मैत्री सम्बन्ध का बहुआयामी स्वरूप - संबंधों की श्रृंखला में मैत्री पर चर्चा
आपको डॉ मधु कपूर का नवीनतम लेख उनके पिछले बहुत सारे लेखों से इस मायने में अलग लगेगा कि दर्शनशास्त्र की गंभीर भावभूमि पर खड़ा होने के बावजूद यह लेख हमारे दैनंदिन व्यवहार का हिस्सा लगता है. लेख मैत्री के बहुआयामी स्वरूप और उसकी समकालीन प्रासंगिकता पर विचार करता है। उनका कहना है कि मित्रता को केवल सामाजिक सम्बन्ध नहीं, बल्कि नैतिक, आध्यात्मिक और मानवीय उत्कर्ष की प्रक्रिया के रूप में देखा जाना चाहिए। अरस्तू, ह्यूम, बुद्ध, भर्तृहरि और भारतीय भक्ति परम्परा के संदर्भों के माध्यम से डॉ मधु कपूर बताती हैं कि सच्ची मैत्री अधिकार, स्वार्थ और अपेक्षाओं से मुक्त होकर करुणा, सद्भाव और आत्मीयता का विस्तार करती है।
मैत्री सम्बन्ध का बहुआयामी स्वरूप
डॉ. मधु कपूर
अरस्तू के अनुसार कुछ मित्रताएं व्यावसायिक दृष्टि से नफे नुकसान के तहत की जाती है। दूसरे प्रकार की मित्रता मनोरंजन या एकाकित्व से बचने के लिए की जाती है, जैसे आजकल अक्सर देखा जाता है जब कुछ दोस्त मिलते है तो वे आपसी बातों में कम ज्यादातर अपने मोबाइल फोन और गेम्स में जुते रहते है। डिजिटल संचार माध्यमों ने सम्बन्धों की संरचना में यह मौलिक रूप से हस्तक्षेप किया है, जिसने परिवार और मित्रता के भावनात्मक जुड़ाव को नकार दिया है।लेकिन एक तीसरे प्रकार की मित्रता सद्गगुणों के विश्वास पर आधारित होती है, जिसका सम्बन्ध नैतिकता और चरित्र की समानता पर निर्भर करता है। ऐसी मित्रता स्थायी और गहन होती है। पर यह मित्रता व्यक्तिगत स्तर पर ही कायम रहती है।
वहीँ दूसरी ओर ह्यूम मित्रता को मानवीय भावनाओं और सामाजिक सहानुभूति का विस्तार मानते है। उनके लिए मित्रता न केवल व्यक्तिगत सुख का स्रोत होती है, बल्कि समाज को नैतिक स्थिरता भी प्रदान करती है। कुछ अर्थों में सामाजिक अनुबंध होने पर भी यह मानवीय संवेदनाओं से ही जन्म लेती है।
लेकिन बौद्ध दर्शन में मैत्री एक आध्यात्मिक साधना है, जो सभी जीवों के प्रति समान रूप से प्रेम और कल्याणकारी भावनाओं का विस्तार करती है। बौद्ध दर्शन में ब्रह्मविहार की चार सर्वोच्च भावनाओं — मैत्री (मेत्ता) करुणा (सहानुभूति), मुदिता (आनंद) और उपेक्षा (समभाव) में मैत्री को पहला स्थान दिया गया है। मैत्री का मूल अर्थ संस्कृत शब्द ‘मित्र’ भाव से व्युत्पन्न है – जिसका अर्थ है ‘मित्रता’ या ‘सहज सद्भाव’। बौद्ध साधना में 'मेत्ता भावना' एक प्रकार की ध्यान की प्रक्रिया है, जो मन को प्रशिक्षित करती है कि वह सभी जीवित प्राणियों के प्रति बिना किसी शर्त के प्रेम, सद्भाव और मित्रता की भावना को व्यक्त कर सके।
यद्यपि मन को समझना अत्यन्त कठिन है — एक ओर यह कोमल और अत्यन्त सूक्ष्म होता है, तो दूसरी ओर बहुत शीघ्र ही चंचल हो जाता है, इसे तराशने की जरुरत होती है। जैसे नहरें जल को सीमित रास्ते से प्रवाहित करती है, धनुर्धर अपने बाण को सीधा करते हैं, बढ़ई लकड़ी को आकार देता हैं, वैसे ही बुद्धिमान व्यक्ति अपने मन को अनुशासित करता हैं। बौद्ध धम्मपद ग्रन्थ में कहते है—
उदकं हि नयन्ति नेत्तिका, उसुकारा नमयन्ति तेजनं।
दारुं नमयन्ति तच्छका, अत्तानं दमयन्ति पण्डिता।
बौद्ध धर्म चूँकि अनात्मवादी है इसलिए मैत्री भाव में स्वामित्व या अधिकार की भावना का कोई स्थान नहीं होता है। धम्मपद में कुछ ऐसा ही भाव व्यक्त किया गया है — ‘अत्ता हि अत्तनो नाथो को हि नाथो परो सिया’ अर्थात आत्मा से बढ़कर खुद का स्वामी और कौई नहीं होता है।
बुद्ध के अनुसार 'विशुद्धिमग्ग' (विशुद्धता का मार्ग), का कार्य दूसरों को प्रिय रूप में देखना होता है, जो द्वेष, क्रोध, शत्रुता इत्यादि को समाप्त करने का प्रयास करती है। निःस्वार्थ की भावना से प्रेरित होने के कारण इस सम्बन्ध में न तो कोई स्वामी होता है और न ही कोई ऐसा व्यक्ति जिस पर जबर्दस्ती हक़ दिखाया जा सके। (यद्यपि व्यवहारिक जीवन में स्वामित्व की धारणা को प्राधान्य दिया जाता है)। लेकिन बुद्ध का मैत्री सम्बन्ध करुणा के माध्यम से सभी प्राणियों के प्रति सद्भाव का मार्ग दिखाता है।
रोजमर्रा के जीवन में अक्सर देखा जाता है कि क्रोध और नफरत न केवल आपसी विश्वास और मूल्यवान रिश्तों को तोड़ देते है, बल्कि व्यक्ति को कभी कभी अपराधबोध और पश्चाताप की अग्नि में भी झोंक देते है। इसके विपरीत, सहृदयता इस घाव पर एक सुखदायक प्रलेप की तरह काम करती है। मैत्री भावना का प्रथम सोपान है स्वयं से प्रेम करना तथा इसके माध्यम से इसके दायरे का विस्तार करना —परिवार, अजनबियों और अंत में शत्रु तथा ब्रह्मांड के हर प्राणी और वनस्पतियों के प्रति। श्री चैतन्य महाप्रभु के लिए प्रसिद्ध था कि उनके दिव्य कीर्तन रस में डूब कर हिंसक पशु पक्षी तक द्रवित हो जाते थे।
अपने प्रति प्रेम विकसित करना स्वार्थी होना नहीं है इसके विपरीत यह सभी प्राणियों के प्रति प्रेम उत्पन्न करने का एक प्रस्थान बिंदु है। केवल स्वार्थ और आत्म-तुष्टि का पालन करना अपने प्रति क्रूरता है और दूसरों के प्रति दुखों का कारण होता है। जो व्यक्ति स्वयं आत्म-घृणा से पीड़ित होता है, वह दूसरे से घृणा ही कर सकता है। ऐसे व्यक्तियों के लिए सबसे बेहतरीन तरीका है स्वयं से प्रेम करना। Kant का प्रसिद्ध कथन है —स्वयं से प्रेम करना हमारा कर्त्तव्य है। पर इसका अर्थ यह नहीं है कि वह आत्म मुग्ध होकर आत्म प्रशंसा में लीन हो जाए। इसके लिए मन को लचीला बनाना भी अनिवार्य होता है।
"उसने मुझे उस दिन गाली दी थी, उसने मुझे पीटा था, उसने मुझे हराया था, उसने मुझे लूटा था, "— जो लोग ऐसे विचार मन में पालते हैं उनकी घृणा कभी शांत नहीं होती है। ऐसा व्यक्ति सब तरफ से समृद्ध होकर भी क्रोधित विचारों में डूबकर न केवल गलत निर्णय लेता है, बल्कि अपनी उपलब्ध समृद्धि को भी नष्ट कर लेता है। क्रोध, नाराजगी और द्वेष की जंजीरों से बंधा हुआ मन आनंद का उपभोग नहीं कर सकता है। वह अपने नुकसान का बदला लेना चाहता है।
उदाहरण के लिए, जब व्यक्ति वर्षों पहले किसी निर्मम घटना को याद करके विक्षुब्ध हो उठता है, तो वह मन की शांति में बाधा उत्पन्न करता है । प्रेम पर ध्यान केन्द्रित करने से उसकी पूर्ण एकाग्रता की शक्ति से अंतर्दृष्टि अथवा विपश्यना उत्पन्न होती है। विपश्यना (विशेष भाव से देखने की प्रक्रिया) एक प्रकार की साधना है जो व्यक्ति को नकारात्मक क्लेशजनित चित्तवृत्तियों से मुक्त करने का प्रयास करती है। मैत्री की यह समझ पाली बौद्ध ग्रन्थ ‘त्रिपिटक’ से पुष्ट होती है कि सभी के लिए मैत्री विकसित करना क्यों बुद्धिमानी और यथार्थ है।
नकारात्मक भावनाओं से उबरने का एकमात्र उपाय है प्रेम और सद्भाव को विकसित करना। जब मन किसी के प्रति प्रेम की भावना से सराबोर हो जाए, तब उस भावना को अपने किसी विरोधी व्यक्ति के प्रति आरोप करना चाहिए, जिसके प्रति उसके मन में घृणा है। यह साधना का एक स्तर है जो अत्यन्त कठिन है, लेकिन जो व्यक्ति इसका संवर्द्धन कर लेता है वह अपने आसपास के माहौल को सुन्दर बना लेता है, साथ ही साथ समाज को भी उपकृत करता है।
बुद्ध के समय में, अंगुलिमाल नाम के एक खूंखार डाकू ने देश में आतंक मचा रखा था। ९९९ लोगों की हत्या करके उनकी उंगलियों की हड्डियों की माला बनाने वाला अंगुलिमाल जब अपने अगले शिकार की तलाश में था, तभी बुद्ध वहाँ आ गए। बुद्ध की शांति और प्रेम की शक्ति ने अंगुलिमाल को वश में कर लिया जो बाद में उनके भिक्षु शिष्यों में से एक बन गया।
प्रेम के दो सबसे बड़े शत्रु है आसक्ति और द्वेष। आसक्ति दूसरों से अतिरिक्त अपेक्षाएं करने लगता है, जिससे अधिकार की भावना पनपने लगती है और न मिलने पर व्यक्ति दुखी होने लगता है और सम्बन्धों को दूषित कर देता है। द्वेष की अग्नि में झुलसा हुआ व्यक्ति करुणा और प्रेम से दूर होकर अपने अस्तित्व को ही भस्म कर डालता है। अतः व्यक्ति को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसका प्रेम इन दोनों खतरों से मुक्त रहे।
मित्रता के कुछ उदाहरण विख्यात है — जैसे अर्जुन का कृष्ण से, विदुर का कृष्ण से, कृष्ण का द्रौपदी से, दुर्योधन का कर्ण से इत्यादि। इसमें न तो भय है, न दूरी, बल्कि आत्मीयता, विश्वास और सहज प्रेम है। सखा भाव मित्रता का आध्यात्मिक उत्कर्ष है, जहाँ सम्बन्ध केवल सामाजिक या नैतिक नहीं, बल्कि भक्ति और प्रेम की परम आत्मीयता में बदल जाता है। जैसे राधा कृष्ण की लीला में सभी गोप गोपियाँ समानरूप से प्रेम से जुड़ते हैं। वृन्दावन की सखा लीला —
कृष्ण और उनके गोप मित्रों के सद्गुण और विश्वास पर आधारित थी, जो सामूहिक आनंद का प्रतीक थी। वैसे ही बुद्ध का मैत्री-संवाद सभी जीवों के प्रति समान भावना का उल्लेख करता है।
लेकिन ऐसी मित्रता के चयन का मापदंड क्या होना चाहिए इस पर भर्तृहरि कहते है : दुष्टों की मित्रता दिन के पूर्वार्ध की छाया के सामान हैं – जो आरम्भ में लम्बी और आकर्षक लगती है, पर दोपहर होते होते क्षीण होने लगती है, वैसे ही
मित्रता का स्वरूप शुरू में दीर्घ होता है पर आहिस्ते आहिस्ते क्षीण होने लगता है। दूसरी ओर सज्जनों की मित्रता – आरम्भ में छोटी लग सकती है, पर धीरे-धीरे स्थायी और गहन होती जाती है— जैसे दिन की छाया शुरू में छोटी होती है पर धीरे धीरे लम्बी होने लगती है— दिनस्य पूर्वार्ध परार्ध भिन्ना छायेव मैत्री खलु सज्जनानाम্। मित्रता का सम्बन्ध बहुत नाजुक होता है। कवि बिहारी द्वारा रचित ये पंक्तियाँ लेख का समापन करने के लिए अत्यंत उपयुक्त है —
जौ चाहत, चटकन घटे, मैलो होई न मित्त।
राज राजसु न छुवाइ तौ, नेह चीकन चित्त।।
यदि हम चाहते हैं कि मित्रता की चटक, ना घटे और मैली ना हो, अर्थात उसमें कोई द्वेष ना उत्पन्न हो और वह पवित्र बनी रहे, तो मित्रता को राजसी विषय वस्तु, अर्थात धन - संपदा इत्यादि से अछूता रखना चाहिए, अर्थात मैत्री भाव निःशर्त होना चाहिए। जिस प्रकार वस्तु पर तेल लग जाने से उसकी सतह चिकनी हो जाती है, और उस चिकनी सतह पर धूल का स्पर्श मात्र भी हो जाए, तो वस्तु की चमक घटकर मैली हो जाती है । ठीक उसी प्रकार मित्रता में धन रूपी धूल का स्पर्श मित्र के स्नेह युक्त चिकने मन को मैला कर देती है।
*************

डॉ मधु कपूर कलकत्ता के एक प्रतिष्ठित कॉलेज में दर्शनशास्त्र की प्रोफेसर रही हैं। दर्शनशास्त्र के अलावा साहित्य में उनकी विशेष रुचि रही है। उन्हीं के शब्दों में, "दार्शनिक उलझनों की गुत्थियों को साहित्य के रास्ते में तलाशती हूं।" डॉ कपूर ने हिंदी से बंगला में कुछ पुस्तकों का अनुवाद किया है और कुछ कविता संग्रह भी प्रकाशित हुए हैं। अभी हाल ही में उनकी पुस्तक "द्रष्टा दृश्य और दर्शन दर्शन - एक चौथे आयाम की खोज" प्रकाशित हुई है. इससे पहले भी उनके निबंधों का एक संग्रह Dice Doodle Droll Dance आ चुका है।