9 अप्रैल साहित्य दिवस पर विशेष : सच कहने का जोखिम तो उठाना होगा
आज (9 अप्रैल) को साहित्य दिवस है. राग दिल्ली वेब पत्रिका परिवार के लिए यह खासे संतोष का विषय है कि जयपुर में रह रहे वरिष्ठ पत्रकार एवं साहित्यकार वेदव्यास ने हमें साहित्य दिवस के अवसर पर शब्दों की महत्ता बताते हुए यह लेख भेजा है. लेखक एक तरह से पाठकों का आह्वान करते हैं कि शब्द और साहित्य को समाज के भीतर व्याप्त गैर बराबरी, हिंसा-प्रतिहिंसा और झूठ-सच को उजागर करने में लगाना चाहिए और वर्तमान समाज को भविष्य का नया सपना देना चाहिए। आइये पढ़ते हैं इस सुन्दर लेख को!
9 अप्रैल साहित्य दिवस पर विशेष
सच कहने का जोखिम तो उठाना होगा
वेदव्यास
जिस तरह बहता हुआ पानी और बोलता हुआ शब्द अपना रास्ता खुद बनाते हैं उसी तरह साहित्य में समाज और समय का संवाद भी अनवरत जारी रहता है। कौन लिखता है कौन पढ़ता है और कौन बोलता है उसकी प्रतिध्वनियां ही मनुष्य के मन और विचार में संवेदना का संसार रचती हैं। ज्ञान और विज्ञान के सभी विकास और सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक तथा राजनीतिक समता और विषमता के सभी कुरुक्षेत्र, केवल सृजन और संघर्ष से उदित शब्द ही लड़ते हैं।
आज 21वीं शताब्दी के सूचना और प्रौद्योगिकी के हृदयहीन बाजार में इसीलिए हमें कभी-कभी ऐसी भी लगता है कि शायद शब्द कहीं खो गए हैं, मौन हो गए हैं या फिर संवेदनहीन हो गए हैं। लेकिन धैर्य से देखें और सोचे तो आपको दिखाई देगा कि समय का प्रत्येक सत्य,शब्द ही संचरित कर रहा है और सृजन के नित्य नए सेतु और वाद-विवाद तथा प्रतिवाद के आधार भी बना रहा है।
साहित्य दिवस (9 अप्रैल) इसी शब्द-यात्रा का उत्सव है। यह कनाडाई लेखक मॉरिस बिलिंग के 1999 के प्रस्ताव से जन्मा, जो विश्व पुस्तक दिवस की तर्ज पर साहित्य को समर्पित है। भारत में हिंदी अकादमी और साहित्य संगठन इसे प्रोत्साहित करते हैं—सेमिनार, कवि-सम्मेलन, पुस्तक-चर्चाएँ आयोजित हो रही हैं।
यह दिवस शब्द को याद दिलाता है कि साहित्य से समाज तक की यह शब्द यात्रा परिवर्तन की एक ऐसी मशाल हैं जो हजारों भाषाओं के साथ करोड़ों की जन चेतना में सद्भाव, सहिष्णुता और मानवीय सरोकारों की खिड़कियां खोलती रहती है। कोई पाँच हजार साल से सभ्यता और संस्कृति का उज्जवल पथ यह साहित्य ही आलोकित कर रहा है क्योंकि शब्द कभी मरता नहीं है और नूतन विचरण करता रहता है।
साहित्य का सत्य, शिव और सुंदरम् ही बनाता है और धर्म, जाति भाषा और क्षेत्रीयता की सरहदों को लांघकर शब्द की शाश्वत शक्ति और भक्ति का निर्माण भी करता है। शब्द और साहित्य की चेतना यह बताती हैं कि राजपाट और सुख-दुःख बदलते रहते हैं लेकिन रेत और पानी का रिश्ता कभी नहीं बदलता। धरती और आकाश की इच्छाएं कभी नहीं हारती और शब्द की विश्वसनीयता का गुरुत्वाकर्षण कभी नहीं मरता।
आज हमारे समाज में दुर्भाग्य से मनुष्य और प्रकृति के बीच एक ऐसा मनमुटाव बढ़ रहा है कि लोग अपने भूत, भविष्य और वर्तमान की त्रिकाल छाया से ग्रस्त है और सामाजिक, आर्थिक गैर बराबरी से व्याकुल और शोकाकुल है। इधर टैक्नोलॉजी लगातार मनुष्य को दिशाहीन और पैसे की खोज में समाज को संवेदनहीन और केवल सुख-शांति की आवश्यकता, हमारे जीवन दर्शन को अत्यधिक असुरक्षित बना रही है तो उधर सत्ता और व्यवस्था की आदिम हिंसक प्रवृत्तियां, शब्द और सत्य पर निरंतर हमले कर रही हैं। फिर अराजकता के बीच अविश्वनीयता का एक ऐसा माहौल अब बन गया है कि वर्षा ऋतु में कोयल जैसे मौन हो जाती है और मेंढ़क जैसे मुखर-वाचाल हो जाते हैं, वैसे ही लेखक और साहित्यकार भी बाजार, मीडिया और राजनीति के कोलाहल में आजकल अपने को अनुसना महसूस कर रहा है।
लेकिन मित्रों! आप सब जानते हैं कि शब्द की नदी सरस्वती भी समय और अज्ञान के अंधेरे में कई बार मन से ओझल हो जाती है लेकिन वह देर-सेवर बूंद-बूंद बनकर, अग्नि परीक्षा का सृजन भी करती है और जन्म से मृत्यु तक मनुष्य की प्राण वायु बनकर बोलती भी है। वैदिक ऋचाओं से लेकर मीरां बाई के पदों तक और रामायण से लेकर महाभारत तक यह शब्द ही साहित्य और समाज को समय के सभी प्रश्नों से मुठभेड़ करना सिखाता है।
यह शब्द ही कभी निर्गुण और सगुणधारा बनकर बहते हैं तो यह सृजन का सरोकार ही कभी युद्ध और शांति का भाग्य लिखता है तो यह क्रोंचवध ही कभी शिकारी को ऋषि वाल्मीकि बनाता है तो कभी रवीन्द्रनाथ बनकर घर-घर में गाया जाता है तो कभी स्वामी विवेकानंद बनकर विश्व को धर्म की सनातन सहिष्णु व्याख्या देता है तो कभी भीमराव अंबेडकर बनकर मनुष्य होने का अधिकार और सम्मान भी सिखाता है। इस तरह शब्द कभी निरर्थक, लाचार और उदास नहीं होता तथा वह उपेक्षा और विस्मृति के गर्भ में रहकर भी अधिक प्रखर और अमृतधारा बन जाता है।
ऐसे में शब्द और साहित्य का लोकतंत्र-सदैव राजनीति के आगे चलने वाली मशाल ही होता है और राजा की हिंसा में नहीं अपितु प्रजा (जनता) की अहिंसा में ही फलता-फूलता है। सामाजिक चेतना का प्रथम सृजन-कर्ता और निर्माता यह शब्द ही है और साहित्यकार इसी पुनर्जागरण का प्रतिफल रचता और गाता है क्योंकि मनुष्य का शाश्वत सत्य तो गरीब और सर्वहारा की मंगलध्वनि में ही युगों-युगों तक प्रवाहमान बना रहता है। अतः घबराइए मत! शब्द और साहित्य को समाज के भीतर व्याप्त गैर बराबरी, हिंसा-प्रतिहिंसा और झूठ-सच को उजागर करने में अर्पित करते हुए वर्तमान समाज को भविष्य का नया सपना दीजिए।
शब्द और साहित्य की प्रासंगिकता फिर आज यही है कि यथास्थिति को बदलने का जोखिम उठाएं। रागदरबारी को छोड़कर राग भैरवी और राग कल्याणी गायें। मनुष्य होने की गरिमा का महाकाव्य सुनाएं और दसों-दिशाओं में व्याप्त मुक्ति संग्राम की जन चेतना को एकजुट बनाएं।
साहित्य दिवस की शुभकामनाएँ! शब्द अमर है—उसे जीवंत रखें।
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साहित्य मनीषी वेदव्यास वरिष्ठ पत्रकार हैं और दशकों से शिक्षा, साहित्य, कला एवं संस्कृति के क्षेत्र में अनवरत लेखन में जुटे हैं. लम्बे समय तक इन्होंने आकाशवाणी जयपुर में अपनी सेवायें दी हैं. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर लेखन किया है और राजस्थान सरकार द्वारा गठित कई समितियों के सदस्य रहे हैं. राजस्थान सरकार द्वारा विभिन्न पुरस्कारों से भी नवाज़े गए हैं. हिंदी के अलावा राजस्थानी में भी लेखन किया है.