्मविश्वास के संबंधों पर केंद्रित यह लेख हिंदी के अंतरराष्ट्रीय स्वरूप पर एक विचारोत्तेजक दृष्टि प्रस्तुत करता है।
बहुसांस्कृतिक ऑस्ट्रेलिया में हिंदी
अनीता गोयल
ऑस्ट्रेलिया एक बहुसांस्कृतिक देश है, यहाँ पर दुनियाँ भर के देशों से लोग बेहतर जीवन की तलाश में आकर बस गए है। यहाँ की सरकार ये समझती है कि इन अप्रवासियों की दूसरी पीढ़ी कल के भविष्य का निर्माण करेगी। यदि यह ही दो संस्कृतियों के बीच बंटी रहेगी और अगर अपनी पहचान और अस्तित्व के प्रति आत्मविश्वासी नहीं होगी तो देश की प्रगति में खुल कर योगदान नहीं दे सकेगी। अतः प्राथमिक शिक्षा स्तर से ही इन बच्चों को जहाँ ऑस्ट्रेलियन मूल्यों के अनुसार शिक्षा मिलती है, वहीँ इनकी मूल पहचान को भी निखारने का प्रयास किया जाता है। यहाँ पर प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च विद्यालय के स्तर पर ही सभी संस्कृतियों को सम्मान दिया जाता है। एक दूसरे के सांस्कृतिक मूल्यों से परिचित करवाने के लिए आपसी सौहार्द सप्ताह, बहुसांस्कृतिक दिवस इत्यादि जैसे आयोजन किए जाते हैं।
भाषा केवल व्याकरण, शब्द और ध्वनि ज्ञान ही नहीं है बल्कि भाषा के ज्ञान के साथ संस्कृति की सुंदर रूपरेखा खींच जाती है जो बताती है कि हम कहाँ से आए है और कहाँ जा रहे है। हर भाषा लगातार परिवर्तनशीन होती है और अक्सर उसके प्रयोग संदर्भ अपने समुदाय विशेष से जुड़े होते है। जैसे कि वकीलों या डॉक्टरों या फुटबॉल टीम में कभी कभी हँसी-मजाक के लिए किसी विशिष्ट शब्दावली या 'जारगन' का प्रयोग होता है जिसे बाहर के लोगो को समझने में मुश्किल होती है, इसी तरह हर संस्कृति से कुछ विशिष्ट जुमले निकल कर आते है और उनका तब तक मज़ा नहीं लिया जा सकता जब तक कि उस संस्कृति की थोड़ी बहुत समझ न हो। उदाहरण के लिए यदि मेलबर्न में किसी साधारण हिंदी समझने वाले को कहा जाये - न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी, बेगानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना, अरे, वो तो हर जगह झाँसी की रानी है, इसका दिमाग़ तो चाचा चौधरी से भी तेज चलता है, इत्यादि इत्यादि – तो उन्हें ठहर कर समझाना पड़ेगा। शब्दों और शब्दों के पीछे छुपे अर्थों और भावार्थों को समझने के लिए उस भाषा को बोलने वाले समुदाय की संस्कृति और इतिहास को भी समझना जरूरी है। जब हम कोई भी नई भाषा सीखते है तो जाने-अनजाने उस भाषा के विकास में योगदान देने वाली संस्कृति को भी समझने लगते है।
ऑस्ट्रेलिया की बहुसंस्कृति और बच्चों के बहुमुखी विकास को ध्यान में रखते हुए 1935 में विक्टोरिया राज्य में विक्टोरियन स्कूल ऑफ़ लैंग्वेजेस शिक्षा-संस्थान की स्थापना की गई। सर्वप्रथम मैकरॉबर्टसन गर्ल्स हाई स्कूल में शनिवार को इटालियन और जापानी भाषाएँ पढ़ाई गईं। आज विक्टोरियन स्कूल ऑफ़ लैंग्वेजेस, विद्यार्थियों को प्रथम से लेकर बाहरवीं के स्तर तक विश्व की चालीस भाषाएँ पढ़ने का अवसर देता है और लगभग 14,500 विद्यार्थीयों ने इसमें इस वर्ष दाखिला लिया। इन चालीस भाषाओं में बहुत सी तो भारतीय भाषाएँ ही शामिल है जैसे कि हिंदी, पंजाबी, बंगाली, तमिल, कन्नड़, गुजराती, मलयालम और उर्दू। हालांकि अंग्रेजी बाहरवीं में एक अनिवार्य भाषा विषय है पर यदि उत्तम अंक आए तो हिंदी या कोई अन्य भाषा को भी बाहरवीं के अंकों में सम्मिलित किया जा सकता है। तो विद्यार्थियों को न केवल अपनी भाषा को पढ़ने, संस्कृति और पहचान को समझने का अवसर दिया जाता है – उनको सही मायने में समझ आता है कि उनकी व उनके समुदाय की पहचान क्या है? वे बाहर रहते हुए भी अपने समुदाय से कैसे जुड़े है? उनके समुदाय का मातृ-देश और नए देश के साथ क्या संबंध है?
ये समझ भी विकसित होती है कि एक दूसरे से अलग होते हुए भी सभी संस्कृतियों और मनुष्य एक दूसरे पर आपसी कल्याण के लिए निर्भर है। विद्यार्थी विद्यालय में अपनी भाषा पढ़ते हुए, अपने भारतीय मूल के अन्य विद्यार्थियों से मिलते है जो ये भाषाएँ पढ़ने के लिए अलग अलग विद्यालयों से एकत्रित होते है। साथ ही वे चीनी, जर्मन, फ्रेंच आदि के विधार्थियों से भी मिलते है और उन्हें, विभिन्न सांस्कृतिक कार्यकर्मों को भी देखने का मौक़ा मिलता है। उन्हें बाल्यकाल से ही यह समझ आना शुरू हो जाता है कि विश्व एक वृहत्त कुटुंब है और हमे हर मुद्दे के बारे में सभी लोगों के हितों को ध्यान में रखते हुए ही सोचना चाहिए।
वैसे भी वैज्ञानिक तथ्यों से ये साबित हुआ है कि एक अन्य भाषा सीखने से हमारे मस्तिष्क का बहुमुखी विकास होता है। पहले कहा जाता था कि एक सधे सब सधे और अब कहा जाता है कि बहुकार्यशीलता, मस्तिष्क को सक्रिय रखने के लिए एक महत्वपूर्ण क्षमता है। संगीत और नृत्य की भाँति, अतिरिक्त भाषा का अध्यान बाई तरफ़ के दिमाग़ को सक्रिय रखने में सहायक होता है।
1990 के दशक से पहले इन्टरनेट का विकास और प्रयोग कम था तो अंतरराष्ट्रीय जानकारी सीमित ही होती थी। फिर भी भारत से बाहर के देशों - यूरोप, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया के समाज और इतिहास की सामान्य जानकारी का एक चित्र हमारे मन पर वहाँ के साहित्य से ही बनता था। शेक्सपियर, चार्ल्स डिकेंस, जेन ऑस्टिन, लियो टॉलस्टॉय, गोर्की, मार्क ट्वेन, पैट्रिक वाइट इत्यादि साहित्यकारों ने अपनी रचनाओं से अपने समाज, इतिहास और परंपराओं के विषय में पाठकों को न केवल जानकारी दी बल्कि उन्हें अपने समाज के प्रति जिज्ञासु भी बनाया। जब इनकी कुछ रचनाएँ विद्यालयों में पढ़ाई गई तो एक अलग सोच और चिंतन की चर्चा को भी बढ़ावा मिला।
अपनी भाषा के अध्यन के माध्यम से विदेश में पल कर बड़ी होती हुई युवा पीढ़ी न केवल अपनी जड़ो और मूल संस्कृति के प्रति सम्मान सीखती है बल्कि ऑस्ट्रेलिया के बहुसांस्कृतिक समाज के प्रति भी सहिष्षु बनती है। विभिन्न संस्कृतियों का सम्मान करना उनके व्यक्तित्व का स्वाभाविक हिस्सा बन जाता है। समान पृष्ठभूमि के इन युवाऑ को अवसर मिलता है कि वे खुलकर एक अलग वातावरण में अपने सांस्कृतिक और पारंपरिक अनुभवों की चर्चा करें। ऑस्ट्रेलिया में उनके भारतीय सांकृतिक व धार्मिक अनुभव, भारतीय होते हुए भी कुछ अलग होते है। वे इस अंतर और समानता को महसूस करते है और आपस में इसकी चर्चा भी करते है। इन संवादों से उनकी सोच की संकीर्णता कम होती है और सीमित दृष्टिकोण से ऊपर उठकर वे एक विस्तृत विश्व, प्रकृति और मानवता से जुड़ी समस्याओं के बारे में चिंतन कर सकते है। इसमें कोई संदेह नहीं कि भिन्न भाषाएँ पढ़ने से विचारों में व्यापकता बढ़ती है।
आशा है कि भारतवंशियों की नई पीढ़ी जो ऑस्ट्रेलिया में रहती है, वह अपनी भाषा और संस्कृति को और गौरवपूर्ण स्थान दिलाने में रूचि लेगी और इसके लिए पहली शर्त यह होगी कि हम किसी भी दूसरी संस्कृति को अपने से कम ना आंके बल्कि परस्पर एक दूसरे का सम्मान करना सीखें। मातृभाषा, मातृभूमि की स्नेहमयी गोद है, ये समृद्ध संस्कृति की अभिव्यक्ति है और हमारी पहचान है। अतः ये बहुत जरूरी है की अगर इसे विदेशी भी सम्मान देने के लिए तैयार है तो हम इसे धूमिल न करे बल्कि इसके विकास में अपना, देश का और विश्व के कल्याण का सपना देखें।
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अनीता गोयल, दिल्ली विश्वविद्यालय के भारती महाविद्यालय में 12 साल इतिहास पढ़ाने के बाद, मेलबर्न (ऑस्ट्रेलिया) जा कर बस गई। वहाँ उन्होंने विक्टोरियन स्कूल ऑफ़ लैंगुएजिज़ के प्रोग्राम के अंतर्गत कई बरस माध्यमिक स्तर पर हिंदी पढ़ाने का कार्य किया। अपने आस-पास के परिवेश के प्रति सजग उनकी रचनाएं सामाजिक संवेदना से सरोबर होती हैं।