मोहन राणा की पांच नई कविताएँ
अपने बहुत ही अद्भुत लेख "कविता अपना जन्म खुद तय करती है" में मोहन राणा स्वयं की तुलना एक खिड़की-साज़ से करते हैं जो अपनी कविता के माध्यम से पाठक के लिए शब्दों में रचा एक दृश्य 'क्रिएट'करते हैं। यदि आपको उनकी यह बात गहराई से समझनी है और यह बात उन्हीं की मनोरम भाषा में पढनी है तो उपरोक्त लेख के लिंक पर क्लिक करके उसे अवश्य पढ़ लीजिये। आज हम उनके द्वारा भेजी जो पांच कविताएँ यहाँ प्रकाशित कर रहे हैं, उनकी लगभग हर पंक्ति हमारे लिए एक चित्र का निर्माण करती है। उनकी कविताएँ एक तरह से ढेर सारी पेंटिंग्स का कोलाज हैं।
समय की हरकत
घनी धूप में
खड़ा है एक पेड़
खिड़की के नज़दीक,
जहाज के पंखों सी खुली हैं पत्तियाँ
हिलती जब तब
समय की हरकत
जो छोड़ जाती है हमें
साये में अकेला
उसे दी जानी चाहिए सज़ा
हमारे झूठों के लिए
वसंत
शब्दों की किलाबंद दीवारें और बनाता
मैं घरौंदे ज्वारभाटा के तटों पर,
समय को बुकमार्क मानकर अपनी जीवनी की जिल्द में
अपनी दो पैर बराबर छाया को सीमांकित कर,
मैं बनाता कविता की खिड़कियाँ तुम्हारे लिए
कि उन्हें तुम हमेशा साथ रख सको इतनी हल्की पोर्टेबल
कि पलकें भारी लगें
कि सपनों में भी उनमें दिखे गोचर-अगोचर
उनका आकाश सच लगे कहीं भी जाग कर कर भी
धीरे - धीरे खिलते और कुछ मुरझाते भी हैं फूल,
वसंत में
उस घर को मालूम है अपना रास्ता
कि तुम वह गंतव्य हो
कल की तारीख़
संशय से ही सच निकलता है
मेरे जीवन में शत्रु एक ही है समय,
जो एक रेत की दीवार हर रोज
मैं उसके क्षितिज तक पहुँचता
कभी उसके शिखर तक कभी आधे तक
पर हर सुबह मैं फिर शुरू करता भाषा की उपत्यका में
खाली हाथ शब्द की तलाश में,
कि मुझे समय को समेटना है भाषा में उसे जी कर
पर हमेशा वहीं किसी कल से कल अंतराल में घड़ी का अलार्म बदल
और फिर सो जाता जैसे स्वप्नजा आज जागता
कल की तारीख़ समझ कर
लिखावट
रेखाओं को आकार बनाता
आकार को फिर रेखाओं में ढालता बार-बार
अंत में कि जब सब धुँधला हो जाएगा
नाम चेहरे आवाज़ें भी - कहीं दूर से मुझे पुकारती
तब भी कोई हल्की सी रेखा
गवाही देगी हमारी उपस्थिति की यहाँ
पुरानी किताब में दबा पीपल के पत्ते का कंकाल
उसका हरा रंग भले विलुप्त हो मुड़े पन्नों के बीच,
फिर भी मैं देख सकता हूँ उस पेड़ को जलती दुपहर,
सरसर पीपल के झोंकों में बची छाव तले बैठ
कि कभी लगता एक चमक गिरेगी छनकर तपते आकाश से
मुझे पर वहीं और समय चलता निर्विकार क्षितिज के पार
जैसे कुछ हुआ ही नहीं ना कभी होगा,
कि सब किसी अनदेखे कल की लिखावट है
मैं पढ़ नहीं पाया जिसे अब तक इस देशांतर में
ओस के चेहरे पर अदृश्य स्याही से लिखा शब्दचित्र
शब्दों से उकेरी समय की ऊँगलियों से खिंची खुरचन
अब भी बाकी हैं कुछ रेखाएँ मन की दीवारों पर एक पहचान के लिए,
आड़ी तिरछी पूरा जाल बिछा उनका हथेली पर ही नहीं
ओर छोर जहाँ तक मैं टटोल पाता अपने ही छुपाये उस सच को
टूट बिखर गया जो मेरी स्मृति के नक़्शे में
गुम हो कि गिर गया भटक गए रास्तों के किनारे,
मिटा हुआ मील का पत्थर
तुम्हें देखते जन्म
कहीं थी वह जगह कोई शब्द लिख मिटाने
अपनी अपनी दिशा में पानी पर उकेरने वह अर्थ
कि अनंत की वापसी तक बचा रहे,
मैं ठहरा मँझधार में दमसाधे एक टक
कि लपक लूँ वह स्मृति
कि तय हो आज सच क्या जो सहमत हो अपना
आइने के सामने तुम्हें देखते!
कुछ जगहें बार-बार बुलाती हैं और मैं लौटता
हर जगह का अपना समय होता है,
मैं फिसलता हूँ एक अभिशाप की तरह
फिर वापस
सीमान्तों में मिट चुके पूर्वजों के रास्तों पर
साँप सीढ़ी के खेल में गिरता फिर वहीं,
कि यह वरदान है फिसलना
मैं हर बार भूल जाता तुम्हें देखते पिछला जन्म!
**************

दिल्ली में जन्मे मोहन राणा पिछले दो दशकों से भी ज़्यादा से ब्रिटेन के बाथ शहर में रह रहे हैं। हाल ही में प्रकाशित ‘एकांत में रोशनदान’ सहित, उनके दस कविता संग्रह निकल चुके हैं। इंग्लैंड की आर्ट्स काउंसिल के सहयोग से उनकी ढेर सारी चुनी हुई कविताओं का अँग्रेजी अनुवाद भी प्रकाशित हुआ है। उनकी अनेक कवितायें यूरोप की कई भाषाओं में पढ़ी और अनुवाद की गईं हैं।