इधर सावन निकला जा रहा है और हमें सुभाष सेतिया की यह कविता प्राप्त हुई है, इसलिए हमें इसे जल्द प्रकाशित कर रहे हैं. इस पत्रिका के मिजाज से अलग होते हुए भी इसे स्थान दिया जा रहा है क्योंकि यह कविता भारतीय मानसून के सांस्कृतिक और प्राकृतिक आयामों का एक सुन्दर चित्रण है।











