अपने बहुत ही अद्भुत लेख "कविता अपना जनम ख़ुद तय करती है" में मोहन राणा स्वयं की तुलना एक खिड़की-साज़ से करते हैं जो अपनी कविता के माध्यम से पाठक के लिए शब्दों में रचा एक दृश्य 'क्रिएट'करते हैं। यदि आपको उनकी यह बात गहराई से समझनी है और यह बात उन्हीं की मनोरम भाषा में पढनी है तो उपरोक्त लेख के लिंक पर क्लिक करके उसे अवश्य पढ़ लीजिये। आज हम उनके द्वारा भेजी जो पांच कविताएँ यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं, उनकी लगभग हर पंक्ति हमारे लिए एक चित्र का निर्माण करती है। उनकी कविताएँ एक तरह से ढेर सारी पेंटिंग्स का कोलाज हैं।










