युद्ध-भूपति - युद्ध की विभीषिका पर सुभाष सेतिया की कविता
पूरा विश्व आजकल दम साधे देख रहा है कि अमेरिका-इजराइल द्वारा ईरान से शुरू किया गया युद्ध आखिर क्या करवट लेता है. सभी देश चिंतित हैं कि कहीं हम विश्व-युद्ध की ओर तो नहीं बढ़ रहे. ऐसे माहौल में हमारे वरिष्ठ मित्र, कवि एवं लेखक सुभाष सेतिया को उनकी एक पुरानी कविता की याद हो आई जो उन्होंने हमें प्रकाशन के लिए भेजी है . कविता युद्ध विरोधी तो नहीं कही जा सकती लेकिन जिस भावुक अंदाज़ में युद्ध की निर्ममता को रेखांकित करती है, वह अपने आप में युद्ध की व्यर्थता को ही जताने का भाव है. आइए, पढ़िए हृदय को द्रवित करने वाली इस कविता को जो दशकों पुरानी होते हुए भी सामयिक है.
युद्ध-भूपति - युद्ध की विभीषिका पर सुभाष सेतिया की कविता
“बोलो माँ,
इक बाल कहो तो,
भैया अब तक भी न आए,
क्यों न आए ?
नहीं कहोगी ?
क्यों रोती हो,
माँ बोलो कुछ
सिसक-सिसक कर
आँख पोंछ कर
मुझे देख बस
चुप रहती हो ।
मैंने जो राखी भेजी थी,
भैया ने तो कुछ न भेजा,
एक पत्र भी न आया, माँ,
है कठोर इतने क्यों भैया ?”
यह नन्हीं बाला क्या जाने
भैया इसके कहाँ गए हैं,
राखी भेज कर समझ रही है
भैया ने बाँधी भी होगी।
बोली माँ—‘हे बेटी मेरी !
भैया तेरे बहुत दूर हैं,
... वो देखो जहाँ चन्दा तारे,
चमक रहे हैं,
इस जग के पथ को आलोकित
करते-करते दमक रहे हैं।
वहीं है बैठा भैया तेरा
वहीं बुलाया भी करता है।
मुझे बुलाया भी करता है,
बेटी ! गोली एक लगी बस,
उड़कर ऊँचे जा बैठा वह !”
“माँ ! मैं भी जाऊँ ...”
“चुप कर, चुप कर
ऐसा नहीं कभी कहते हैं,
तू ही तो इक आस बची अब ।
एक गया था अड़तालीस में,
एक गया सन् बासठ में
और गया इक पैंसठ में !
हाय देव ! अब और बचा न,
और युद्ध भी तो आवेंगे,
अब किस को मैं भेज पाऊंगी ?”
बेटी को छाती से लगाया,
अश्रु की धारा बह निकली ।
नहीं वृत्त यह एक ही घर का
कितनी बहनें
कितनी माँएँ
आँसू की सरिता में बहतीं
चली जा रही
जिस सरिता का उद्गम है
वह युद्ध-भूपति ।
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सुभाष सेतिया आकाशवाणी से अपर महानिदेशक(समाचार) पद से रिटायर । भारतीय सूचना सेवा (IIS) के अधिकारी के रूप में आकाशवाणी और दूरदर्शन में समाचार संपादन, प्रकाशन विभाग में आजकल. योजना और Employment News का संपादन, पत्रकारिता का अध्यापन । 10 पुस्तकों का प्रकाशन । आकाशवाणी के विशेष संवाददाता के रूप में कई देशों की यात्रा ।