मनोज पांडे की यह तीन छोटी छोटी कविताएँ छायावाद की रहस्यवादी परंपरा में सहज रूप से फिट होती हैं। अगर आपकी हिंदी कविताओं में रूचि रही है तो आपको इन कविताओं को पढ़कर तुरंत ही महादेवी वर्मा की रहस्यवादी कविताएँ स्मरण हो आएँगी। पहली ही कविता में तू ही तू था हर जगह / इसलिए कि तू न था” - यह अनुपस्थिति में उपस्थिति का रहस्यवादी भाव है। अन्य दोनों कविताओं में भी आप अज्ञात, अव्यक्त के प्रति प्रेम और तादात्म्य की आकांक्षा देख सकते हैं।











