मनोज तुली 'निर्झर' की नई कविताएँ
हमें नहीं पता कि जब मनोज 'निर्झर' अपनी यह कविता शहरीकरण लिख रहे थे तो उन्हें अज्ञेय की एक छोटी सी लेकिन बहुचर्चित कविता 'सांप' की याद आई या नहीं लेकिन हमें ज़रूर आई - "साँप ! तुम सभ्य तो हुए नहीं - नगर में बसना भी तुम्हें नहीं आया। तब कैसे सीखा डँसना--विष कहाँ पाया?" हालाँकि निर्झर की कविता में इतनी निराशा नहीं है! उन्हें अभी भी बीच-बीच में कुछ उम्मीद नज़र आती है - कुछ ऐसे घर दिख जाते हैं.......आप यह कविता में ही पढेंगे तो अच्छा लगेगा। कविता की निरंतरता को बनाये रखते हुए उन्होंने एक ग़ज़ल भी भेजी है जिसमें कच्चे पड़ रहे रिश्तों पर चिंता ज़ाहिर की गई है। हम यहाँ यह भी ज़िक्र कर दें कि मनोज 'निर्झर'हमारी वेब-पत्रिका से हाल ही में जुड़े हैं लेकिन जैसा कि आप नीचे दिए गए उनके परिचय में पढ़ेंगे, उनके गीत और कविताएँ प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होती रही हैं। हम आशा कर रहे हैं कि हमसे बना उनका यह रिश्ता स्थायी रहेगा।
मनोज तुली 'निर्झर' की नई कविताएँ
शहरीकरण
अब भी हैं कुछ ऐसे घर...
जिन में बाक़ी है ख़ुशी,
जिन में बाक़ी है हँसी!
जिन में बाक़ी हैं संस्कार,
मेल-जोल, रिश्तों में प्यार!
अब भी जब दिख जाता है...
नवनिर्मित अट्टालिकाओं के बीच,
कोई एक-दो मंज़िल का पुराना घर...
जिसका छोटा, ऊपर से कलगी लगाने वाला गेट,
गेट के साथ लगी नीची दीवार पर बने गमले।
थोड़ी पीछे हट कर बनी छत की रेलिंग
जिस से लटकती हुई फूलों के गुञ्छों वाली बेल
और छत पर बनी बस एक बरसाती।
अब भी दिख जाता है जब कोई ऐसा घर...
तो याद आ जाते हैं वो पुराने दिन...
जब हर कोई जानता था एक-दूजे को गली में,
जब किसी-किसी के पास ही होती थी कार।
जब होली-दिवाली पर लेकर जाते थे
एक-दूजे के घर मिठाई,
और शाम को बच्चे खेलते थे
छुपन-छुपाई, पकड़म-पकड़ाई।
याद आ जाती है उन दिनों की...
जब रात को खाना खाकर,
बाहर चक्कर लगाने भी जाते थे।
कोई घर आ जाता तो उसे
बस स्टैंड तक छोड़ने भी जाते थे।
और अब क्या है...?
नीचे दुकानें, ऊपर चार-चार मंज़िल के मकान,
हर फ़्लोर का मालिक अलग है
और सब के पास हैं दो-दो कार।
जिधर जाओ... बस बाज़ार ही बाज़ार,
गाड़ियों की चिल्ल-पौं और टू-व्हीलर्स की भरमार।
जैसे शहरीकरण और व्यवसायीकरण की आँधी ने
सब कुछ लील लिया हो।
ऐसे में कोई ऐसा घर देखकर
दिल को मिलता है सुकून,
जैसे रेगिस्तान में मिल जाए कोई बावड़ी।
"..............................."
अब भी हैं कुछ ऐसे घर...!
*अपना बसेरा*
अब कहाॅं वह पेड़ बाक़ी, अब कहाॅं वह छाॅंव है?
जिसमें था अपना बसेरा, क्या यही वह गाॅंव है!?
सड़कें पक्की बन गईं हैं, रिश्ते कच्चे हो गये!
बिल्डिंग ऊॅंची हो गई, नीयत छोटी ही रही!!
हाल क्या पूछे कोई, हर कान पर मोबाइल है!
बात पड़ोसी से नहीं पर मीडिया प्रोफ़ाइल है!!
अब क्या मिलना-मिलाना, आना-जाना, बुलाना!
वो चले डौगी घुमाने, हैड फ़ोन में म्यूजिक चला!!
अपनी सैल्फ़ी खींच ली बस, भाड़ में जाऐ जहां!
'निर्झर' ऐसे दौर में अब क्या कहें, किस से भला!!
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दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज से अंग्रेज़ी में स्नातक तथा भारतीय विद्या भवन, नई दिल्ली से पत्रकारिता में स्नातकोत्तर डिप्लोमा प्राप्त करने के उपरांत भारतीय सूचना सेवा के अधिकारी रहे और सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय की विभिन्न मीडिया इकाइयों में तीन दशकों से अधिक समय तक कार्य किया। वर्ष 2023 में सेवानिवृत्त होने से पूर्व रक्षा मंत्रालय के जनसंपर्क निदेशालय में ए.पी.आर.ओ (आर्मी), पी.आर.ओ (डिफेन्स) तथा सैनिक समाचार के वरिष्ठ संपादक रहे। आकाशवाणी में समाचार संपादक के रूप में भी कार्य किया। कविता और गीत-लेखन में ‘निर्झर’ नाम से सक्रिय। उनकी कविताएँ विभिन्न पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई हैं तथा ग़ज़लें आकाशवाणी और साहित्य आज तक जैसे मंचों पर प्रस्तुत की गई हैं। प्रकाशित काव्य-संग्रहों में ज़िक्रे-जाना तथा ग़ज़ल एकादशी (सह-लेखक के रूप में) शामिल हैं। कविता के साथ-साथ फोटोग्राफी और यात्रा में भी विशेष रुचि रखते हैं।