AI काल में जीने का सबब – 3
वागीश कुमार झा*
सूचना तंत्र का संजाल मानव जीवन के हर पहलू को आच्छादित कर चुका है. दशकों पूर्व इंटरनेट ने इसको एक नई उड़ान दी. अब आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस (AI – जिसे हिन्दी में कृत्रिम मेधा कहा गया है), अपने विविध रूपों में एक शांत सुनामी की तरह इस पूरे खेल को बदल देने वाली है. हमारे लिए, समाज एवं समुदाय के तौर पर और एक व्यक्ति के तौर पर, इन परिवर्तनों का मतलब क्या है? शैक्षिक तकनीक, इतिहास और संस्कृति के गंभीर अध्येतावागीश कुमार झा की यह लेख श्रृंखला इन्हीं पहलुओं पर ध्यान आकृष्ट करती है. प्रस्तुत है “ज़िंदगी ख्वाब है...”
जिंदगी ख्वाब है...
इस गहन छल काल में अब तो मशीन पर भी विश्वास करना मुश्किल हो चुका है. AI के संदर्भ में इसकी संरचना में अंतर्निहित पूर्वाग्रहों के बारे में सतर्क रहना जरूरी है. मशीन का यह पक्षपाती व्यवहार व्यवस्थित त्रुटियों या पूर्वाग्रहों को संदर्भित करता है जो मशीन-लर्निंग एल्गोरिदम में ही शामिल हो सकता है या जान बूझ कर किया जाता है. ऐसे पूर्वाग्रह कई स्रोतों से उत्पन्न हो सकते हैं, जिनमें AI का पक्षपातपूर्ण प्रशिक्षण डेटा, पूर्वाग्रह युक्त एल्गोरिदम, या परिणामों की एक खास झुकाव वाली व्याख्याएं शामिल हैं। ये सभी काम वो लोग करते हैं जो AI को अपने उद्देश्य के लिए तैयार करते हैं. ध्यान रहे कि इस AI की तकनीक को विकसित करने के लिए अरबों रुपए खर्च किए जा रहे हैं और यह कोई धर्म का काम नहीं है. यह व्यापार है. (वैसे अब धर्म का व्यापार भी खासा चल निकला है!)
यहां मजेदार बात ये है कि जो लोग कृत्रिम मेधा पर नियंत्रण की इस दक्षता को प्राप्त करने के लिए अरबों रुपए, नहीं डॉलर खर्च कर रहे हैं और जिनके मन में इसकी अदभुत सफलता पर लड्डू फूट रहे हैं वही सबके सामने आ कर अपनी छाती पीट रहे हैं. उनका कहना है कि कृत्रिम मेधा के विकास पर सरकार का नियंत्रण जरूरी है. इधर सरकारें ये जानती हैं कि ये सारे तकनीक खास कर AI आधारित तकनीक के सहारे उनकी सत्ता के दांत और पैने होते जा रहे हैं. सूचना तंत्र पर शिकंजा कसना उनके सत्ता में बने रहने की शर्त बनती जा रही है.
इस विषय में 2023 के दिसंबर में 28 देशों और यूरोपीय संघ के प्रतिनिधियों द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पर वैश्विक भागीदारी (जीपीएआई, उच्चारण जी-पे) की 'नई दिल्ली घोषणा' को अपनाया गया। इसमें की गई मंत्रिस्तरीय घोषणा के शब्दों को देखिए जो "भरोसेमंद AI के जिम्मेदार नेतृत्व के लिए सिद्धांतों" के प्रति इन देशों की प्रतिबद्धता की पुष्टि करती है जिसका उद्देश्य लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों में निहित होगा. इस तरह AI के भरोसेमंद, जिम्मेदार, टिकाऊ और मानव-केंद्रित उपयोग को बढ़ावा देने की योजना है। तो इसमें जिम्मेदार नेतृत्व भरोसेमंद AI के हाथों में है. यहां सरकार क्या कर रही है? सरकारें केवल सुगमकर्ता हैं, जिसे अंग्रेजी में फैसिलिटेटर कहते हैं.
वैसे इस बहस में नैतिक और जिम्मेदार AI की चर्चा बार बार होती है. ये नैतिक कृत्रिम मेधा कैसी होगी? इसको परिभाषित किए बगैर यह केवल एक कर्णप्रिय शब्द है जिसका जिसको जो समझ में आए वो मतलब निकल ले. वैसे ही जैसे नई दिल्ली घोषणा पत्र में इस बात पर जोर दिया गया है कि "सरकार का प्रयास सामाजिक विकास और समावेशी विकास के लिए AI की क्षमताओं का पूरा लाभ उठाना है।" लेकिन कैसे? ये कौन बताएगा? जो समझेगा वही तो! और समझता कौन है?
एक रिपोर्ट के मुताबिक " जेनेरिक एआई की परिवर्तनकारी और विघटनकारी क्षमता को पहचानते हुए," दुनियां के तीन प्रमुख समूह, ओईसीडी, जीपीएआई और यूनेस्को, तीन अन्य विशेषज्ञ संस्थाओं - AI कॉमन्स, IEEE और VDI की मदद से वैश्विक सहयोग, विश्वास और पारदर्शिता को आगे बढ़ाने के लिए साथ आए हैं. ये तीनो विशेषज्ञ संस्थाएं तकनीकी दक्षता वाले लोगों, योजना बनाने वाले विद्वानों के समूह हैं जो सरकारों को सलाह देने का काम करती हैं. मतलब ये कि निजी स्वामित्व वाले कॉरपोरेट AI के विकास पर शोध और नवाचार कर रहे हैं. और सरकार उनको नियंत्रित करने के लिए दूसरी निजी सलाहकारों वाली संस्थानों की मदद मांग रही है ताकि लोकोपयोगी और नैतिक AI की रूपरेखा बनाई जा सके. ऐसा लगता है की नील पोस्टमैन द्वारा रचित शब्द टेक्नोपॉली साकार हो उठा हो. टेक्नोपॉली यानी एक ऐसा समाज जहां सरकार या चर्च जैसी सामाजिक व्यवस्था के बजाय प्रौद्योगिकी ही नैतिक और दार्शनिक दिशा दशा तय करने लगती है. कॉरपोरेट जगत द्वारा संचालित तकनीकी विकास और राजनीति की गलबहियां इसी टेक्नोपॉली का पोषण और संवर्धन करने का व्यवस्थागत रूप है.
सत्ता में रहने के लिए गहन छल सबसे जरूरी साधन है.
डीपफेक के सवाल ने इसके राजनैतिक दुरुपयोग के सवाल को बहुत महत्वपूर्ण बना दिया है. आज तरह तरह के वीडियो और रील पार्टियों के मीडिया सेल से रोज प्रसारित किए जा रहे हैं. इनमें से अधिकांश झूठी और बरगलाने वाली और राजनैतिक उद्देश्यों को साधने वाली खबरें होती हैं जो आम जनता तक लगातार पहुंचाई जा रही हैं. डीपफेक ने दुनिया भर के चुनावों को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। उदाहरण के लिए, स्लोवाकिया में हाल के चुनावों में कुछ AI-जनित ऑडियो रिकॉर्डिंग फेसबुक पर प्रसारित हुई थी. इस डीपफेक वीडियो में एक उदार उम्मीदवार शराब की कीमतें बढ़ाने और चुनाव में धांधली करने की योजना पर चर्चा कर रहा था। यह असली लगने वाला व्यक्ति नहीं बल्कि AI तकनीक द्वारा प्रतिरोपित छवि थी. इसी तरह फरवरी 2023 के नाइजीरियाई चुनावों के दौरान, राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार को एक AI के द्वारा बनाए गए एक छद्म ऑडियो क्लिप के माध्यम से मतपत्रों में हेरफेर करने की योजना में झूठा फंसाया गया।
दुष्प्रचार फैलाने के सरल और सस्ते तरीकों पर भरोसा करते हुए डीपफेक विधि से मीडिया आख्यानों में हेराफेरी की जाती है, जिसमें प्रामाणिक वीडियो को गलत लेबल करना या गलत तरीके से प्रस्तुत करना, पाठ-आधारित दुष्प्रचार अभियान या उनका सीधे तौर पर प्रसारित किया जाना शामिल है जिनमें तेज़ी से वृद्धि हो रही है। इस तरह आम जनता को बरगलाना इतना आसान हो चुका है कि जनतंत्र की हत्या अब एक तकनीकी दक्षता का विषय बन गया है। इसके व्यापक परिणाम सामने आने वाले हैं.
इस साल दुनिया की आधी आबादी वाले 50 से अधिक देशों में चुनावों होने की संभावना है, और डर है कि डीपफेक उनकी अखंडता को गंभीर रूप से कमजोर कर सकते हैं। डिजिटल तकनीक की आम जनता में सहज स्वीकार्यता और इसके दुरुपयोग से राजनैतिक माहौल बनाने या बिगड़ने का व्यापार अपने यौवन पर है. डिजिटल मीडिया की ऐसी पहुंच राजनीति के चिर परिचित तरीकों, जिसमें लोगों के बीच जा कर उनमें राजनैतिक समझ और जागरूकता पैदा करने का श्रमसाध्य तरीका शामिल था, उसे उखाड़ कर तकनीकी तरीकों के वर्चस्व को स्थापित करने की तरफ बढ़ चुका है. यह ट्रेंड साफ तौर पर बहुराष्ट्रीय कंपनी को एक बढ़त देने का काम करती है जो राजनैतिक पार्टियों के माध्यम से अपना हित साधने का काम करें. डीपफेक जैसी तकनीक इसको और मजबूती प्रदान करने जा रही है. इस संदर्भ में पत्रकार सीन इलिंग ने 2020 अपने एक लेख में टिप्पणी की है कि यह रणनीति "सच्चाई और इसे उजागर करने वाले संस्थानों के बारे में व्यापक संदेह पैदा करने" की एक व्यापक रणनीति का हिस्सा है, और ऐसा करना, "उदार लोकतंत्र की नींव को नष्ट कर देती है".
झूठ और सच का फर्क जब इतना झीना हो जाता है कि उनके बीच अंतर करना असम्भव हो जाए तो एक और अजीब परिस्थिति पैदा होती है. 2018 कैलिफ़ोर्निया रिव्यू लेख में कानूनी विद्वान रॉबर्ट चेसनी और डेनिएल कीट्स सिट्रॉन द्वारा गढ़ा गया एक शब्द "झूठे का लाभांश" इस विद्रूप को सामने लाता है. वे कहते हैं कि "जैसे-जैसे जनता इस विचार के बारे में अधिक जागरूक हो जाती है कि वीडियो और ऑडियो को नकली बनाया जा सकता है, कुछ लोग जरूरत पड़ने पर अपने ही "प्रामाणिक ऑडियो और वीडियो" को डीपफेक बता कर अपने कार्यों के लिए जवाबदेही से बचने का प्रयास कर सकते हैं. और ऐसी परिस्थिति में आम जनता ठगी सी रह जायेगी. काफ्का के आत्मपरायेपन (Self-alienation) का यह नया सोपान लगता है.
और ऐसे में कहीं दूर रेडियो से मुकेश का गया पर एक गीत बजता सुनाई दे रहा है - जिंदगी ख्वाब है, ख्वाब में झूठ क्या और भला सच है क्या...और मजा ये कि यह गीत जिस फिल्म से है उसका नाम है, 'जागते रहो'.
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*वागीश स्कूली शिक्षा, शैक्षिक तकनीक, इतिहास और संस्कृति के अध्येता हैं।
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