क्या भारत बन सकता है एआई में सुपर पावर : संभावनाएँ एवं चुनौतियाँ
अभी हाल ही आपने इस वेब पत्रिका में डॉ. शैलेश शुक्ला एक लेख देखा होगा - डिजिटल थकान: क्या निरंतर कनेक्टिविटी हमें भीतर से खाली कर रही है? आज उन्हीं का हम दूसरा लेख प्रस्तुत कर रहे हैं जो भारत में ‘ए आई’ सुपर पॉवर बनने की संभावनाओं और इस रास्ते में आने वाली चुनौतियों की गहन पड़ताल कर रहा है. इस विषय पर हिंदी में इतना में इतने विस्तृत लेख संभवत: अभी बहुत ना लिखे गए हों. इस लेख के अंत में हम अपनी वेबपत्रिका में प्रकाशित कुछ लेखों के लिंक दे रहे हैं जो ए आई या कृत्रिम मेधा के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते हैं.
क्या भारत बन सकता है एआई में सुपर पावर : संभावनाएँ एवं चुनौतियाँ
डॉ. शैलेश शुक्ला
भारत के सामने आज एक ऐसा ऐतिहासिक अवसर खड़ा है जिसमें वह केवल “एआई उपयोगकर्ता”, अर्थात दूसरे देशों में बने मॉडलों का उपभोक्ता बनकर न रह जाए, बल्कि “एआई निर्माता” और “एआई नियम-निर्माता” की भूमिका में भी उभरे। यह दावा भावनात्मक राष्ट्रवाद नहीं, बल्कि उन ठोस प्रवृत्तियों पर आधारित है जो पिछले कुछ वर्षों में भारत की डिजिटल अर्थव्यवस्था, सार्वजनिक डिजिटल अवसंरचना, प्रतिभा-आधार, स्टार्टअप इकोसिस्टम, और सरकारी-निजी निवेश के संगम से बनी हैं। पिछले दशक में भारत ने डिजिटल भुगतान, आधार-आधारित पहचान, और बड़े पैमाने की सरकारी डिजिटल सेवाओं के माध्यम से जिस तरह “जन-स्तर का डिजिटल परिवर्तन” किया, वही अनुभव एआई युग में उसे विशिष्ट बढ़त दे सकता है। सवाल यह नहीं कि भारत में संभावनाएँ हैं या नहीं; सवाल यह है कि क्या हम समय रहते सही रणनीति, सही निवेश और सही संस्थागत तैयारी से इस संभावना को “वैश्विक नेतृत्व” में बदल पाएँगे।
सबसे पहले, भारत के पास वह “स्केल” है जो एआई के लिए ईंधन का काम करता है—वह है विशाल डिजिटल उपयोगकर्ता आधार, बहुभाषी समाज, विविध उद्योग, और वास्तविक दुनिया के बड़े डेटासेट। एआई का विकास केवल प्रयोगशाला में नहीं होता; वह समाज के वास्तविक उपयोग-परिदृश्यों में परिपक्व होता है। भारत में वित्त, स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा, प्रशासन, परिवहन और ई-कॉमर्स—हर क्षेत्र में डिजिटल तकनीक अपनाने का स्तर बढ़ा है। डिजिटल भुगतान प्रणाली का उदाहरण इस स्केल का सबसे स्पष्ट प्रमाण है। इकोनॉमिक टाइम्स की 3 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में सरकार के हवाले से बताया गया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में दिसंबर तक ही एकीकृत भुगतान इंटरफेस के लेनदेन का कुल मूल्य 230 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच चुका था, और रिपोर्ट में यह भी उल्लेख है कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने इसे मात्रा के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा त्वरित-भुगतान प्रणाली के रूप में पहचाना है। यह तथ्य सिर्फ भुगतान की सफलता नहीं बताता, बल्कि यह दर्शाता है कि भारत बड़े पैमाने पर डिजिटल ट्रांजैक्शन, धोखाधड़ी नियंत्रण, जोखिम मॉडलिंग और उपभोक्ता-स्तर की तकनीक को साथ लेकर चलने में सक्षम है—और यही क्षमता आगे एआई-आधारित वित्तीय सेवाओं, क्रेडिट स्कोरिंग, व्यक्तिगत वित्त प्रबंधन और साइबर सुरक्षा में निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
दूसरा, भारत की सार्वजनिक डिजिटल अवसंरचना का अनुभव—जिसे दुनिया अब “डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर” के रूप में समझ रही है—एआई युग में भारत को नीति और तकनीक, दोनों मोर्चों पर लाभ दे सकता है। एआई के लिए केवल मॉडल बनाना पर्याप्त नहीं; उसे भरोसेमंद डिजिटल ढांचे पर तैनात करना भी उतना ही जरूरी है ताकि सेवा वितरण तेज़, समावेशी और लागत-कुशल हो। जब सरकारें और संस्थान एआई के लिए शासन-तंत्र बनाते हैं, तब डेटा सुरक्षा, पहचान सत्यापन, लाभार्थी लक्ष्य-निर्धारण, धोखाधड़ी रोकथाम, और सर्विस-डिलिवरी जैसी चुनौतियाँ सामने आती हैं। भारत ने इन क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर डिजिटल प्रणालियाँ चलाकर जो सीख हासिल की है, वह कई देशों की तुलना में अधिक व्यावहारिक और जमीन से जुड़ी है। यही “प्रैक्टिकल गवर्नेंस अनुभव” भारत को एआई के इस्तेमाल में तेज़ी से आगे बढ़ने की क्षमता देता है—बशर्ते हम अधिकार-आधारित डेटा शासन और पारदर्शिता को साथ लेकर चलें।
तीसरा, एआई सुपर पावर बनने के लिए सबसे महत्वपूर्ण चीज है—कम्प्यूट शक्ति, यानी उच्च क्षमता वाले प्रोसेसर/जीपीयू और डेटा सेंटर। इसी मोर्चे पर भारत ने पिछले कुछ समय में स्पष्ट गति पकड़ी है। भारत सरकार के प्रेस सूचना ब्यूरो की 12 अक्टूबर 2025 की आधिकारिक जानकारी में कहा गया कि इंडिया एआई मिशन के लिए पाँच वर्षों में 10,300 करोड़ रुपये से अधिक का आवंटन किया गया है और इस मिशन के अंतर्गत बड़े पैमाने पर जीपीयू तैनाती का लक्ष्य रखा गया है। हाल ही में प्रेस सूचना ब्यूरो की 17 फरवरी 2026 की रिलीज़ (जिसमें “इंडियाज़ एआई मोमेंट” का उल्लेख है) में एआई शिखर सम्मेलन के माध्यम से अतिरिक्त जीपीयू क्षमता, वैश्विक भागीदारी और अगले चरण के विस्तार की दिशा पर जोर दिखता है। इसके साथ भारत सरकार के इंडिया एआई पोर्टल पर “कम्प्यूट कैपेसिटी” पहल के तहत सार्वजनिक-निजी भागीदारी से 18,000 से अधिक जीपीयू-आधारित अवसंरचना की बात कही गई है, और यह भी बताया गया है कि यह क्षमता शोध, स्टार्टअप, एमएसएमई, छात्र और सार्वजनिक क्षेत्र के उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध कराने की दिशा में डिज़ाइन की गई है। ये तीनों कारक मिलकर यह संकेत देते हैं कि भारत ने “एआई के लिए कम्प्यूट” को नीति-स्तर पर प्राथमिकता बना लिया है; और यही प्राथमिकता आने वाले वर्षों में भारत को मॉडल निर्माण, प्रशिक्षण, और स्थानीय जरूरतों के अनुरूप समाधान विकसित करने में मदद करेगी।
चौथा, एआई सुपर पावर बनने के लिए भारत को “चिप्स और सेमीकंडक्टर” की घरेलू क्षमता भी बढ़ानी होगी, क्योंकि एआई अर्थव्यवस्था के केंद्र में वही हार्डवेयर है। इस दिशा में भारत सरकार की 4 फरवरी 2026 की प्रेस सूचना ब्यूरो रिलीज़ में सेमीकंडक्टर परियोजनाओं के निवेश और उत्पादन क्षमता से जुड़े ठोस विवरण दिए गए हैं—जैसे गुजरात में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की सेमीकंडक्टर फैब परियोजना का घोषित निवेश 91,526 करोड़ रुपये और क्षमता 50,000 वेफर स्टार्ट्स प्रति माह; असम में पैकेजिंग/असेंबली आधारित परियोजना; तथा अन्य कंपनियों की पैकेजिंग सुविधाएँ और उनकी दैनिक यूनिट क्षमता। यह जानकारी इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एआई का भविष्य “कम्प्यूट-इंटेंसिव” है, और कम्प्यूट का भविष्य “चिप-इंटेंसिव”। यदि भारत को एआई में रणनीतिक स्वायत्तता चाहिए, तो उसे हार्डवेयर वैल्यू-चेन में भी अपनी भूमिका मजबूत करनी होगी। हालिया बजट-संबंधी रिपोर्टिंग में भी सेमीकंडक्टर मिशन के अगले चरण की चर्चा दिखाई देती है—इकोनॉमिक टाइम्स (टेलीकॉम संस्करण) की 2 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में “सेमीकंडक्टर मिशन 2.0” के लिए प्रावधान की बात कही गई है।
इन तथ्यों के आधार पर एक स्पष्ट तस्वीर बनती है : भारत के पास एआई सुपर पावर बनने के लिए चार मजबूत स्तंभ उभर रहे हैं—डिजिटल स्केल, सार्वजनिक डिजिटल अवसंरचना का अनुभव, कम्प्यूट क्षमता का रणनीतिक निर्माण, और सेमीकंडक्टर वैल्यू-चेन में प्रवेश। लेकिन संभावनाएँ अपने आप सफलता नहीं बनतीं। सफलता के लिए जरूरी है कि हम “प्रतिभा और शोध” को उसी गति से मजबूत करें, “नैतिक-कानूनी ढांचे” को भरोसेमंद बनाएं, और “भारतीय भाषाओं तथा स्थानीय जरूरतों” के अनुरूप एआई को व्यावहारिक उत्पादों में बदलें—ताकि भारत सिर्फ निवेश घोषणाओं का देश नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर असरदार एआई समाधानों का निर्माता बन सके।
भारत के एआई सुपर पावर बनने की संभावना का असली आधार केवल बड़े बजट या बड़ी घोषणाएँ नहीं हैं। किसी भी देश का तकनीकी नेतृत्व अंततः तीन चीजों पर टिकता है—प्रतिभा की गुणवत्ता, नवाचार की गति और उद्योग-समाज में तकनीक का वास्तविक उपयोग। भारत के पक्ष में यह तीनों तत्व एक साथ मजबूत होते दिख रहे हैं। यही कारण है कि आज भारत की चर्चा केवल “डिजिटल अपनाने” तक सीमित नहीं रही; अब बात “एआई-आधारित उत्पाद”, “मूलभूत मॉडल”, “उद्योग-स्तरीय समाधान” और “वैश्विक पूंजी” तक पहुँच चुकी है।
1) प्रतिभा-सम्पदा : भारत की सबसे बड़ी पूंजी
एआई के युग में सबसे मूल्यवान संसाधन तेल या सोना नहीं, बल्कि कौशल है—गणित, सांख्यिकी, कंप्यूटिंग, भाषा-विज्ञान, और डोमेन-विशेष ज्ञान का संयोजन। भारत के पास दशकों से विकसित एक विशाल तकनीकी-शिक्षा आधार रहा है; अब वही आधार एआई में निर्णायक बन रहा है। दुनिया की बड़ी तकनीकी कंपनियों और वैश्विक अनुसंधान संस्थानों में भारतीय प्रतिभा की मौजूदगी यह संकेत देती है कि भारत के पास “मानव-पूंजी” की कमी नहीं, बल्कि चुनौती है—इस प्रतिभा को देश के भीतर बड़े-पैमाने पर अनुसंधान, उत्पाद और स्टार्टअप में कैसे बदला जाए। इसी दिशा में “कम्प्यूट संसाधन सुलभ कराने” और “शोध-संस्थानों को सक्षम बनाने” वाली सरकारी रणनीतियाँ महत्वपूर्ण बनती हैं।
प्रेस सूचना ब्यूरो की 17 फरवरी 2026 की आधिकारिक जानकारी के अनुसार “इंडिया एआई मिशन” के अंतर्गत 38,000 से अधिक उच्च-स्तरीय जीपीयू को उपयोगकर्ताओं के लिए उपलब्ध कराने और कम्प्यूट की बाधा घटाने की बात कही गई है, साथ ही स्टार्टअप, शोधकर्ता, छात्र और सार्वजनिक संस्थानों के लिए कम लागत पर कंप्यूट उपलब्ध कराने का दृष्टिकोण रखा गया है। यह पहल सीधे-सीधे प्रतिभा को शक्ति देती है—क्योंकि आज एआई में केवल दिमाग नहीं, पर्याप्त कम्प्यूट भी चाहिए।
2) स्टार्टअप इकोसिस्टम : “उपयोग-केस” से “फ्रंटियर मॉडल” तक छलांग
कुछ वर्ष पहले तक भारत में एआई का मतलब अधिकतर “एप्लिकेशन-लेयर” समाधान था—जैसे ग्राहक-सेवा ऑटोमेशन, सिफारिश-तंत्र, धोखाधड़ी पहचान, या डेटा विश्लेषण। अब भारत में “मूलभूत मॉडल” और उच्च-स्तरीय जनरेटिव एआई की दिशा में भी ठोस गतिविधि दिखाई दे रही है। उदाहरण के लिए, टाइम्स ऑफ इंडिया की 20 फरवरी 2026 की रिपोर्ट के अनुसार भारतीय स्टार्टअप ‘सर्वम’ ने 105 अरब पैरामीटर वाला एक बड़ा भाषा-मॉडल प्रस्तुत किया है और भारतीय भाषाओं पर फोकस के साथ व्यावसायिक उपयोग के उपकरणों की दिशा में काम बताया गया है। इस तरह की उपलब्धि संकेत देती है कि भारत का एआई इकोसिस्टम अब केवल “कंज्यूमर” या “इंटीग्रेटर” नहीं रहना चाहता; वह वैश्विक प्रतिस्पर्धा के “फ्रंटियर” में जगह बनाने की कोशिश कर रहा है।
हालांकि यह भी सच है कि भारत में जनरेटिव एआई स्टार्टअप फंडिंग अभी वैश्विक स्तर के मुकाबले कम है, लेकिन वृद्धि की दिशा साफ है। नैसकॉम की “इंडिया जनरेटिव एआई स्टार्टअप लैंडस्केप 2025” रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के जनरेटिव एआई स्टार्टअप्स की कुल फंडिंग 2025 की पहली छमाही तक बढ़कर लगभग 990 मिलियन डॉलर (कुल मिलाकर) तक पहुँची और वर्ष-दर-वर्ष वृद्धि दर्ज की गई। यह आंकड़ा बताता है कि पूंजी प्रवाह बढ़ रहा है, भले ही भारत को अभी बड़े-स्तर के दीर्घकालिक शोध-निवेश और “डीप-टेक” पूंजी की और जरूरत हो।
और अब वैश्विक पूंजी भी भारत पर बड़ा दांव लगा रही है। इकोनॉमिक टाइम्स की 20 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में सिलिकन वैली की बड़ी निवेशक संस्था जनरल कैटालिस्ट द्वारा अगले पाँच वर्षों में भारत में 5 अरब डॉलर निवेश-प्रतिबद्धता का उल्लेख है, जिसमें एआई को प्रमुख क्षेत्रों में रखा गया है। यह “विश्वास-मतदान” इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एआई में जीतने के लिए सिर्फ तकनीक नहीं, “लंबी अवधि की पूंजी” भी चाहिए।
3) उद्योग-स्तरीय अंगीकरण : भारत केवल प्रयोग नहीं कर रहा, लागू भी कर रहा है
एआई सुपर पावर बनने के लिए केवल मॉडल बनाना पर्याप्त नहीं; देश के उद्योगों में एआई का स्केल पर उपयोग होना चाहिए—तभी उत्पादकता बढ़ती है, लागत घटती है, और वैश्विक प्रतिस्पर्धा में देश की हिस्सेदारी बढ़ती है। इस संदर्भ में भारत के लिए एक मजबूत संकेत सरकारी-आधिकारिक स्रोतों में भी मिलता है। प्रेस सूचना ब्यूरो की 30 दिसंबर 2025 की रिलीज़ में नैसकॉम के एआई अंगीकरण सूचकांक का हवाला देते हुए बताया गया कि भारत का स्कोर 4 में से 2.45 है और 87% उद्यम किसी-न-किसी रूप में एआई समाधान सक्रिय रूप से उपयोग कर रहे हैं; इसी रिलीज़ में यह भी उल्लेख है कि एक सर्वे के अनुसार लगभग 26% भारतीय कंपनियाँ “स्केल पर एआई परिपक्वता” तक पहुँची हैं।
ये आंकड़े बहुत अर्थपूर्ण हैं। पहला, यह बताता है कि एआई भारत में “हाइप” नहीं, वास्तविक व्यावसायिक अभ्यास बन रहा है। दूसरा, यह संकेत देता है कि अभी भी बड़ी संख्या में कंपनियाँ शुरुआती या मध्यम चरण में हैं; यानी आगे विशाल बाजार-विस्तार संभव है। तीसरा, जब एआई का उपयोग उद्योगों में बढ़ता है, तो मांग-पक्ष से स्टार्टअप और शोध को निरंतर ऑर्डर, डेटा-समस्याएँ और वास्तविक उपयोग-परिदृश्य मिलते हैं—यही किसी देश के एआई इकोसिस्टम को आत्मनिर्भर बनाता है।
4) भारत की “बड़ी प्रयोगशाला” : भुगतान-तंत्र से एआई उत्पादकता तक
भारत के पास एक विशिष्ट लाभ यह भी है कि उसने डिजिटल लेन-देन और जन-स्तरीय डिजिटल सेवाओं में स्केल का जो अनुभव हासिल किया है, वह एआई-आधारित नवाचार के लिए “बड़ी प्रयोगशाला” जैसा है। इकोनॉमिक टाइम्स की 3 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में सरकार के हवाले से बताया गया कि वित्तीय वर्ष 2025-26 में दिसंबर तक डिजिटल भुगतान तंत्र के जरिए लेन-देन का कुल मूल्य 230 लाख करोड़ रुपये तक पहुँच चुका है; उसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की जून 2025 की रिपोर्ट ने भारत के त्वरित भुगतान तंत्र को लेन-देन मात्रा के आधार पर दुनिया का सबसे बड़ा खुदरा त्वरित-भुगतान तंत्र बताया।
यह क्यों महत्वपूर्ण है? क्योंकि एआई के लिए सबसे अच्छे उपयोग-क्षेत्र वही हैं जहाँ बड़े पैमाने पर, उच्च-आवृत्ति और विविध प्रकार के लेन-देन/आचरण होते हैं—जैसे भुगतान, बैंकिंग, बीमा, खुदरा, लॉजिस्टिक्स। यहाँ एआई धोखाधड़ी रोकने, जोखिम-प्रबंधन, व्यक्तिगत ऑफरिंग, ग्राहक-सेवा, और साइबर-सुरक्षा में निर्णायक हो सकता है। भारत का स्केल उसे “डेटा-समस्या” नहीं, “डेटा-अवसर” देता है—बस शर्त यह है कि डेटा-शासन, गोपनीयता और सुरक्षा को अधिकार-सम्मत ढंग से साधा जाए।
5) भारतीय भाषाएँ : भारत का सबसे बड़ा अवसर और सबसे कठिन चुनौती
भारत की एआई यात्रा का सबसे अलग और निर्णायक पहलू है—भारतीय भाषाएँ। दुनिया में अधिकांश एआई मॉडल जिन भाषाई संसाधनों पर प्रशिक्षित हुए, उनमें अंग्रेज़ी का अनुपात बहुत अधिक रहा। भारत के लिए एआई सुपर पावर बनने का वास्तविक अर्थ तब होगा जब वह अपनी भाषाओं में उच्च-गुणवत्ता वाले मॉडल, अनुवाद, आवाज़-तकनीक, और ज्ञान-सहायक सेवाएँ विकसित करे—ताकि एआई का लाभ केवल शहरी, अंग्रेज़ी-सक्षम वर्ग तक सीमित न रहे, बल्कि गाँव-कस्बों तक पहुँचे।
यहाँ “लोकल डेटा”, “भाषाई डेटासेट”, “सुरक्षित और नैतिक डेटा-साझेदारी”, और “भाषाई अनुसंधान” की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में ‘सर्वम’ जैसे प्रयासों का भारतीय भाषाओं पर फोकस इसी दिशा में एक संकेत है कि भारत का नवाचार-तंत्र भाषाई विविधता को प्रतिस्पर्धात्मक लाभ में बदलना चाहता है। यदि भारत भारतीय भाषाओं में विश्व-स्तरीय एआई समाधान बनाता है, तो वह केवल घरेलू आवश्यकता नहीं पूरा करेगा; वह वैश्विक दक्षिण और बहुभाषी देशों के लिए भी नेतृत्वकारी मॉडल प्रस्तुत कर सकता है।
6) लेकिन “संभावना” के साथ “खतरे” भी : कौशल-अंतर, डेटा-गुणवत्ता, और भरोसा
यहाँ एक ईमानदार स्वीकार जरूरी है—एआई सुपर पावर बनने की राह में बाधाएँ भी वास्तविक हैं। भारत को तीन मोर्चों पर विशेष सावधानी चाहिए :
(क) कौशल-अंतर : केवल शीर्ष संस्थानों की प्रतिभा से देश सुपर पावर नहीं बनता; लाखों युवाओं का कौशल-उन्नयन और उद्योग-उन्मुख प्रशिक्षण चाहिए।
(ख) डेटा-गुणवत्ता और डेटा-शासन : अगर डेटा असंगत, पक्षपाती, या असुरक्षित है, तो एआई निर्णय भी जोखिमपूर्ण होंगे।
(ग) भरोसा और नियमन : एआई में जनता का भरोसा सबसे बड़ा पूंजी है। हाल के महीनों में भारत ने एआई-जनित सामग्री और डीपफेक पर नियमों को कड़ा किया है; इससे स्पष्ट है कि सरकार गलत सूचना और हानिकारक सामग्री को गंभीरता से ले रही है। पर “भरोसा” केवल नियमों से नहीं बनता; पारदर्शिता, जवाबदेही, और नागरिक अधिकारों के सम्मान से बनता है।
इन बिंदुओं के साथ भारत की संभावनाएँ और अधिक ठोस हो जाती हैं : प्रतिभा-आधार मौजूद है, उद्योग-अंगीकरण बढ़ रहा है, स्टार्टअप इकोसिस्टम नई ऊँचाइयों की तरफ बढ़ रहा है, और सरकारी-स्तर पर कम्प्यूट सुलभ कराने की नीति स्पष्ट दिखती है। अब अगला सवाल है—भारत इस यात्रा में किन “रणनीतिक कदमों” से निर्णायक बढ़त बना सकता है, और किन नीतिगत-संस्थागत सुधारों से एआई को सामाजिक-आर्थिक विकास का इंजन बनाया जा सकता है।
भारत की एआई-महाशक्ति बनने की चर्चा तब तक अधूरी है जब तक हम यह स्पष्ट न करें कि “संभावना” को “सिद्धि” में बदलने के लिए किन रणनीतिक कदमों की जरूरत है—और किन मोर्चों पर जोखिमों का ईमानदार प्रबंधन करना होगा। एआई का समय अब केवल प्रयोग और प्रदर्शन का नहीं रहा; यह उत्पादन-क्षमता, शासन-क्षमता और प्रतिस्पर्धी अर्थव्यवस्था का निर्णायक कारक बनता जा रहा है। इसलिए आज भारत के सामने लक्ष्य दोहरा है—पहला, एआई को विकास-इंजन बनाना; दूसरा, एआई को भरोसेमंद बनाना। अगर इनमें से एक भी कमजोर रहा, तो “सुपर पावर” का सपना या तो अधूरा रह जाएगा, या फिर सामाजिक-राजनीतिक विरोधों में उलझ जाएगा। अब हम आते हैं रणनीतिक रोडमैप :पर
1) “कम्प्यूट–डेटा–टैलेंट–उत्पाद” की एक साथ गति
एआई नेतृत्व किसी एक स्तंभ से नहीं बनता। इसे चार पहियों वाली गाड़ी समझिए—कम्प्यूट, डेटा, प्रतिभा, और उत्पाद/उपयोग। भारत के लिए अच्छी खबर यह है कि अब नीति-स्तर पर “कम्प्यूट क्षमता” को प्राथमिकता दी जा रही है। प्रेस सूचना ब्यूरो की 17 फरवरी 2026 की विज्ञप्ति में एआई शिखर सम्मेलन के संदर्भ में अतिरिक्त जीपीयू क्षमता और अगले चरण के विस्तार का उल्लेख है, साथ ही दो वर्षों में बड़े निवेश प्रवाह को लेकर आशावाद दर्ज किया गया है। इस तरह की आधिकारिक दिशा-घोषणा तभी असरदार होगी जब यह “सुलभ कम्प्यूट” के रूप में शोधकर्ताओं, स्टार्टअप और विश्वविद्यालयों तक पहुँचे—और वह भी पारदर्शी शुल्क-ढांचे व निष्पक्ष आवंटन के साथ।
लेकिन कम्प्यूट अकेला पर्याप्त नहीं। “डेटा” का प्रश्न सबसे नाजुक है : डेटा जितना विशाल होगा, उतना ही जिम्मेदारी का बोझ भी बढ़ेगा। भारत के पास स्केल है, पर साथ ही बहुभाषी-बहुसांस्कृतिक समाज में डेटा-पक्षपात, डेटा-गुणवत्ता और गोपनीयता की चुनौती भी बड़ी है। सुपर पावर बनने का अर्थ है कि भारत डेटा-शासन का ऐसा मॉडल खड़ा करे जो नागरिक अधिकारों की रक्षा करते हुए नवाचार को गति दे। यह वही बिंदु है जहाँ लोकतांत्रिक भरोसा तय होता है।
2) उद्योग में एआई का “पायलट से पॉपुलेशन-स्केल” की तरफ जाना
भारत में एआई का भविष्य केवल प्रयोगशालाओं या कुछ चुनिंदा कंपनियों तक सीमित नहीं हो सकता। उसे उद्योग के बड़े हिस्से में, और फिर सार्वजनिक सेवाओं में, “जन-स्तर” पर उतरना होगा। प्रेस सूचना ब्यूरो की 12 फरवरी 2026 की प्रेस-नोट में “एआई-एट-वर्क” के संदर्भ में नैसकॉम सूचकांक का हवाला दिया गया है—जिसमें भारत का स्कोर 4 में से 2.45 बताया गया है और यह कहा गया है कि 87% उद्यम किसी-न-किसी रूप में एआई समाधान उपयोग कर रहे हैं। उसी संदर्भ में यह भी उद्धृत है कि एक सर्वे में 2025 के दौरान 88% संगठनों ने कम से कम एक व्यावसायिक कार्य में एआई के उपयोग की बात कही।
ये आंकड़े संकेत देते हैं कि भारत “अंगीकरण” के मामले में पीछे नहीं है, पर असली चुनौती “पायलट” से “स्केल” पर जाने की है—यानी ऐसे समाधान जो लाखों-करोड़ों उपयोगकर्ताओं पर भरोसेमंद तरीके से चलें, लागत घटाएँ, और गुणवत्ता बढ़ाएँ। इसी संदर्भ में उद्योग जगत भी अब “सॉवरेन और ट्रस्टेड एआई” की बात कर रहा है। इकोनॉमिक टाइम्स की 20 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में ‘एआई इंडिया ब्लूप्रिंट’ शीर्षक से एक खाका सामने आया है, जिसमें पायलट-आधारित बिखरी परियोजनाओं के बजाय एआई को साझा राष्ट्रीय क्षमता के रूप में अपनाने का सुझाव रखा गया है। यह दृष्टि महत्वपूर्ण है—क्योंकि सुपर पावर वह नहीं होती जो सिर्फ बेहतरीन डेमो दिखाए; सुपर पावर वह होती है जो भरोसेमंद तौर पर बड़े पैमाने पर समाधान चलाए।
3) मीडिया और रचनात्मक अर्थव्यवस्था : भारत की “ग्लोबल शेयर” बढ़ाने का बड़ा अवसर
एआई का असर मीडिया उद्योग पर सबसे तेज़ दिख रहा है—कंटेंट निर्माण, अनुवाद, डबिंग, व्यक्तिगत अनुशंसा, विज्ञापन-लक्ष्यीकरण, न्यूज़रूम ऑटोमेशन, और दर्शक-विश्लेषण—सब कुछ बदल रहा है। पर यह क्षेत्र केवल तकनीकी नहीं, सांस्कृतिक और आर्थिक भी है। इकोनॉमिक टाइम्स की 20 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में जियोस्टार के उपाध्यक्ष उदय शंकर ने कहा कि वैश्विक मीडिया बाजार लगभग 3 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर का है और 2029 तक 3.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है, और उन्होंने यह भी तर्क रखा कि एआई अपनाने से भारत वैश्विक मीडिया में अपनी हिस्सेदारी दोगुनी कर सकता है।
यह बयान—चाहे उद्योग-दृष्टि के रूप में—एक रणनीतिक संकेत देता है : भारत की भाषाई-सांस्कृतिक विविधता ही उसका वैश्विक लाभ बन सकती है। अगर भारत भारतीय भाषाओं में विश्व-स्तरीय एआई-आधारित अनुवाद, वॉयस, सबटाइटलिंग, और स्थानीय कहानी-कथन के टूल विकसित करता है, तो वह “कंटेंट एक्सपोर्ट” के नए युग में अग्रणी बन सकता है। यही वह मोर्चा है जहाँ भारत तकनीकी नेतृत्व को सांस्कृतिक नेतृत्व में बदल सकता है।
4) “फ्रंटियर मॉडल” का स्वदेशी निर्माण : डिजिटल कॉलोनी से बचने की चेतावनी
एआई महाशक्ति बनने के लिए भारत को केवल एप्लिकेशन-लेयर पर नहीं, मूलभूत मॉडल और कोर टेक्नोलॉजी पर भी क्षमता बनानी होगी। इसी दृष्टि को हाल में उद्योग-वक्तव्यों में खुलकर रखा गया है। इकोनॉमिक टाइम्स की 20 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में ‘सर्वम’ के सह-संस्थापक ने यह तर्क दिया कि भारत को अपना एआई-टेक्नोलॉजी-स्टैक खुद बनाना चाहिए, ताकि वह “डिजिटल कॉलोनी” बनने के जोखिम से बच सके।
और उसी दिन टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में ‘सर्वम’ द्वारा 105-बिलियन पैरामीटर वाले बड़े भाषा मॉडल के लॉन्च को भारत के “फ्रंटियर एआई” मानचित्र पर आने के संकेत के रूप में प्रस्तुत किया गया। यह घटनाक्रम भारत की महत्वाकांक्षा का प्रमाण है—पर साथ ही यह याद दिलाता है कि फ्रंटियर स्तर की दौड़ पूंजी-सघन और दीर्घकालिक होती है। इसलिए भारत को “स्थायी अनुसंधान-फंडिंग”, “विश्वविद्यालय-उद्योग सहयोग”, और “कम्प्यूट-एक्सेस” को संस्थागत रूप देना होगा, वरना कुछ चमकदार उपलब्धियाँ देश-स्तरीय क्षमता में नहीं बदल पाएँगी।
5) पूंजी का नया संकेत : वैश्विक निवेशकों का भरोसा, लेकिन शर्तें भी
एआई में आगे बढ़ने के लिए लंबी अवधि की पूंजी जरूरी है—क्योंकि मॉडल प्रशिक्षण, डेटा क्यूरेशन, सुरक्षा-अनुपालन, और उत्पाद-विकास में समय लगता है। इकोनॉमिक टाइम्स की 20 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में सिलिकन वैली की निवेश संस्था ‘जनरल कैटालिस्ट’ द्वारा अगले पाँच वर्षों में भारत में 5 अरब डॉलर निवेश-प्रतिबद्धता का उल्लेख है, और रिपोर्ट बताती है कि यह निवेश एआई सहित कई क्षेत्रों में होगा। यह भरोसा-मतदान महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके साथ एक “शर्त” भी जुड़ी है : निवेशक उन्हीं इकोसिस्टम में बड़े दांव लगाते हैं जहाँ नीतिगत स्थिरता, डेटा-सुरक्षा, प्रतिभा-पाइपलाइन, और बाजार-परिपक्वता स्पष्ट दिखे। भारत को इस भरोसे को स्थायी बनाने के लिए “नियामक स्पष्टता” और “भरोसेमंद डिजिटल वातावरण” बनाए रखना होगा।
6) विकास-लाभ के बड़े क्षेत्र : शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि और शासन
भारत के लिए एआई सुपर पावर बनने की सबसे नैतिक और व्यावहारिक कसौटी यह है कि एआई आम नागरिक के जीवन में कौन-सा ठोस सुधार लाता है।
शिक्षा में एआई-सहायक ट्यूटरिंग, व्यक्तिगत सीखने की योजना, और बहुभाषी सामग्री का विस्तार—ये भारत के लिए बड़े अवसर हैं, खासकर वहाँ जहाँ शिक्षक-छात्र अनुपात, संसाधनों की कमी, और गुणवत्ता का अंतर समस्या है। लेकिन साथ ही जोखिम भी हैं—डेटा गोपनीयता, पक्षपात, और गलत उत्तरों का प्रसार। यूनेस्को के जनरेटिव एआई-मार्गदर्शन के अपडेट में मानव-केंद्रित दृष्टि, संस्थागत तैयारी और जोखिम-प्रबंधन पर जोर मिलता है। (ध्यान रहे : यह संदर्भ-बिंदु बताता है कि जनरेटिव एआई के साथ शिक्षा-तंत्र को “तैयार” करना भी उतना ही जरूरी है जितना उसे “अपनाना”।)
स्वास्थ्य में एआई निदान-सहायता, रेडियोलॉजी में सहायता, दवा-खोज, और अस्पताल-प्रबंधन में उत्पादकता ला सकता है। भारत में यदि एआई का उपयोग प्राथमिक स्वास्थ्य-देखभाल से लेकर टेलीमेडिसिन तक सही ढंग से हुआ, तो यह लागत घटाते हुए पहुँच बढ़ा सकता है।
कृषि में फसल-पूर्वानुमान, मौसम-आधारित सलाह, कीट-रोग पहचान, और बाजार-मूल्य संकेत—ये सब किसान-आय और जोखिम-प्रबंधन में योगदान दे सकते हैं। भारत की विविध कृषि-जलवायु स्थितियाँ वास्तव में एआई-उपयोग के लिए एक बड़ा प्रयोग-क्षेत्र हैं।
शासन में एआई लाभार्थी-लक्ष्यीकरण, शिकायत-निवारण, धोखाधड़ी नियंत्रण, और सेवा-डिलिवरी में मदद कर सकता है—लेकिन शासन-स्तर पर एआई लागू करते समय नागरिक अधिकार, पारदर्शिता और जवाबदेही “गैर-परक्राम्य” शर्तें हैं, वरना तकनीक का विरोध बढ़ेगा और भरोसा टूटेगा।
7) छिपा जोखिम : डेटा सेंटर, ऊर्जा और पानी—एआई की “भौतिक लागत”
एआई को अक्सर “डिजिटल” कहा जाता है, पर उसका आधार भौतिक है—डेटा सेंटर, बिजली, पानी, और कूलिंग। भारत जैसे देश में यदि डेटा सेंटर विस्तार तेज़ होगा, तो ऊर्जा-मांग और जल-दबाव जैसे मुद्दे नीतिगत बहस के केंद्र में आएँगे। एआई इम्पैक्ट समिट 2026 से जुड़ी रिपोर्टिंग में डेटा सेंटरों के कारण जल-दबाव को चिंता का विषय बताया गया है। यह संदर्भ याद दिलाता है कि एआई नेतृत्व का अर्थ “हर हाल में विस्तार” नहीं, बल्कि “सतत विस्तार” है—जहाँ अक्षय ऊर्जा, दक्ष कूलिंग, और जल-प्रबंधन को शुरू से डिजाइन में रखा जाए।
भारत के “एआई सुपर पावर” बनने की संभावना पर अब कोई गंभीर संदेह नहीं बचता—क्योंकि आज यह संभावना केवल आकांक्षा नहीं, बल्कि नीति, पूंजी, कम्प्यूट-अवसंरचना, डिजिटल स्केल और उद्योग-अंगीकरण के ठोस संकेतों से समर्थित है। हाल ही में “इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026” के संदर्भ में प्रेस सूचना ब्यूरो की आधिकारिक विज्ञप्ति में 20,000 अतिरिक्त जीपीयू जोड़कर कम्प्यूट-इन्फ्रास्ट्रक्चर विस्तार और अगले चरण की रणनीति की बात कही गई, और उसी वक्त यह भी उल्लेख हुआ कि अगले दो वर्षों में भारत के एआई-इकोसिस्टम में 200 अरब अमेरिकी डॉलर से अधिक निवेश प्रवाह की संभावना पर सरकार ने आशावाद जताया। यह केवल एक आयोजन-समाचार नहीं है; यह संदेश है कि भारत एआई को “राष्ट्रीय क्षमता” की तरह देख रहा है—जिसमें कम्प्यूट, पूंजी और साझेदारियाँ एक साथ बढ़ाई जा रही हैं। इसी समिट में सरकार द्वारा कम्प्यूट-पूल को 38,000 जीपीयू से 58,000 जीपीयू तक “हफ्तों में” बढ़ाने और लगभग 65 रुपये प्रति घंटा जैसी कीमत पर सुलभ कराने की बात इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट में दर्ज हुई। टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी इसी मंच पर भारत की जीपीयू क्षमता को तेज़ी से बढ़ाने और अगले महीनों में विस्तार-लक्ष्य पर रिपोर्ट किया।
लेकिन सुपर पावर बनने का निर्णायक प्रश्न यह है कि क्या भारत इस गति को “व्यवस्था” में बदल पाएगा—यानी क्या यह कम्प्यूट वास्तव में शोधकर्ताओं, विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप और सार्वजनिक संस्थानों तक पारदर्शी, तेज़ और न्यायसंगत तरीके से पहुँचेगा? “इंडियाएआई कम्प्यूट कैपेसिटी” पहल के आधिकारिक विवरण में यह स्पष्ट किया गया है कि 18,000+ जीपीयू आधारित अवसंरचना सार्वजनिक-निजी भागीदारी से बनाई जा रही है और इसे अकादमिक जगत, एमएसएमई, स्टार्टअप और अन्य योग्य इकाइयों के लिए उपलब्ध कराने की योजना है। यही वह बिंदु है जहाँ भारत “कम्प्यूट-डेमोक्रेटाइजेशन” करके दुनिया से अलग पहचान बना सकता है, क्योंकि एआई में असमानता अक्सर “कम्प्यूट-असमानता” से पैदा होती है—कुछ संस्थान बहुत बड़े मॉडल बना लेते हैं, बाकी सिर्फ उपभोक्ता बनकर रह जाते हैं। यदि भारत ने कम्प्यूट-एक्सेस को संस्थागत रूप से निष्पक्ष बनाया, तो वह अपनी विशाल प्रतिभा-सम्पदा को वास्तविक नवाचार-शक्ति में बदल देगा।
अब बात “अगले 24 महीनों” की।
एआई इतिहास का यह चरण ऐसा है जहाँ देर करने वाला देश “टेक-स्टैक” में निर्भर होता चला जाएगा, और समय पर निवेश करने वाला देश मानक-निर्माता तथा निर्यातक बन सकता है। भारत को अगले दो वर्षों में चार मोर्चों पर एक साथ काम करना होगा—और यह काम केवल सरकार से नहीं होगा; इसमें उद्योग, विश्वविद्यालय, मीडिया, और नागरिक समाज—सबकी भूमिका है। पहला मोर्चा है “मूलभूत मॉडल और स्वदेशी टेक-स्टैक।” भारत को यह तय करना होगा कि वह किस हद तक केवल विदेशी मॉडल-एपीआई पर निर्भर रहेगा और किस हद तक अपने आधारभूत मॉडल, अपने सुरक्षा-स्तर, और अपने डेटा-शासन की क्षमता विकसित करेगा। इसी चिंता को इकोनॉमिक टाइम्स में प्रकाशित एक रिपोर्ट में ‘डिजिटल कॉलोनी’ के जोखिम के रूप में उद्धृत किया गया—जहाँ यह तर्क आया कि देश को अपना एआई-टेक्नोलॉजी-स्टैक खुद बनाना चाहिए ताकि रणनीतिक निर्भरता न बने। (यहाँ मैं एक बात साफ कर दूँ : इस “डिजिटल कॉलोनी” वाले विचार का मूल स्वर सार्वजनिक बहस में है—पर इसे नारे की तरह नहीं, नीति-निर्णय की तरह समझना होगा।)
दूसरा मोर्चा है “सेमीकंडक्टर और हार्डवेयर वैल्यू-चेन।” एआई का भविष्य भौतिक है—डेटा सेंटर, चिप्स, नेटवर्क, बिजली और कूलिंग। भारत ने इस दिशा में कदम तेज किए हैं। 4 फरवरी 2026 की प्रेस सूचना ब्यूरो विज्ञप्ति में स्पष्ट तौर पर बताया गया कि गुजरात में टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स की सेमीकंडक्टर फैब परियोजना में 91,526 करोड़ रुपये का निवेश और लगभग 50,000 वेफर-स्टार्ट्स-पर-माह की क्षमता का लक्ष्य है; साथ ही असम में पैकेजिंग-संबंधी परियोजना और अन्य यूनिट्स की क्षमता भी आधिकारिक रूप से दर्ज है। यह तथ्य इसलिए निर्णायक है क्योंकि अगर भारत एआई में नेतृत्व चाहता है, तो उसे कम्प्यूट का “उत्पादन-आधार” भी मजबूत करना होगा, अन्यथा वह हर नई लहर में आयात-निर्भर रहेगा। यहाँ सफलता का अर्थ यह नहीं कि भारत तुरंत वैश्विक चिप-सुपर पावर बन जाए; सफलता का अर्थ यह है कि भारत अपने लिए पर्याप्त, भरोसेमंद और रणनीतिक रूप से सुरक्षित हार्डवेयर-इकोसिस्टम खड़ा कर दे, जो एआई-उद्योग की निरंतरता सुनिश्चित कर सके।
तीसरा मोर्चा है “उद्योग-स्तरीय अंगीकरण और उत्पादकता।” भारत के पास डिजिटल स्केल का लाभ है—और इसका प्रतीक UPI है। प्रेस सूचना ब्यूरो ने 8 दिसंबर 2025 को अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की जून 2025 की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया कि UPI को लेन-देन मात्रा के आधार पर दुनिया की सबसे बड़ी खुदरा त्वरित-भुगतान प्रणाली के रूप में मान्यता मिली। यह सिर्फ भुगतान का रिकॉर्ड नहीं; यह दिखाता है कि भारत बड़े पैमाने पर भरोसेमंद डिजिटल प्रणालियाँ चला सकता है। अब यही क्षमता एआई-आधारित जोखिम-प्रबंधन, धोखाधड़ी रोकथाम, ग्राहक-सेवा, तथा नियामकीय तकनीक में छलांग दे सकती है—बशर्ते डेटा-सुरक्षा और जवाबदेही को उसी स्तर पर रखा जाए। उद्योग-अंगीकरण के बारे में सरकारी-आधिकारिक संदर्भों में भी एआई उपयोग की व्यापकता का उल्लेख सामने आया है, जिससे संकेत मिलता है कि भारत “उपयोग-केस” की प्रयोगशाला बनने की क्षमता रखता है।
चौथा और सबसे निर्णायक मोर्चा है “भरोसा”—यानि ऐसा एआई-इकोसिस्टम जो नागरिक अधिकारों, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, गोपनीयता और पारदर्शिता के साथ आगे बढ़े। यही वह जगह है जहाँ भारत दुनिया का “वैकल्पिक मॉडल” बन सकता है : न तो अनियंत्रित टेक-अराजकता, न ही अत्यधिक नियंत्रण। हाल के दिनों में भारत ने एआई-जनित सामग्री और डीपफेक को लेकर आईटी नियमों में संशोधन लागू किए हैं; टाइम्स ऑफ इंडिया की 20 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में आज से लागू नियमों के तहत सिंथेटिक/डीपफेक सामग्री पर प्रमुख लेबलिंग और स्पष्ट चिन्हांकन की अपेक्षा का वर्णन है। रॉयटर्स ने भी 10 फरवरी 2026 की रिपोर्ट में तीन-घंटे के भीतर अवैध सामग्री हटाने के प्रावधान और इस पर अधिकार-समूहों की सेंसरशिप संबंधी चिंताओं का उल्लेख किया, साथ ही यह भी बताया कि मेटा ने 2025 की पहली छमाही में भारत में 28,000 से अधिक सामग्री-प्रतिबंध रिपोर्ट किए थे। ये तथ्य यह दिखाते हैं कि भारत “सूचना-सुरक्षा” को गंभीरता से ले रहा है, पर इसी के साथ यह जिम्मेदारी भी बढ़ जाती है कि नियमों का क्रियान्वयन पारदर्शी हो, अपील-तंत्र प्रभावी हो, और वैध पत्रकारिता/आलोचना “डर के मारे” न दब जाए। एआई महाशक्ति वही होगी जो “सत्य” और “स्वतंत्रता”—दोनों का संरक्षण कर सके; सिर्फ एक का नहीं।
अब प्रश्न यह है कि भारत को अगले 24 महीनों में “ठोस” तौर पर क्या हासिल करना चाहिए—वह भी बिना किसी नारेबाज़ी के। सबसे पहले, भारत को कम्प्यूट-सुलभता का एक राष्ट्रीय मानक-तंत्र बनाना होगा, जहाँ विश्वविद्यालयों, सरकारी शोध-संस्थानों, और शुरुआती स्टार्टअप को वास्तविक उपयोग-लायक जीपीयू समय और सपोर्ट मिले; केवल घोषणा-स्तर पर नहीं। दूसरा, भारत को भारतीय भाषाओं के लिए उच्च-गुणवत्ता वाले डेटासेट, मानकीकृत टोकनाइज़ेशन, और विश्वसनीय मूल्यांकन-मानक (बेंचमार्क) तैयार करने होंगे ताकि “भारतीय भाषाओं में एआई” सिर्फ अनुवाद-टूल न रह जाए, बल्कि शिक्षा, न्याय, स्वास्थ्य और प्रशासन में भरोसेमंद सहायक बने। तीसरा, भारत को “एआई-सुरक्षा और गुणवत्ता” के लिए स्वतंत्र ऑडिट-संस्कृति विकसित करनी होगी—जिसमें मॉडल-पक्षपात, डेटा-गोपनीयता, और गलत सूचना-जोखिम की नियमित जाँच हो, और इसका संक्षिप्त सार्वजनिक प्रकटीकरण भी हो। चौथा, भारत को स्टार्टअप-पूंजी को “डीप-टेक” की ओर अधिक मोड़ना होगा। नैसकॉम की “इंडिया जनरेटिव एआई स्टार्टअप लैंडस्केप 2025” रिपोर्ट में बताया गया कि भारतीय जनरेटिव एआई स्टार्टअप्स की संचयी फंडिंग H1 2025 तक लगभग 990 मिलियन डॉलर तक पहुँची, हालांकि यह वैश्विक साथियों के मुकाबले अभी भी कम है। यह संकेत है कि गति है, पर “स्केल” के लिए बड़े और दीर्घकालिक फंड की जरूरत बनी रहेगी।
और एक बात जिसे अक्सर तकनीकी चर्चा में पीछे धकेल दिया जाता है—एआई की “भौतिक लागत।” डेटा सेंटरों की ऊर्जा-मांग और जल-दबाव आने वाले वर्षों में वास्तविक नीति-दबाव बनेगा। यही कारण है कि भारत को एआई अवसंरचना के साथ-साथ ऊर्जा-संक्रमण, ग्रिड-लचीलापन और दक्ष कूलिंग जैसी नीतियों को भी समन्वित करना होगा, अन्यथा एआई की प्रगति पर्यावरणीय और सामाजिक टकरावों में उलझ सकती है। नीति आयोग से जुड़े हालिया सेक्टोरल इनसाइट्स दस्तावेज़ों में बिजली-क्षेत्र की भविष्य-पथों पर जोर दिखता है, जो अप्रत्यक्ष रूप से इस बात का संकेत है कि भविष्य की डिजिटल-अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा-योजना भी उतनी ही रणनीतिक है।
निष्कर्ष
भारत के पास एआई सुपर पावर बनने की “पूरी संभावनाएँ” इसलिए हैं क्योंकि उसके पास तीन दुर्लभ चीजें एक साथ हैं : विशाल डिजिटल उपयोग-परिस्थितियाँ (जो किसी भी एआई को परिपक्व करती हैं), बढ़ती कम्प्यूट-रणनीति (जो किसी भी एआई को संभव बनाती है), और दुनिया की सबसे बड़ी बहुभाषी-बहुसांस्कृतिक प्रयोगशाला (जो भारत को वैश्विक दक्षिण का प्राकृतिक नेता बना सकती है)। समिट के मंच से वैश्विक मीडिया-अर्थव्यवस्था में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाने की संभावना पर भी इकोनॉमिक टाइम्स में जो आँकड़े उद्धृत हुए—कि वैश्विक मीडिया बाजार लगभग 3 ट्रिलियन डॉलर का है और 2029 तक 3.5 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है—वे बताते हैं कि एआई केवल तकनीकी दौड़ नहीं, आर्थिक-सांस्कृतिक दौड़ भी है। भारत अगर एआई को भारतीय भाषाओं और रचनात्मक उद्योग के साथ जोड़कर “कंटेंट-टेक” का नया मॉडल बना लेता है, तो यह केवल जीडीपी का प्रश्न नहीं रहेगा; यह भारत की वैश्विक सांस्कृतिक उपस्थिति का प्रश्न बन जाएगा।
पर इस सपने की शर्त स्पष्ट है : भारत को एआई में आगे बढ़ते हुए “भरोसा” खोना नहीं है। तकनीक जितनी तेज़ होगी, समाज उतना ही संवेदनशील होगा; और नीति जितनी कठोर होगी, स्वतंत्रता उतनी ही नाजुक होगी। यही संतुलन भारत को एआई महाशक्ति बना सकता है—ऐसी महाशक्ति जो केवल मॉडल नहीं बनाती, बल्कि “मानवीय हित” के अनुरूप एआई का एक विश्वसनीय, समावेशी और लोकतांत्रिक रास्ता भी दिखाती है।
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ए आई (AI)या कृत्रिम मेधा के विभिन्न पहलुओं पर प्रकाश डालते कुछ अन्य लेख जो हमारे यहाँ ही प्रकाशित हुए हैं
AI काल में जीने का सबब – 1 (इस लेख के अन्य दो भागों के लिंक लेख में ही मिल जायेंगे)
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डॉ. शैलेश शुक्ला करीब ढाई दशक से मीडिया, राजभाषा, अनुवाद और अकादमिक जगत में सक्रिय हैं और एक दशक तक दिल्ली में पत्रकारिता एवं शिक्षण, सिक्किम विश्वविद्यालय के पहले राजभाषा अधिकारी और एक केन्द्रीय उपक्रम के राजभाषा अधिकारी के रूप में कार्य करने का पश्चात वर्तमान में सृजन संसार अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समूह के वैश्विक समूह संपादक के रूप में कार्यरत हैं। उन्होंने दिल्ली विश्वविद्यालय और सिक्किम केंद्रीय विश्वविद्यालय में अध्यापन भी किया है। ‘न्यू मीडिया में हिंदी साहित्य’ विषय पर पीएचडी की उपाधि प्राप्त डॉ. शैलेश शुक्ला ने दिल्ली विश्वविद्यालय और इग्नू के पाठ्यक्रमों सहित विभिन्न पुस्तकों में 30 से अधिक अध्यायों का लेखन किया है। उन्होंने 20 से अधिक पुस्तकों का लेखन एवं संपादन किया है तथा देश-विदेश के विभिन्न समाचार पत्रों और पत्रिकाओं में 40 से अधिक शोध-पत्र, लेख, कविताएँ, कहानियाँ और व्यंग्य सहित 1000 से अधिक रचनाएँ प्रकाशित की हैं। डॉ. शुक्ला को भारत सरकार, गृह मंत्रालय द्वारा ‘राजभाषा गौरव पुरस्कार 2019-20’ और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, दिल्ली की हिंदी अकादमी द्वारा ‘नवोदित लेखक पुरस्कार 2003-04’ सहित विभिन्न सम्मान प्राप्त हुए हैं।
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